- नामसाधना की व्यापकता
- व्यावसायिक ध्यान का विरोध
- आंतरिक वसंत ऋतु
- आंतरिक संतुलन व दिखावा
- अंतर्दृष्टि और शास्त्र-आधार
- जीव की शास्त्रीय संकल्पना
- परमार्थ प्रणाली
- ब्रह्म का सच्चिदानंद स्वरूप
- दुःख और चार संकल्प
- प्रकट और अप्रकट दुःख
- जीव के तीन घटक
- लौकिक तथा अलौकिक प्रकाश
- टॉर्च-पेपरवेट प्रयोग
- चिदाभास का मूल में लौटना
- सोहम् और अभय
- तीन देह का विस्मरण
- सुषुप्ति और आत्म-आनंद
- कवडसा दृष्टांत व सहजावस्था
नामसाधना की व्यापकता
यदि आपको याद हो, तो हमने पहले दिन नामसाधना के समय नामस्मरण किया था। आज, ध्यान पर विचार करते समय भी हम नामस्मरण कर रहे हैं, और कल जब हम ज्ञान की चर्चा करेंगे, तब भी नामस्मरण करेंगे। इसका अर्थ यह है कि तीनों साधनाओं में नामसाधना एक सामान्य (सर्वव्यापी) तत्व है। ‘सामान्य’ शब्द का परमार्थ में अर्थ होता है—‘कॉमन’ या ‘व्यापक’। व्यवहार में, इस शब्द का अर्थ कुछ अलग होता है। जैसे, जब पूछा जाता है—‘आपका विद्यार्थी कैसा है?’ उत्तर मिलता है—‘सामान्य है’, तो इसका अर्थ होता है—तीसरे दर्जे का। परन्तु, परमार्थ में ‘सामान्य’ शब्द का अर्थ ‘व्यापक’ है।
व्यावसायिक ध्यान का विरोध
आजकल के समाज में ध्यानसाधना को लेकर ‘aggressive marketing’ का चलन बढ़ गया है। अमेरिका में एक शब्द बहुत प्रसिद्ध है—‘aggressive marketing’। हर कोई अपनी एक अलग ‘ध्यान’ की प्रक्रिया सीखाने में लगा है। ध्यान के लिए हमारे पास कौन-कौन सी सुविधाएँ (facilities) उपलब्ध हैं, चर्चा इसी से शुरू होती है—ध्यान की सुविधाएँ। इसके अंतर्गत कहीं आश्रम है, कहीं कोई रिसॉर्ट है—इन सब बातों से ध्यान के क्षेत्र में ‘commercial’ दृष्टिकोण कैसे शुरू हुआ, यह समझा जा सकता है। अब, यदि कोई व्यक्ति सच में नियमित और अपेक्षित रूप से ध्यानसाधना करना चाहता है, तो वह हर दिन रिसॉर्ट या आश्रम कैसे जा सकता है? इसीलिए आवश्यक हो जाता है कि हम अपने निवास स्थान पर ही, उपयुक्त स्थान चुने और निश्चित मानसिक स्थिति में आसनस्थ होकर ध्यानसाधना करें। किंतु यही सबसे बड़ी चुनौती है। बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी अनुकूल हों, यदि भीतर स्वस्थता नहीं है, तो हम उनका लाभ नहीं उठा सकते। यही बात शारीरिक स्वास्थ्य पर भी लागू होती है। कई लोगों ने मुझसे पूछा—‘आपकी हवाई यात्रा कैसी रही?’ मैंने उत्तर दिया—‘बहुत अच्छी, अत्यंत सुंदर!’ वास्तव में बाहरी परिस्थितियाँ पूरी तरह अनुकूल थीं, लेकिन भीतर कुछ भी अनुकूल नहीं था। इसी तरह, ध्यान, परमार्थ, भक्ति और उपासना के लिए भी अंतःकरण की अनुकूलता अत्यंत महत्वपूर्ण है। चित्त प्रसन्न होना चाहिए—यह एक बहुत बड़ा वरदान है। यदि चित्त प्रसन्न है, तो नामसाधना भी वैसी ही होती है जैसी होनी चाहिए। यदि मन अप्रसन्न हो, तो नामस्मरण कैसा होगा?—केवल औपचारिक। यदि चिड़चिड़ाहट के साथ नाम लिया जाए, तो उसका क्या लाभ? अतः जरूरी है कि अत्यंत प्रसन्न चित्त से ही नामस्मरण किया जाए। चित्त बाहर नहीं, भीतर होता है।
आंतरिक वसंत ऋतु
चित्त प्रसन्न रहना चाहिए, इसलिए मैं हमेशा सभी से कहता हूँ कि हमारे भीतर सदैव वसंत ऋतु बनी रहनी चाहिए। बाहर तो कई ऋतुएँ आती-जाती हैं—वर्षा, शिशिर, वसंत और सबसे अधिक परिचित ग्रीष्म ऋतु। ग्रीष्म ऋतु का अर्थ है—जब सब कुछ गरमागरम (उष्ण) हो, बाहर भी और भीतर भी। यदि हमारे अंदर भी लगातार गर्मी बनी रहे, तो साधना असंभव हो जाती है। इसी तरह, यदि भीतर शिशिर ऋतु हो—अर्थात् सब कुछ शुष्क, निर्जन और हतोत्साहित हो—तो भी परमार्थ संभव नहीं है। अगर आपकी भावनाएँ वर्षा ऋतु की तरह हैं, और वह निरंतर आँखों के रास्ते बाहर आती हैं, तो भी साधना कठिन हो जाती है। समाज में यह धारणा है कि महिलाओं में यह प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है, पर यह सही नहीं है। दरअसल, बाहर की ऋतुएँ यदि भीतर उतर आएँ, तो वे कष्टदायक बन जाती हैं। इसलिए, साधक का सबसे बड़ा कर्तव्य है—अपने भीतर निरंतर वसंत ऋतु को बनाए रखना और मानसिक अनुकूलता बनाए रखना।
आंतरिक संतुलन व दिखावा
भीतर अनुकूलता बनाए रखने के लिए एक ही उपाय है —
जैसी स्थिती आहे तैशा परी राहे । कौतुक तू पाहे संचिताचे ॥ (ए.हरि.)
अंत में निष्कर्ष यही है कि अपनी आंतरिक स्थिति को संतुलित और सकारात्मक बनाए रखना हर साधक की जिम्मेदारी है, चाहे वह कोई भी साधना कर रहा हो—नामसाधना, ध्यानसाधना या वैचारिक वेदांत-साधना। साधना का प्रकार कोई भी हो, लेकिन भीतर वसंत ऋतु बनाए रखना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि घर में दो लोग हैं, तो दोनों को एक-दूसरे के आंतरिक वसंत ऋतु बनाए रखने में सहायता करनी चाहिए। यदि एक व्यक्ति ग्रीष्म ऋतु जैसी अवस्था में है और दूसरा वसंत ऋतु जैसी, तो ग्रीष्म की गर्मी जल्दी फैलती है, जबकि वसंत का प्रभाव शांत रहता है—इसलिए घर का वातावरण बिगड़ सकता है। मन में ग्रीष्म का स्वभाव है फैलना और वसंत पर हावी होना, जबकि मन का वसंत ऋतु कभी भी आक्रमण नहीं करता—इसे याद रखना चाहिए। परमार्थ में हम कई सिद्धांत पढ़ते हैं—ऐसा करो, वैसा करो, इत्यादि। कई लोग कहते हैं—हमारे पास आओ, आपका ध्यान अधिक केंद्रित हो जाएगा, हम आपकी चित्तवृत्ति बदल देंगे। लेकिन परमार्थ में दिखावे का कोई स्थान नहीं है। परमार्थ में यदि glamour हो तो वहाँ रजोगुण होता हैं और आध्यात्मिक साधना रजोगुण से बिलकुल नहीं बनती। जहाँ सत्वगुण से भी परहेज हैं वहाँ रजोगुण तो सहन ही नहीं होता। कुछ बातें सावधानी से समझनी और संभालनी हैं—यही सबसे महत्वपूर्ण है।
यह केवल तत्त्वज्ञान या सिद्धांतों की बात नहीं है—हम जिन मुद्दों को समझते हैं, वे केवल पुस्तकों में लिखे शब्द नहीं होते। पुस्तकें भरी पड़ी हैं उपदेशों और विचारों से, लेकिन ‘भीतर की वसंत ऋतु’ का अनुभव किसी किताब में नहीं मिलता। इसे बनाए रखने और संभालने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी साधक पर होती है। वही साधक वास्तव में सफल होता है, जो इस जिम्मेदारी को निभाता है। जो साधक अपने भीतर वसंत ऋतु को कायम नहीं रख पाता, उसकी आध्यात्मिक सफलता की संभावना बहुत कम हो जाती है—चाहे वह कितना ही बड़ा पंडित, विशेषज्ञ, या नामसाधना में पारंगत क्यों न हो। यदि मन में वसंत ऋतु नहीं है, तो हमारे जाप से रामजी को भी कष्ट हो सकता है। भीतर की ऋतु का प्रभाव हमारी साधना पर सीधा पड़ता है—यहाँ तक कि श्रीराम पर भी उसका असर हो सकता है। लेकिन यदि इसका उन पर सीधा प्रभाव न भी पड़े, हमारी नामसाधना पर तो विपरीत असर निश्चित ही होता है।
अब जरा सोचिए—कल मैंने एक प्रस्तावना दी थी, आज फिर दे रहा हूँ। वसंत ऋतु की प्रस्तावना रखने का उद्देश्य अब आप भली-भांति समझ चुके होंगे। जैसे ही आपको लगे कि आपके भीतर की ऋतु बदल रही है, उसी क्षण सावधान हो जाना चाहिए—और दूसरों को भी सावधान करना चाहिए। हमें खुद भी सतर्क रहना है, और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे को भी मार्गदर्शन देना है—‘एकमेकां सहाय्य करू, अवघे धरू सुपंथ।’
कल मैंने कहा था कि हर साधक को ‘जीव’ की संकल्पना को समझना चाहिए। जीव किसे कहते हैं? आत्मा क्या है? जीव और आत्मा का आपस में क्या संबंध है? संबंध कैसा है, कैसे बिगड़ा, और उसे कैसे सुधारा जा सकता है? ऐसे अनेक प्रश्न उठते हैं। जब इन सब बातों को गहराई से समझने की कोशिश की जाती है, तभी साधना में सच्ची सफलता मिल सकती है—चाहे वह नामजाप ही क्यों न हो। नाम लेने वाला हमेशा ‘जीव’ होता है, और जिसका नाम लिया जाता है, वह ‘नामी’—अर्थात् आत्मरूप—होता है। उदाहरण के लिए, जब मैं श्रीराम का नाम लेता हूँ, तो आत्मरूप श्रीराम उस नाम के ‘नामी’ हैं। श्रीराम कौन हैं? वे आत्मस्वरूप हैं। इस तरह सोचने पर ‘जीव’ और ‘आत्मा’ की संकल्पनाएँ बार-बार सामने आती हैं, और उनसे बचा नहीं जा सकता। इसलिए, इन्हें समझना आवश्यक है। यह सोचना गलत है कि ‘मैं नामसाधक हूँ, मुझे इन्हें समझने की जरूरत नहीं।’
अंतर्दृष्टि और शास्त्र-आधार
यह एक सहज-सी बात है कि हमारे भीतर अक्सर ‘insight’ यानी अंतर्दृष्टि की कमी होती है। ‘Insight’ शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। जिस भी क्षेत्र में हम सक्रिय हैं, यदि उसमें गहरी insight नहीं है, तो वहाँ हमें सच्ची सफलता नहीं मिल सकती। हमें उस क्षेत्र से जो भी अपेक्षाएँ हैं, वह पूर्ण नहीं होती। इसलिए परमार्थ में जो साधना मैं कर रहा हूँ, उस साधना के विषय में हमें insight (अंतदृष्टि) होना आवश्यक हैं। यदि insight हो, तो उस साधना पर हमें grip (पकड़) आती हैं। और जब पकड़ बन जाती है, तो वह साधना स्वाभाविक और सहज हो जाती है। जब तक insight नहीं आती, साधना केवल बाहरी या कृत्रिम रह जाती है, उसमें गहराई नहीं आती। साधना को ऊपर-ऊपर से करने की बजाय, उसकी गहराई तक पहुँचना जरूरी है—जैसे निशानेबाज का लक्ष्य bull’s eye होता है, वैसे ही साधना का केंद्र पकड़ना जरूरी है। यदि वहाँ निशाना सही लगाना हैं, तो insight विकसित करना अपरिहार्य हैं। हमें grip होनी ही चाहिए, और grip चाहिये हो तो शास्त्रोंका आधार आवश्यक हैं।
मैंने कहा है—जिस साधक के लिए शास्त्र समझ से बाहर हैं, उसके लिए मोक्ष भी दूर की बात है। लेकिन मेरा संकेत जटिल शास्त्रों की ओर नहीं है—नैयायिकों या वैयाकरणों के कठिन ग्रंथों से हमें कोई लेना-देना नहीं। पर जब तक साधना पर हमारी grip नहीं आती, insight नहीं होती, तब तक अध्ययन अनिवार्य है—चाहे वह सरल शास्त्रग्रंथ ही क्यों न हो।
जीव की शास्त्रीय संकल्पना
‘जीव’ केवल एक संकल्पना है—शास्त्रकारों द्वारा निर्मित एक विचार या प्रणाली। शुरू में ही यह समझ लेना जरूरी है कि ‘जीव’ नाम की कोई वस्तु वास्तव में दिखाई नहीं देती; यह केवल शास्त्रों की एक व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, किसीने मुझसे पूछा, “आपने डॉक्टर होने के कारण कई सारे dissections किये होंगे और कई operations (शस्त्रक्रिया) भी देखी होंगी। क्या आपको कभी जीव दिखाई दिया?” मुझे आजतक किसी भी शरीर में जीव नजर नहीं आया। Brain देखा, brain के हिस्से दिखे परन्तु जीव नामक संकल्पना आज तक दृष्टिगोचर नहीं हुई। यदि जीव शरीर में विद्यमान ही नहीं हैं तो जीव और ब्रह्म का ऐक्य कैसे संभव करें? ये जो प्रश्न उपस्थित हुए – obvious प्रश्न हैं! यदि जीव नामक तत्व अस्तित्व में ही नहीं हैं, और आत्मा नामक तत्व ही शरीर के भीतर दिखाई ना देता हो, तो ऐसा जीव और ऐसा दृष्टी अगोचर आत्मा इनका ऐक्य कैसे संभव हो? यह एक स्वाभाविक और तर्कसंगत प्रश्न है। जब ‘जीव’ और ‘आत्मा’ जैसी संकल्पनाएँ प्रत्यक्ष नहीं दिखतीं, तो उनका मिलन कैसे हो सकता है? इसका अर्थ है कि यह सब एक निश्चित व्यवस्था या प्रणाली है, जिसे शास्त्रकारों ने हमे समझाने के लिए बनाया है। पहले इस प्रणाली को अच्छे से समझ लें, उसका प्रयोग करें, और जब उससे अपेक्षित परिणाम मिल जाएँ, तो उसे भी छोड़ दें।
परमार्थ प्रणाली
आज एक हल्के-फुल्के अंदाज़ में बात कहता हूँ। कई बार मेरे मन में आता है कि मैं कुछ उक्तियों को पेटेंट करवा लूँ! यह विचार भी मजेदार है—हर देश के अपने-अपने खास गुण होते हैं, और अब मैं जो उदाहरण या प्रयोग बताने जा रहा हूँ, उसे भी पेटेंट कराना चाहता हूँ। उसका कारण है—कोई और उसका उपयोग करेगा और उससे खूब सारे डॉलर कमाएगा, और मैं बेचारा अमेरिका जाकर रुपये-रुपये करता बैठा रहूँगा।
अब बात ऐसी हैं—‘Know the system’—अर्थात् व्यवस्था को समझिए। अब ‘Know the system’ (व्यवस्था को समझ लीजिए) – परमार्थ एक सिस्टम है। वह सिस्टम thoroughly (सम्पूर्णतः), समग्र रूप से, यथार्थ रूप से समझ लीजिए। फिर ‘Use the system’ – उसका प्रत्यक्ष प्रयोग कीजिए। उसके पश्चात् ‘Get the results’ (परिणाम प्राप्त कर लीजिए), and Forget the system (और सिस्टम को भुला दिजीये।) यहाँ एक बात और समझनी है—‘Don’t shoot holes in the system’. यह शब्द आपने शायद सुना होगा—‘shooting the holes’। जब हमारी किसी संस्था या संगठन की मीटिंग होती है, तो कोई व्यक्ति अपनी राय या प्रस्ताव रखता है, और बाकी लोग उसमें कमियाँ या दोष निकालने लगते हैं, यानी ‘shooting the holes’ करते हैं। उस प्रस्तुति में जो भी कमियाँ दिखती हैं, वे उजागर कर दी जाती हैं। लेकिन परमार्थ की इस व्यवस्था में हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। आप संसार की हरेक चीज़ में दोष देख सकते हैं, कोई बाधा नहीं, परंतु इस व्यवस्था में एक भी ‘hole shoot’ नहीं करना—यही श्रद्धा है।
अब, अगर इसे सरल भाषा में समझें—तो बात बस इतनी है कि जिस प्रकार यह अध्यात्मशास्त्र की सिस्टम है, वैसे ही उसे स्वीकार कर लीजिए। उसे स्वीकार करने के बाद, जैसे निर्देश दिए गए हैं, वैसे ही उसका उपयोग कीजिए। फिर जो भी इससे प्राप्त होने वाला है—अर्थात् मोक्ष—वह सहज ही मिल जाएगा, और उस समय इस सिस्टम की उपयोगिता भी समाप्त हो जाएगी। यह ध्यान रखना चाहिए कि जब अध्यात्मशास्त्र की व्यवस्था का केवल एक साधन है और उसका अंत निश्चित है, तो उसे बार-बार चुनौती देने या उसमें कमियाँ ढूंढ़ने का कोई औचित्य नहीं। ‘क्यों?’ ‘किस आधार पर?’—ऐसे निरर्थक सवाल उठाना व्यर्थ है। अध्यात्मशास्त्र की पूरी व्यवस्था को विचारपूर्वक स्वीकारना यही wisdom है। यदि यह wisdom मिल जाए और श्रद्धा स्थिर रहे, तो परमार्थ का मार्ग अत्यंत सरल हो जाएगा। लेकिन यदि मैं अपनी अनावश्यक तर्कशक्ति, बुद्धिकौशल या बौद्धिक चातुर्य से लगातार इसमें तर्क-वितर्क करता रहूँ, तो परमार्थ की साधना कठिन हो जाती है।
असल में, परमार्थ दुष्कर नहीं है—हम अपनी जटिलताओं के कारण ही उसे दुष्कर बना लेते हैं। सारांश यह है कि ‘जीव’ नामक संकल्पना, जिसे शास्त्रकारों ने रचा है, वह एक concept मात्र है—इसे हमेशा याद रखें। इसी तरह, ‘आत्मा’ भी एक concept ही है, जिसे शास्त्रों ने व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया है।
ब्रह्म का सच्चिदानंद स्वरूप
अब ज़रा विचार करें—शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्म सत्-चित्-आनंद स्वरूप है। कल हम इसकी गहराई से चर्चा करेंगे। पर यदि ब्रह्म सच्चिदानंद है, तो क्या ‘सत्’ ब्रह्म का कोई गुण है? क्या ‘चित्’ और ‘आनंद’ ब्रह्म के गुण हैं? यदि ये सब ब्रह्म के गुण हैं, तो फिर ब्रह्म को निर्गुण (गुण-रहित) कैसे कहा जा सकता है? यह एक गंभीर दार्शनिक प्रश्न है। शास्त्र तो ब्रह्म को निर्गुण और निर्विशेष (गुण, आकार, विशेषता से रहित) बताते हैं। विशेष का अर्थ है—जिस वस्तु में लंबाई, चौड़ाई, मोटाई, boiling point, freezing point जैसे गुण या विशेषता हो। जिसमें कोई भी विशेषता न हो, वही निर्विशेष कहलाता है। अब यदि सत्, चित्, आनंद ये तीन विशेषताएँ ब्रह्म में मानी जाएँ, तो क्या यह शास्त्र का उद्देश्य है? नहीं—यहाँ शास्त्रकारों की मंशा कुछ और है।
दरअसल, ब्रह्म असत् नहीं है, इसलिए उसे सत् कहा; वह अचित् नहीं है, इसलिए चित् कहा; उसे दुःख नहीं है, इसलिए आनंदरूप कहा। इसे शास्त्रों में ‘व्यावृत्ति’ कहा गया है—यानी, जो नहीं है, उसे नकारकर जो बचता है, उसका संकेत करना। शास्त्रकारों ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई है ताकि हमें सत्-असत्, सुख-दुःख के अनुभव के बीच सही दिशा मिल सके।
दुःख और चार संकल्प
असल में, हम सभी को असत्, अज्ञान और दुःख का लगातार अनुभव होता है—यह मानव स्वभाव है। कई बार लोगों को लगता है कि ‘अमेरिका में लोग दुखी कैसे हो सकते हैं?’ हमारे यहाँ तो मान्यता है कि वहाँ के लोग कभी दुखी नहीं होते। लेकिन असलियत यह है कि दुःख और असंतोष सार्वभौमिक हैं। यह सोच हमें प्रेरित करती है—यह ‘motivation’ है, जो हमें बार-बार भीतर झाँकने और आगे बढ़ने का आग्रह देती है। परमार्थ की साधना में भी यही प्रेरणा बेहद आवश्यक है।
१. सबसे पहले, ‘मैं दुखी हूँ’—इस सत्य को स्वीकार करना आवश्यक है।
२. दूसरा, ‘मुझे दुःख से मुक्त होना है’—इसका भी भीतर पक्का निश्चय होना चाहिए।
३. तीसरा, ‘मुझे सुखी होना है’—यह भी एक दृढ़ संकल्प बन जाए।
४. और, केवल इतना ही नहीं, बल्कि ‘मुझे सुखरूप बनना है’—यानी मै स्वयं सुख का स्वरूप हूँ यह प्रत्यक्ष अनुभव करना है—यह चौथा और सबसे गहरा संकल्प भीतर जागृत हो।
यह चार चीजे भीतर निश्चित हो तो योग्य motivation मिलेगा। और जब तक यह निश्चित नहीं हो जाता तब तक परमार्थ में motivation नहीं होगा और परमार्थ जैसे करना चाहिए वैसे कर नहीं पाएँगे।
अक्सर कहा जाता है, ‘सुख-दुःख जीवन का स्वरूप है।’ साहित्यकार ऐसे रूपकों का उपयोग विशेष दक्षता से करते हैं—वे कहते हैं, ‘जीवन एक वस्त्र है, जिसमें एक ओर के धागे सुख के हैं और दूसरी ओर के धागे दुःख के।’ और अगर वितरण की बात करें, तो सुख का एक धागा है, पर दुःख के सैकड़ों धागे हैं। अगर हम इस सोच को स्वीकार कर लें, तो जीवन सचमुच कठीण और कष्टप्रद हो जाएगा।
सामान्य जीवन में, प्रपंच में, यह अक्सर देखने को मिलता है कि लोग अपनी अंदर की भावनाएँ दूसरों पर प्रकट नहीं होने देते। हम चाहे भीतर से जितने भी व्यथित हों, हमारी आंतरिक स्थिति दूसरों के सामने व्यक्त न हो, इसका पूरा ध्यान रखते हैं—और रखना भी चाहिए। कई बार घर में रसोई में तकरार चल रही होती है, तभी बाहर दरवाजे की घंटी बजती है। कोई मेहमान आता है, और दोनों मिलकर मुस्कुराते हुए उसका स्वागत करते हैं। मेहमान उन्हे देखकर सोचते है, ‘क्या शानदार युगल हैं—एक-दूसरे के लिए बने हैं!’ यानी, हम इतनी सतर्कता रखते हैं कि भीतर के संघर्ष की आहट बाहर तक न पहुँचे। यह सावधानी जरूरी है कि हमारा दुःख दुनिया पर प्रकट न हो। भले ही जगत को इसका पता न चले, लेकिन अगर हमारे भीतर यह पक्का निर्णय है कि ‘मैं दुखी हूँ’, तो परमार्थ के अलावा कोई मार्ग शेष नहीं रहता। अपने दुखी होने की स्वीकृति भीतर अवश्य होनी चाहिए, पर इसे दुनिया के सामने व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं। पर क्या यह हमेशा आसान है? आम तौर पर हम अपने दुःख का प्रदर्शन करना पसंद नहीं करते, लेकिन, जब भीतर सब कुछ नकारात्मक हो और सिर्फ होंठों पर सकारात्मकता हो, तो यह दिखावा कब तक चलेगा?
‘आखिर यह ध्यान किस लिए है? ‘यह ध्यान (अनियमित मनुष्य) क्या ध्यान कर सकता हैं?’ यह प्रश्न जितना सरल है, उतना ही गूढ़ भी है। जब तक हमें अपने चिंतन के सभी मानदंड (criteria) स्पष्ट नहीं होते—कि इस प्रक्रिया से हमें क्या पाना है—तब तक हम किसी भी साधना में प्रवीण नहीं हो सकते।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि चिंतन का उद्देश्य क्या है, इसका स्पष्ट बोध हो। साधक के लिए सबसे पहले स्वयं का कल्याण प्राथमिक होना चाहिए—यहाँ स्वार्थी होना चाहिए। दूसरे क्या प्राप्त करते हैं, किसे क्या अनुभव होता है, वह मुझसे क्या ले जाता है या मेरी सहायता से क्या बनता है—यह विचार गौण हैं। असली बात यह है कि ‘मेरा कल्याण हुआ है, मैं मुक्त हो गया हूँ’—इसका निश्चय भीतर दृढ़ हो। यही अद्भुत अनुभूति है। आमतौर पर हमारा ध्यान बाहरी बातों पर केंद्रित रहता है, जिससे हम अपने भीतर के, अंतरंग, वास्तविक अनुभवों से दूर हो जाते हैं। जबकि सच्चा अर्थ तो अंतरंग की नियंत्रित स्थिति में है। इसलिए अब हम अंतरंग में स्थित दुःख को पहचानने और समझने का प्रयास करते हैं।
प्रकट और अप्रकट दुःख
दुःख किसे कहते हैं, इसे अच्छे से समझना आवश्यक है। दुःख को दो मुख्य हिस्सों में बाँटा जा सकता है—एक प्रकट दुःख, जो प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई देता है, और दूसरा अप्रकट दुःख, जो भीतर ही भीतर झुलसता है, लेकिन जिसे हम दूसरों के सामने प्रकट नहीं होने देते। मैंने क्या कहा?—एक दुःख जो खुलकर सामने आता है, और एक जो दबा-छुपा रहता है, जिसे हम हर हाल में छुपाने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए, शरीर को चोट लगना, यह एक प्रकट दुःख है; बीमारी आना, यह भी प्रकट दुःख है; व्यापार में नुकसान होना, परिवार में किसी की मृत्यु हो जाना, प्रतिष्ठा का हनन होना—ये सब प्रकट दुःख के उदाहरण हैं। ये वे पीड़ाएँ हैं, जिन्हें समाज भी देख सकता है और जिन पर संवेदना भी प्रकट की जाती है। पर कुछ दुःख ऐसे होते हैं, जो हमारे मन के गहरे तल में छुपे होते हैं—जिन्हें हम दूसरों से छुपाने का पूरा प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए, मत्सर (ईर्ष्या, जलन) की वेदना। आपने सुना होगा—’फलाना व्यक्ति मत्सर से जल रहा है।’ सवाल यह है कि जो व्यक्ति भीतर से जल रहा है, क्या वह कभी सुखी हो सकता है? स्वयं सोचिए, इसका उत्तर तुरंत मिल जाएगा। मत्सर भी कई रंगों-छटाओं में आता है—कभी वह कोमल ईर्ष्या के रूप में, कभी तीव्र द्वेष के रूप में, कभी तिरस्कार या घृणा के रूप में। मूल बात यह है कि मत्सर, द्वेष, तिरस्कार, घृणा—ये सब अंदर ही अंदर पलते हैं, लेकिन इन्हें हम खुलेआम स्वीकार नहीं करते। ‘मुझे आपसे द्वेष है, मैं आपके सुख से जलता हूँ’—ऐसा शायद ही कोई कहे। लेकिन सच्चाई यह है कि जहाँ मत्सर है, वहाँ दुःख अनिवार्य है।
एक और संवेदना है—भय। जहाँ भय है, वहाँ दुःख होना भी निश्चित है। भय के भी अनगिनत रूप और छटाएँ होते हैं। सबसे स्पष्ट भय—जैसे किसी को भूत-प्रेत का डर लगना—ऐसे डर को हम सभी कभी न कभी महसूस करते हैं। लेकिन कई बार यह भय हमारे अंदर सुप्तावस्था में होता है—हम उसे स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसे छुपाते हैं, ढोंग करते हैं। शायद ही कोई प्राणी इंसान से ज्यादा कुशलता से अपना भय छिपा पाए। कई बार मैं कहता हूँ कि ‘मनुष्यों से बढ़कर ढोंग करने में कोई नहीं है।’ मनुष्य के स्थान पर मुझे प्राणी कहना था, किंतु वह कहने का सोचते हुए भी मनमे भय लगा – ये क्या हैं? भय की दुसरी छटा है – Sense Of Insecurity। मैं स्पष्ट कर दूँ, मैं आपके विषय में नहीं कह रहा, बल्कि आम प्रवृत्ति की बात कर रहा हूँ। कभी-कभी तो मजाक में कहा जाता है कि अमेरिका में रहने वालों को कभी insecurity नहीं होती, क्योंकि वहाँ नौकरी करने वालों के साथ अनुबंध होता है कि उन्हें सौ साल तक नौकरी से नहीं निकाला जाएगा! यह बात तो मजे में बोल रहा हूँ, लेकिन गहराई में जाएँ तो जहाँ भी अंदर असुरक्षा का भाव है, वहाँ भय का वास है।
परिवार के संदर्भ में भी अनेक भय हमारे मन में घर कर जाते हैं—‘अब आगे क्या होगा?’, ‘कैसे होगा?’, ‘क्या करना चाहिए?’, ‘कैसे करना चाहिए?’—ये सब सवाल मन में बार-बार उठते हैं। जब ये भाव स्थायी रूप से मन में बस जाते हैं, तो भय का अस्तित्व सुनिश्चित हो जाता है। जहाँ भय है, वहाँ दुःख भी है। यदि मेरे भीतर ये दोनों भाव बार-बार आते हैं, तो यह स्वीकार करना चाहिए कि मैं भयभीत हूँ, मैं दुखी हूँ, सुखरूप नहीं हूँ। यह स्वीकृति भीतर होनी चाहिए, भले ही उसे दुनिया के सामने जाहिर न किया जाए। परमार्थ की राह पर चलने के लिए, अपनी वर्तमान स्थिति को वास्तव के रूप मे स्वीकारना और यह मानना जरूरी है कि ऐसी स्थिति कायम रहना उचित नहीं है—वह अमान्य है, मुझे उसे बदलना है।
मूल रूप से, मैं सुखरूप हूँ—और यह सुखरूपता बाहरी परिस्थितियों के निरपेक्ष है। अपनी भीतरी स्थिति, पारिवारिक परिस्थिति, और सामाजिक परिस्थिति—इन तीनों का सामना अलग-अलग ढंग से करना पड़ता है। भीतर से जूझना एक प्रक्रिया है, परिवार में परिस्थितियों से निपटना दूसरी प्रक्रिया है, और बाहरी समाज से जूझना तीसरी प्रक्रिया है। इन तीनों स्तरों पर संघर्ष के बीचोंबीच होते हुए भी सच्चा सुख मुझसे दूर नहीं है—वह उपलब्ध है। इन तीनों परिस्थितियों से मानसिक दृष्टि से निपटने की क्षमता परमार्थ में है, और यही शास्त्र की व्यवस्था है। यदि यह दृष्टिकोण आप में नहीं है, तो उसे विकसित कीजिए —cultivate कीजिए। यदि यह नहीं किया गया, तो परमार्थ से जो सार्थक प्राप्ति होनी चाहिए, वह नहीं मिल पाएगी। इसीलिए, मैंने इस विषय का इतना विस्तार से उद्देश्यपूर्ण उल्लेख किया है।
जीव के तीन घटक
इस विषय के उल्लेख के पश्चात, अब मैं उस ‘जीव’ की संकल्पना पर विस्तार से चर्चा करना चाहता हूँ, जिसकी विशिष्टता पर मैं, मज़ाक में ही सही, पेटेंट लेने की चेष्टा कर रहा हूँ। शास्त्रकारों ने जिस जीव की संकल्पना प्रस्तुत की है, उसके तीन मुख्य घटक होते हैं, जिनकी चर्चा करना यहाँ आवश्यक है।
१. पहला घटक है—आत्मा।
२. बुद्धि दूसरा घटक, और
३. तीसरा घटक है—आत्मा का बुद्धि में पड़ा हुआ प्रतिबिंब।
यह तीनों—आत्मा, बुद्धि, और बुद्धि में आत्मा का प्रतिबिंब—मिलकर ‘जीव’ नामक संकल्पना को पूर्ण करते हैं। जहाँ कहीं भी ‘जीव’ की चर्चा होती है, वहाँ इन तीन घटकों की उपस्थिति अनिवार्य है। आत्मा का प्रतिबिंब बुद्धि में कैसे पड़ता है, यह विषय सूक्ष्म और जटिल है, क्योंकि आत्मा का कोई रूप नहीं है, कोई आकार नहीं है। हम भौतिक चीज़ों की तरह आत्मा का प्रतिबिंब नहीं समझ सकते—जैसे कोई paper weight पानी में प्रतिबिंबित हो सकता है, क्योंकि उसका आकार है, उसके गुण हैं।
लेकिन आत्मा तो निराकार है, फिर उसका प्रतिबिंब कैसे पड़ेगा? यहाँ ‘प्रतिबिंब’ शब्द का अर्थ आईने मे पडनेवाला भौतिक प्रतिबिंब नही है। यहाँ पर इस शब्द का अर्थ ऐसे ही की आत्मा का ज्ञान-प्रकाश बुद्धि में झलकता है। कभी-कभी ‘छाया’ शब्द भी इसी अर्थ में लिया जाता है, पर इसका अर्थ दिन-प्रतिदिन की छाया/साया नहीं है। फिलहाल, बस इतना समझना पर्याप्त है कि आत्मा का प्रकाश, उसकी चेतना, बुद्धि में किसी रहस्यमय ढंग से प्रकाशित होती है। अभी आप बस स्वीकार कीजिए। आपको क्या करना हैं? – केवल ‘हाँ’ कहना हैं, इसे श्रद्धा कहते हैं। ‘हाँ’ कहने से आपका कोई नुकसान नहीं होगा। आपका ऐसे ‘हाँ’ कहने से क्या होगा? – यदि आप स्वीकार करते हैं कि आत्मा का बुद्धि मे प्रतिबिंब पड़ता हैं, तो उससे मुझे कोई लाभ हैं क्या? प्रवचनकार का कोई लाभ नहीं हैं, शास्त्रकारों का कोई लाभ नहीं, संतों का कोई लाभ नहीं, यदि किसी का लाभ हुआ तो, यदि किसीने लाभ करके लिया तो आपका ही लाभ हैं। इसलिए आत्मा नामक एक प्रकाश होता हैं, जिसे आत्मप्रकाश कहते हैं।
लौकिक तथा अलौकिक प्रकाश
आत्मा का प्रकाश—यह कोई साधारण रोशनी नहीं, बल्कि अलौकिक, दिव्य, ज्ञानमय प्रकाश है। भौतिक जगत में जो भी प्रकाश है—दीपक की लौ, सूर्य का तेज़—वह लौकिक, यानी भौतिक प्रकाश है। लेकिन आत्मा का प्रकाश अ-भौतिक, ज्ञानस्वरूप और अलौकिक है, जिसे ‘ज्ञानप्रकाश’ कहते हैं। आत्मा का स्वरूप ही प्रकाश और चित् है; यहाँ ‘चित्’ का अर्थ है—ज्ञानरूपता,। यह सब विषय जितने सरल प्रतीत होते हैं, उतने ही जटिल भी हैं—और अक्सर इन्हें जानबूझकर भी जटिल बनाया जाता है। ऐसा क्यों? कभी तो शास्त्रों में monopoly (एकाधिकार) बनाए रखने के लिए, ताकि विषय की गहराई या रहस्य को केवल कुछ ही लोग समझ सकें। परंतु, यह स्थिति बेहद दुःखद है। इस आध्यात्मिक क्षेत्र में सत्य को सरल और सुलभ रूप से समझाना ही आवश्यक है, तभी श्रद्धा का बीज अंकुरित होगा। श्रद्धा का अर्थ केवल आँख मूँदकर स्वीकारना नहीं, बल्कि जो गूढ़ कहा गया है, उसे ‘हाँ’ कहकर, खुले मन से स्वीकारना है। इस स्वीकार्यता से हमारा ही परम कल्याण होता है। ‘मैं आनंदरूप ब्रह्म हूँ’—इस विशाल अनुभव की प्राप्ति ही हमारा अंतिम लक्ष्य है। और इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए, पहले जीव की इस तीन घटकों से रची हुई संकल्पना को गहराई से समझना आवश्यक है।
एक है आत्मप्रकाश—जिसमें ज्ञान होता है। यह कल के प्रवचन का विषय है, इसलिए आज थोड़ा सा ओवरलैप हो जाएगा। जिस प्रकाश में दिखाई देता है, उसे ‘दिवा (दीया)’ कहते हैं, और जिस प्रकाश में दृश्य वस्तु का आकलन होता है, उसे ‘देव’ कहते हैं। अब दोनों शब्दों पर ध्यान दें। ‘दिव्’ धातु है। संस्कृत के ‘दिव्’ धातु से ये दो शब्द बने हैं—एक को देव कहते हैं, दूसरा दिवा (रोशनी)। इस बाहर के दीये के प्रकाश में सब दिखाई देता है, यह सत्य है; किंतु जो दिखता है उसका ज्ञान होना आवश्यक है या नहीं? जैसे यह एक गोलक है, मुझे दिखाई दिया, और जैसे ही उसे देखा, उसका ज्ञान हुआ। पर ध्यान रहे, बाह्य प्रकाश में वस्तु दिखती है, किंतु वह वस्तु समझने के लिए भीतर का प्रकाश आवश्यक है। भीतर के इस प्रकाश को ‘ज्ञानप्रकाश’ कहते हैं; उसे ही ‘आत्मा’ कहते हैं, उसे ही ‘ब्रह्म’ कहते हैं, वही ‘कूटस्थ चैतन्य’ है, वही ‘साक्षी’ है, वही ‘चिति’ है। कितने शब्द हुए? इतने शब्द शास्त्रकारों ने इकट्ठे किए हैं। इसकी एक वजह यह नहीं है कि हमारी बुद्धि इसका आकलन न कर पाए; प्रत्येक शब्द का अपना-अपना विशिष्ट अर्थ है। अभी इसे छोड़ देते हैं, फिलहाल इसका विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है।
अब एक प्रश्न है—जिस प्रकाश में ज्ञान होता है, उसे अलौकिक प्रकाश कहते हैं; जिस प्रकाश में दिखाई देता है, उसे लौकिक प्रकाश कहते हैं। दो प्रकार के प्रकाश हैं। दिखाई देने वाली हर वस्तु का हर बार ज्ञान होता ही है—क्या यह निश्चित है? वस्तु दिखी तो उसका ज्ञान होना आवश्यक है क्या? अब यह विचार करने योग्य बात है! हम बहुत कुछ बिन सोचे स्वीकार कर लेते हैं; हम ऐसा क्यों करते हैं? जितनी सहजता से चीजें स्वीकार की जाती हैं, उतनी वे सत्य नहीं होतीं। यदि यह समझ आया, तो परमार्थ के लिए अधिक प्रयास किए जाएंगे।
हमारे घर में मुरगुड में एक दिन गैस पर उबालने के लिए दूध रखा था। दिन था, रोशनी थी। मेरी पत्नी ने कहा, “मैं स्नान करने जा रही हूँ, दूध पर ध्यान दीजिए।” बड़ी जिम्मेदारी थी; मैं आंखें फाड़कर दूध को देखता रहा, पलकें झपकाए बिना देखता रहा, दूध पर पर्याप्त रोशनी भी थी। तभी भीतर वेदान्त का कोई विचार आया; ऐसा वेदान्त का विचार क्या आया कि मेरी आंखों के सामने, देखते ही देखते… जो होना था, वह हो गया, और जब वे स्नान करके आईं, तब जो होना था, वह भी हो ही गया, आप समझ सकते हैं क्या हुआ होगा। अब इससे एक निष्कर्ष निकलता है कि मैंने दूध आंखों से देखा, परंतु उसका मुझे ज्ञान नहीं हुआ; तो देखकर भी ज्ञान होगा ही, यह आवश्यक नहीं। बस, इससे यही निष्कर्ष निकलता है। अर्थात, ज्ञान होने के लिए अंदर की आंखों के पीछे कुछ सचेतन आवश्यक होता है, जो उस समय उपलब्ध नहीं था। वह अन्य विचारों में व्यस्त था, तो उसे जो ज्ञान होना चाहिए था, वह ज्ञान न होकर कुछ विपरीत ज्ञान हुआ। उस ज्ञान को विपरीत ही कहना चाहिए, क्योंकि उस समय वह ज्ञान अपेक्षित नहीं था।
जिसके प्रकाश में समझा जाता है, उसे ज्ञान कहते हैं, उसी को आत्मा कहते हैं, उसी को कूटस्थ चैतन्य कहते हैं, उसी को ज्ञानप्रकाश कहते हैं। तब—“उजेडी राहिले उजेड होऊन। निवृत्ति सोपान मुक्ताबाई॥”—का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। उससे पहले यह केवल एक गीत है; यह ‘पद’ है, जिसे गाया जाता है। यह भी सही है कि जब कोई पद, अभंग लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाता है, तो उसमें कौतूहल पैदा होता है, और लोग उसके अर्थ को जानने का प्रयास करते हैं। हमें ‘जीव’ नामक संकल्पना का ज्ञान प्राप्त करना था, इसी उद्देश्य से इतनी प्रस्तावना कही गई।
टॉर्च-पेपरवेट प्रयोग
यहाँ एक छोटा सा प्रदर्शन हमारे सामने है। ‘Demonstration’ कहें तो स्वीकार नहीं, आजकल तो ‘demo’ कहे बिना कुछ नहीं होता। अब कल्पना कीजिए—यह जो है (प्रकाशमान torch/बैटरी), इसे आत्मा मान लीजिए। यह रोशनी भौतिक प्रकाश है, यह मुझे पता है; लेकिन प्रदर्शन के लिए, प्रयोग के लिए, हम इसे ‘आत्मा’ मानकर स्वीकार करते हैं। अब यह जो आत्मा है, वह स्वयंप्रकाश है, निरंतर प्रकाशित है, कभी बुझती नहीं है, अखंड है। उसके (torch के) जो सेल हैं, यदि समाप्त हो जाएँ, तो यह शांत हो जाएगा—यह बात अलग है। लेकिन आत्मप्रकाश जो है, शरीर हो या न हो, जीवित हो या मृत हो, वह सदा रहता है। यही आत्मा मैं हूँ, इसलिए उसका कभी अंत नहीं होगा।
तो किसका अंत होता है? (दूसरे हाथ में पेपरवेट उठाते हुए) क्या समाप्त होता है? मैं अभी दिखाता हूँ। अब इसे इस तरह समझना है। यह जो टॉर्च चल रहा है, उसे समझने का प्रयास करते हैं—अब यह जो रोशनी है, उसे आत्मा मान लेते हैं। और यह जो है (पेपरवेट), यह बुद्धि है। अब इसे बुद्धि क्यों कहा? Demonstration देने के लिए भी उनमें (तत्त्व में और वस्तु में) कुछ साम्यता होनी चाहिए! अब बुद्धि, यह जो तत्त्व है… यहाँ एकत्रित सभी लोगों की बुद्धि मूल रूप में शुद्ध और स्वच्छ है; तत्पश्चात उस पर संस्कार होते हैं—वासनाओं के संस्कार, गुणों के संस्कार—जिसके कारण वह भिन्न-भिन्न और पृथक दिखाई पड़ती है। किंतु तथ्य यह है कि स्वरूप से यहाँ पर एकत्रित सभी लोगों की बुद्धि बिल्कुल एक जैसी है, एकसी। अब पंचीकरण के शास्त्रानुसार, बुद्धि सत्त्वगुण और अग्नि तत्त्व की है। ‘हाँ’ कहकर स्वीकार कीजिए। अब यहाँ सभी बातों के लिए ‘हाँ’ कहने से किसी और का कोई लाभ नहीं होगा; इससे केवल हमारे भीतर clarity (स्पष्टता) आएगी। उस स्पष्टता के पश्चात जब मैं ध्यानसाधना के लिए आसनस्थ हो जाऊँगा, तो यथार्थ रूप से क्या प्राप्त होना चाहिए इसकी मुझे insight (अंतदृष्टि) होगी, अर्थात ध्यानसाधना से क्या प्राप्त होना अपेक्षित है यह समझेगा। यदि हम इसे समझ पाते हैं, तो वैसा हो रहा है या नहीं इस पर नजर रख पाएंगे। अगर अपेक्षानुसार नहीं हो रहा तो बदलाव कर पाएंगे। यदि हम इसे समझ पाते हैं, तो समझना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है और इसे समझाना दूसरी जिम्मेदारी होती है, दोनों बातें हैं।
बुद्धि तत्त्व शुद्ध/निर्मल है। जो अग्नितत्त्व से बना होता है, वह शुद्ध होता है। जो सत्त्वगुण का बना है, वह भी शुद्ध होता है, और चूँकि मेरी बुद्धि अग्नितत्त्व की है और सत्त्वगुणी है, वह शुद्ध है।
जे तेजतत्त्वाची आदी । जे सत्त्वगुणाची वृद्धी ।
जे आत्मया जीवाची संधी । वसवीत असे जे ॥ (ज्ञाने. १३.८८)
ज्ञानेश्वरी के तेरहवें अध्याय में बुद्धि का यह वर्णन है। यह मैंने क्यों कहा? क्योंकि यह देशमुख जी ने नहीं कहा है, यह आप जान लें, यह बहुत महत्वपूर्ण है। तो ऐसी जो बुद्धि है, जो शुद्ध होने के कारण—क्योंकि जहाँ शुद्धता होती है, वहाँ प्रकाश को भीतर लेने की क्षमता होती है—सरल भाषा में, इसमें प्रकाश बिखर सकता है। अब (पेपरवेट को हाथ में लेते हुए), यह काँच स्वच्छ और पारदर्शक होने के कारण torch की जो रोशनी है, उससे संलग्न रखूँगा तो इसमें (पेपरवेट) प्रकाश अवश्य फैलेगा। यदि यहाँ पत्थर होता तो प्रकाश नहीं फैलता। चूँकि प्रकाश भीतर लेने की क्षमता इस काँच के गोले में है, यह transparent (पारदर्शक) है, इसलिए प्रकाश फैल रहा है। वैसे ही मेरी बुद्धि जो शुद्ध है, और उस शुद्धता के कारण आत्मप्रकाश जो है, ज्ञानप्रकाश जो है भीतर समाने का सामर्थ्य रखती है। यह तीनों मिलाकर आत्मा (प्रकाशित बैटरी), बुद्धि (पेपरवेट) और उसमें फैला हुआ प्रकाश, ये तीन मिलकर ‘जीव’ नाम की संकल्पना तैयार होती हैं। यह एक concept (अवधारणा) है, और इस अवधारणा में तीन घटक स्थायी रूप से शामिल हैं।
जब हम जीव के विषय में चर्चा करते हैं, तो यह स्पष्ट है कि उसमें आत्मा है, उसमें बुद्धि है, और बुद्धि में फैला आत्मप्रकाश है, जिसे चिदाभास कहते हैं। यही चैतन्य का आभास है। ‘बुद्धि में पड़ा’ हुआ प्रकाश—ऐसा बार-बार कहने की आवश्यकता नहीं है।
१. यह (torch) चैतन्य है, आत्मप्रकाश है, लेकिन (प्रकाशित torch को पेपरवेट के पीछे रखते हुए…..)
२. यह (torch द्वारा प्रकाशित पेपरवेट) केवल आभास है, यह सत्य नहीं है।
यदि यह सत्य होता, तो अब देखिए! – एक मजेदार बात है। आत्मा बुद्धि में कभी भी लिप्त नहीं होती, चिपक कर नहीं रहती। बुद्धि के अनुसार उसका व्यवहार कैसा है? – बुद्धि से अलिप्त रहता है। अब यदि यह लिप्त हो जाता, तो जब हम इसे दूर ले जाते, तो क्या उसमें प्रकाश रहता? (पेपरवेट को बैटरी से दूर ले जाते हुए) – प्रकाश नहीं रहता। अर्थात, जब इसमें प्रकाश नहीं रहता, तो प्रकाश इससे लिप्त नहीं होता।
समझने के लिए यह सब बहुत महत्वपूर्ण है! अगर यह समझ लिया जाए, तो इसका (torch और paperweight का) काम समाप्त हो जाएगा। इसे समझने के बाद इसे तुरंत छोड़ देना चाहिए; यह experiment माने मोक्ष नहीं है, और ऐसा नहीं कि यह समझ लेने के बाद हम मुक्त हो जाएंगे। इस क्षेत्र में बहुत सारे खेल होते हैं। हमें सारे खेल समझने हैं, और जब ये खेल समझ में आते हैं, तो हमें यह समझ में आता है कि हम वास्तव में क्या कर रहे हैं और किसके लिए कर रहे हैं। क्या हो रहा है, यह समझ नहीं आता, और हम यह भी नहीं जानते कि क्या होना चाहिए। इसलिए ‘नहीं हो रहा’ कहने का कोई अर्थ नहीं है। जितने प्रश्न होते हैं, उतने जवाब नहीं मिलते! क्या होना है, यह भी स्पष्ट नहीं होता। इसलिए यह समझ पाना कि क्या हो रहा है, यह कैसे पता चलेगा? इसीलिए हमारी जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। हमें यह समझना चाहिए कि ध्यान मे क्या हो रहा है। आत्मा, बुद्धि और बुद्धि में फैला आत्मप्रकाश—इन तीनों को मिलाकर जीव कहते हैं। ध्यान का उद्देश्य यही है कि इसे समझना है।
चिदाभास का मूल में लौटना
यदि आपके ध्यान में यह बात आ गई है कि ध्यानसाधना में क्या परिणाम अपेक्षित हैं, तो अब हम मुख्य विषय पर लौटते हैं—ध्यानसाधना। ध्यानसाधना में क्या परिणाम अपेक्षित हैं? इस (पेपरवेट में) जो प्रकाश है, जो रोशनी है, वह चिदाभास पीछे मुड़ता है। अब इस विषय में एक ओवी बताता हूँ, जिससे आपको विषय की स्पष्टता से समझ होगी और यह भी जान जाएंगे कि हम किस कारणवश इतने कष्ट उठा रहे हैं। ज्ञानेश्वर महाराज की ओवी है—
परतोनि पाठिमोरें ठाके। आणि आपणियातें आपण देखें।
देखतखेवो ओळखे। म्हणे तत्त्व हें मी॥ (ज्ञाने. ६. ३६६)
बस! इतनी ओवी यदि स्मरण रही, और उसका अर्थ आकलन हुआ, तो यह ज्ञान हो जाएगा कि इतने सब कष्ट जो हम उठा रहे हैं, वे किस कारण उठाए जा रहे हैं। हम केवल एक ओवी के लिए इतने कष्ट उठा रहे हैं, सिर्फ एक ओवी को समझने के लिए। इसलिए नामदेव महाराज कहते हैं,
नामा म्हणे श्रेष्ठ। ग्रंथ ज्ञानदेवी। एकतरी ओवी। अनुभवावी॥
कौनसी? यही वाली, ऐसी अर्थपूर्ण ओवी जिसमें मेरे लिए आत्मज्ञान की व्यवस्था हो। मेरा तो ऐसा दावा है कि ज्ञानेश्वर महाराज को भी ज्ञानेश्वरी की ओवियों का उतना अनुभव नहीं है, जितना मुझे है। क्या कहा मैंने? स्वयं ज्ञानेश्वर महाराज को भी ज्ञानेश्वरी मे उनकी स्वयं रची हुई ओवियों का जितना अनुभव नहीं है, उतना अधिक अनुभव मुझे है। इस बात पर एक व्यक्ति क्रोधित हो गया। उसे ज्ञानेश्वर महाराज पर गर्व था! ‘ऐसे कैसे कह सकते हैं आप?’ जब मैंने उसे समझाया, तब वह शांत हुआ। इसका कारण यह है कि ज्ञानेश्वर महाराज ने अज्ञान पर लिखी हुई ओवियों की बड़ी सूची बनाई है। ज्ञान किसे कहते हैं, अज्ञान किसे कहते हैं, इसकी बड़ी सूची है, रजोगुण किसे कहते हैं, बड़ी-बड़ी सूचियाँ हैं। सत्वगुण किसे कहते हैं, तमोगुण किसे कहते हैं—बड़ी सूची है। ऐसी सभी ओवियों में से एक भी ओवी का उन्हें अनुभव नहीं है, किंतु मुझे है। तो अब मेरा विधान सत्य है या असत्य? ऐसा विचार किया जाए तो दैवासुरसंपद विभाग योग में जो आसुरी संपत्ति की लंबी सूची है, उसमें से एक भी ओवी का माउली ज्ञानेश्वर महाराज को कोई अनुभव नहीं है, किंतु हम इसमें माहिर हैं।
ऐसा विचार करने पर आप स्वयं स्वीकार करेंगे कि मेरा विधान सत्य है। इससे यह विवेक करना संभव है कि ९००० ओवियों की ज्ञानेश्वरी में किस ओवी का अनुभव साधक को करना चाहिए। अनेक ओवियाँ दृष्टांत की हैं, कुछ ओवियाँ सिद्धांत की हैं, कई ओवियाँ निष्कर्ष अवगत कराती हैं, अन्य ओवियाँ तत्वज्ञान सूचित करती हैं, कुछ प्रमाण दर्शाती ओवियाँ हैं, जिन्हें दृष्टांतों से समझाया गया है, ऐसी दृष्टांत की ओवियाँ भी हैं। तत्वज्ञान, दृष्टांत और उसका निष्कर्ष अवगत कराने वाली ओवियाँ हैं। तुकाराम महाराज के अभंग में ‘तुका म्हणे’ जहाँ भी अंत के पद पर आता है, वहाँ निष्कर्ष सूचित होता है। पहले पाँच-छह चरण होते हैं, और अंत के चरण में निष्कर्ष आता है। यदि इस प्रकार विचार किया जाए, तो ९००० ओवियों में ऐसी कितनी ओवियाँ हो सकती हैं जिनका मुझे अनुभव प्राप्त करना है? – बहुत ही अल्प ओवियाँ। इसलिए सतत केवल यांत्रिक पद्धति से पाठ मत कीजिए। अज्ञान की ओवियों का पाठ करने पर कोई लाभ नहीं होगा। यहाँ पर जिस ओवी का विचार कर रहे है (परतोनि पाठिमोरें ठाके), इसमें हमारे कल्याण की व्यवस्था है। इसका एक बार गंभीर अध्ययन कीजिए। जितनी आवश्यक लगें, उतनी ओवियाँ चुनिए, उनका अधिक अध्ययन कीजिए, इस प्रकार स्वयं के लिए स्वनिर्धारित ज्ञानेश्वरी बनाइए—बेचने के लिए नहीं। अन्यथा, concise (संक्षिप्त) ज्ञानेश्वरी, मूल्य दो सौ रुपये और पेटेंट (सर्वाधिकार), सभी अधिकार लेखक के, इसमें से एक भी शब्द का कहीं और उपयोग करने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी—ऐसे विचार परमार्थ में कभी नहीं होने चाहिए। परमार्थ में ऊपर प्रस्तुत ओवी के चिंतन से एक constructive (रचनात्मक) दिशा मिलती है—बल्कि ऐसी constructive दिशा होना आवश्यक है।
हमारा विचार आगे बढ़ रहा है, परंतु ‘परतोनि पाठिमोरें ठाके’। अब यह ‘परतोनि पाठिमोरें ठाके’ (पीछे मुड़कर देखना) कौन करता है? और हमें यह कैसे पता चलेगा? इसका उत्तर यह है: जो प्रकाश है ( प्रकाशित टॉर्च से पेपरवेट में फैला प्रकाश), वही प्रकाश पीछे मुड़ता है। यह प्रकाश पीछे से आया है, इसलिए उसे पीछे मुड़ना ही है। अब पीछे कहाँ? इस प्रकाश को उसकी दिशा में, यानी टॉर्च की रोशनी की ओर मुड़ना है। पेपरवेट का जो प्रकाश है, उसे टॉर्च के प्रकाश, यानी मूल स्रोत की ओर मुड़ना है—इसीलिए ‘परतोनि पाठिमोरें ठाके’ का अर्थ है पीछे मुड़ना। यहाँ दो शब्दों का प्रयोग हुआ है—‘पाठमोरे’ यानी पहले मुड़ना; वस्तुतः ‘परतणे’ शब्द का अर्थ ही है पीछे मुड़ना। तो फिर ‘पुन्हा पाठमोरे’ क्यों कहा गया?—यदि आप अध्ययन करेंगे, तभी इसका अर्थ समझ पाएंगे! केवल पाठ करेंगे, तो ‘राम-कृष्ण-हरी’! जैसे चल रहा है, चलने दीजिए… अधिक पुण्य संचित कर पाएंगे। पुण्य संचित हो, तो उसका उपयोग आगामी जन्म में होगा। जो पुण्य आगामी जन्म के लिए संचित करता है, वह पुनर्जन्म की व्यवस्था बनाए रखता है। यह कैसी विडंबना है! मुझे मुक्त होना है, अर्थात् मुझे आगामी जन्म नहीं चाहिए, और ऐसे विपरीत विचारों से पुनर्जन्म की व्यवस्था रखना! ऐसी मूढ़ता केवल परमार्थ में ही संभव है। यह सब समझाने का कारण यह है कि ये अनुभवजन्य बातें हैं। इन्हें व्यक्त करने का कारण यह है कि मेरी अपेक्षा है कि आप सभी लोग भी इन्हें दूसरों को समझाएँ। सभी से आग्रहपूर्वक निवेदन है कि अपनी जो भी क्षमता है, उसका पूर्ण उपयोग करें और अन्य सभी को भी समझाएं। I am not going to sue you for three billion dollars. (मैं आप पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं करूँगा और ३ अरब डॉलर की मांग नहीं करूँगा।)
सोहम् और अभय
अब ‘परतोनि पाठिमोरें ठाके’। इसमें जो प्रकाश है, वह पीछे मुड़ता है और कहाँ ‘ठाकतो’ (वापस आता है)? ‘परतोनि पाठिमोरें ठाके’। (टॉर्च के प्रकाश की ओर संकेत करते हुए) यहाँ स्रोत की ओर ‘ठाकतो’—वापस आता है। और उसके पश्चात क्या करता है?—‘आणि आपणियातें आपण देखें।’ कितने ‘आपण’ हुए? ओवी में दो ‘आपण’ हैं। ‘आपणियातें आपण’ अर्थात वह स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन करता है। इसमें (पेपरवेट के भीतर) जो है, वह जीवरूप मै हूँ, और इसमें (टॉर्च के भीतर) जो है, वह आत्मरूप मै हूँ । ‘आपणियातें’ अर्थात स्वयं को। स्वयं ही स्वयं का दर्शन करता है।
समर्थ रामदास स्वामीजी ने इसे और भी अधिक सुलभ बनाकर समझाया है—पाहावें आपणासि आपण। या नांव ज्ञान॥ (दास.५-६-१)। यह ओवी दासबोध में है। इस ओवी का मुख्य तात्पर्य यह है कि ध्याता और ध्येय के रूप में दो ‘आपण’ हैं—एक ‘आपण’ ध्येयरूप है और दूसरा ध्याता है। ध्यान की प्रक्रिया मे ध्याता को ध्येय का दर्शन करना है। स्वयं को स्वयं का दर्शन करना है। यह कैसे करना है? और पश्चात क्या कहना है?—एक, आपणियातें आपण देखें (स्वयं ने स्वयं का दर्शन किया), और पश्चात क्या कहा?—म्हणे तत्त्व हें मी (यह तत्त्व मैं हूँ), ऐसा पेपरवेट ने कहा। यह मैं हूँ। इसमें (पेपरवेट का) प्रकाश कहता है कि यह (टॉर्च का) प्रकाश मैं हूँ। इसे कहते हैं—सः अहम्।
अहम् कौन है?—यह (पेपरवेट में) है। सः कौन है?—यह (टॉर्च में) है। यह अहम् क्या कहता है?—सः मैं हूँ। ‘यह मैं हूँ’, जब ऐसा कहा जाता है, तो उस कथन में बहुत गहरा आश्रय है। क्योंकि वह आया कहाँ से? इस (पेपरवेट के) प्रकाश का स्रोत क्या है? यही (टॉर्च) है। इससे (टॉर्च से) आया नहीं, बल्कि उसी का है यह प्रकाश । और सत्य तो यह है कि वह इसमें (पेपरवेट में) आया ही नहीं है। यदि आया होता, तो इसमें (पेपरवेट में) सदैव निवास करता। अब यदि इसे (टॉर्च) हटा दें, तो क्या होता है?—कुछ नहीं, इसमें (पेपरवेट में) कोई प्रकाश नहीं रहता।
अब तात्पर्य यह है कि वास्तव में यह प्रकाश इसमें (पेपरवेट में) आया है, ऐसा भ्रम होता है, इसलिए इसे चिदाभास कहते हैं—चैतन्य का आभास। जब मृत्यु आती है, तब यह (चिदाभास) चला जाता है। किंतु यह आत्मप्रकाश (टॉर्च का प्रकाश) है, यह न आता है, न जाता है—और यदि यह निर्णय हो जाए कि ‘मैं हूँ’, तो मैं आया नहीं, और चूँकि मैं आया नहीं, तो मैं जाऊँगा भी नहीं। सोऽहम्। इसलिए मृत्यु का भय नहीं रहेगा। जिसे मृत्यु से निश्चयपूर्वक भय नहीं लगता… निश्चयपूर्वक, हाँ! अन्यथा बहुत लोग डींग मारते रहते हैं कि ‘हमें मरने से ज़रा भी भय नहीं लगता’… ऐसे हाथ उठाकर बात करते हैं। यह हाथ उठाना कब तक है? जब तक यौवन है। और जैसे ही थोड़ा वृद्ध हो जाते हैं, वैसे ही हाथ बंध जाते हैं। इसका कारण है—‘अनिवार्य’, जो घटित होना ही है। इस अनिवार्य मृत्यू को यदि प्रारंभ से ही प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया है—मरणाचे स्मरण असावे (मृत्यु का स्मरण रहे) ऐसा समर्थ रामदास स्वामीजी कहते हैं—तब मृत्यु का भय नहीं रहता।
परमार्थ के विषय में एक भ्रांति या मिथ्याबोध है—अक्सर परमार्थ को लेकर लोगों में बहुत भय व्याप्त किया जाता है। दुःख, दुःख, दुःख, दुःख… ‘सर्वं शून्यम्, सर्वं क्षणिकम्’ जैसी बातें कही जाती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है! इसी को तो Reality check कहते हैं। यहाँ के कुछ शब्द मुझे अच्छी तरह याद आ गए हैं। अब मैं यहाँ हूँ, इसलिए मैं प्रतिदिन आपका वर्तमान पत्र पढ़ता हूँ। पत्र पढ़ने का उद्देश्य यही है कि जिस देश में मैं हूँ, उसके बारे में जानकारी हो; इसलिए पत्र पढ़ता हूँ।
इस स्थिति में हम विचार करते हैं—परतोनि पाठिमोरें… अब इस प्रसंग से आपको यह ज्ञात हो गया होगा कि यह (पेपरवेट का) जो प्रकाश है, वह पीछे मुड़ता है और यहाँ (टॉर्च में) वापस आकर कहता है, ‘यह मैं हूँ’। इसे कहते हैं—सः अहम्। जो ‘सः’ वही ‘अहम्’ है। यह (टॉर्च का प्रकाश—आत्मा) ‘सः’ है, और यह (पेपरवेट का प्रकाश—चिदाभास) ‘अहम्’ है। अब यह निश्चय स्पष्ट हो गया। चिदाभास का ‘सः अहम्’ यही निश्चय ध्यानावस्था में होता है, और यह एक महत्वपूर्ण घटना है—यदि वास्तव मे मेरा ध्यान पूरी तरह केंद्रित हो गया हो, which is extremely difficult… (यह दुसाध्य घटना है।)
जो लोग कहते हैं कि मैं एक घंटे तक ध्यान करता हूँ, वे असत्य बोल रहे हैं। मैं यह विधान करता हूँ, और ऐसा कहने के पीछे एक कारण है—एक घंटे तक ध्यान करना असंभव है। हम एक घंटे तक ध्यान करने का प्रयास करते हैं, यह सत्य है, और एक घंटे के प्रयास के बाद एक क्षण ध्यान संभव होता है, यह भी सत्य है। इसे यहीं छोड़ते हैं, ‘रामकृष्णहरि!’ मुझे किसी से बहस नहीं करनी है; परंतु यह भी सत्य है कि जो वास्तविक ध्यान की स्थिति है, सच्ची ध्यानावस्था, वह कितने समय के लिए स्थिर रहती है? विचार कीजिए—जिस क्षण मन में एक भी विचार नहीं है, शरीर में कोई स्वैच्छिक संचलन नहीं है, मन शांत है, बुद्धि में कोई हलचल नहीं है, किंतु यह शून्यावस्था नहीं है। वह (शून्यावस्था) एक अलग विषय है। इन सब विचारों के पश्चात यदि प्रमाणिकता से विचार किया जाए, तो ध्यानावस्था की यह स्थिति अत्यंत अल्पजीवी होती है—बहुत अल्प समय तक ही टिकती है। और क्या होता है?
तीन देह का विस्मरण
अब इस प्रश्न को सुलझा लेते हैं। यह जो प्रकाश है (पेपरवेट का प्रकाश), वह यहाँ (टॉर्च में) आता है, इसका क्या अर्थ है? यहाँ आता है—इसका वास्तविक अर्थ क्या है? इसका (पेपरवेट का) प्रकाश यहाँ (टॉर्च में) आता है—यह सही है! लेकिन ‘आता है’ का क्या मतलब है? अंततः वास्तव में होता क्या है? अब एक विचार है—यह (पेपरवेट) बुद्धि है। जब यह बुद्धि पूरी तरह निवृत्त हो जाती है, जब बुद्धि का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है, तब यही महत्वपूर्ण घटना है। यदि वास्तव में ध्यान केंद्रित हो जाए, तो तीनों देहों का निरास हो जाता है।
अब यह एक विशिष्ट सिद्धांत है—तीन देह हैं: एक स्थूल देह, एक सूक्ष्म देह और एक कारण देह। जब तक इन तीनों देहों का निरास नहीं होता, ध्यान सिद्ध नहीं होता। इसका कारण यह है कि ‘तीनों देहों के निरास होने’ का अर्थ है कि ‘तीनों देहों का विस्मरण हो गया हो’। तीनों देहों के विस्मरण का अर्थ ‘बुद्धि का विस्मरण’ है। मैं ध्यानसाधना के लिए आसनस्थ हूँ—यह प्रतीति जब शेष नहीं रहती, अर्थात् ‘मैं ध्यानसाधना में बैठा हूँ’ तब पुनः प्रश्न उपस्थित होता है—मैं अर्थात कौन? यह कौन है जो ध्यानसाधना में आसनस्थ है?—वह यह (पेपरवेट का प्रकाश) चिदाभास है। ध्यानसाधना का कर्ता इस आत्मप्रकाशमें (टॉर्च के प्रकाश में) विलीन होने का प्रयास करता है। वह स्वयं को विलोपित करने का प्रयत्न करता है; वह चाहता है कि बुद्धि का विस्मरण हो। और जब बुद्धि की विस्मृति का प्रयास सफल होता है, जितने कालावधि के लिए सफल होता है, उतने समय के लिए इसका (पेपरवेट का) प्रकाश इसमें (टॉर्च में) विलीन हो जाता है। माने चिदाभास आत्मसवरूप मे विलीन हो जाता है । इसका (पेपरवेट का) प्रकाश इसमें (टॉर्च में) विलीन होने की जो स्थिति है, उसी अंतराल को ‘ध्यान’ कहते हैं, उसे ही ‘समाधि’ कहते हैं। और वह स्थिति कितने समय तक बनी रहती है—यह हर व्यक्ति स्वयं अभ्यास करे और अपने पास गुप्त रखे। कितने समय के लिए, कितने क्षणों के लिए हम समाधि में रहे, हमारा ध्यान स्थिर रहा—यह स्वयं अनुभव करें।
इस विचार का मुख्य कारण यह है कि हमारा प्रारब्ध हमें इसमें (आत्मप्रकाश से एकरूप अवस्था में) बने रहने नहीं देता। अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रारब्ध हमें (आत्मप्रकाश से एकरूप अवस्था में) टिके रहने से रोकता है और फिर हमें (बुद्धि में) बलपूर्वक लौटने के लिए विवश करता है। परंतु लौटने के बाद भी (चिदाभास की) पुष्टि हो जाती है कि मेरा वास्तविक स्वरूप यह (आत्मप्रकाश) है। यह (चिदाभास) मेरा मूल स्वरूप नहीं है—यही मुख्य बात है। यदि कभी (चिदाभास ने) यह ‘वारी’ (फेरा) किया हो—यह किसका फेरा है? उसे आत्मवारी कहते हैं। यदि प्रत्येक दिन ऐसी आत्मवारी कर ली जाए, और (चिदाभास के) प्रकाश ने (आत्मप्रकाश का) रोज दर्शन किया हो—यहाँ ‘दर्शन’ का अर्थ है साक्षात्कार होना कि ‘वह (आत्मप्रकाश) मैं हूँ’, और अत्यंत धैर्य से इसका अनुभव किया जाए, तो लौटने के बाद भी (चिदाभास का) निश्चय बना रहता है कि मैं मूलतः यह नहीं हूँ। इसे बाध करना कहते हैं—जीवदशा का बाध हो जाता है। इसलिए—
देहेबुद्धि ते आत्मबुद्धी करावी । (मनो. १६३)
विवेकें कुडी कल्पना पालटीजें । (मनो. ४०)
ऐसा समर्थ रामदास स्वामीजी कहते हैं—इसका अर्थ है कि जीवबुद्धि का त्याग कीजिए।
‘मैं यह जीव (चिदाभास) हूँ’—इस धारणा का त्याग कर ‘मैं यह (आत्मप्रकाश) हूँ’ ऐसा निश्चित करें। यदि ‘सः अहम्’ (यह मैं आत्मप्रकाश) की निश्चितता हो जाए और जब वह (चिदाभास) बुद्धि में लौटे, तो वह पूर्ववत नहीं रहता—उसमें यह धारणा बन जाती है कि ‘यह मैं’ (चिदाभास) सत्य नहीं हूँ। इसके (बुद्धि के) संपर्क में जो मैं हूँ, वह सत्य नहीं है—‘यह (आत्मप्रकाश) ही मैं सत्य हूँ।’ तब इसके (बुद्धि के) संपर्क में आने से जो भी विकार उत्पन्न होते हैं, उन विकारों से मेरा कोई संबंध नहीं रहता—‘करुन अकर्ता’ (करके भी अकर्ता)।
ध्यान दें—कर्ता यह (चिदाभास) है, जबकि यह (आत्मा) कुछ भी नहीं करता। यह पूरी तरह निष्क्रिय और अक्रीड है। जो आत्मज्ञानी होते हैं, वे स्वयं निष्क्रिय नहीं रहते, इसका कारण यह है कि वे इसमें (बुद्धि में, चिदाभास रूप में) पुनः प्रवेश करते हैं। हम यह देखते हैं कि ज्ञानेश्वर महाराज इसमें (बुद्धि में—शरीर में) लौटते हैं, रामदास स्वामी लौटते हैं, शंकराचार्य लौटते हैं—वे लौटकर कार्य कर सकते हैं। आत्मा से एकरूप अवस्था में रहते हुए कार्य संभव नहीं है। चूंकि आत्मा निष्क्रिय है, इसलिए उसमें रहकर कोई कार्य नहीं किया जा सकता; इसीलिए (शरीर में, बुद्धि में) आना अनिवार्य है। But they come by choice, and we have to come!
ऐसी कुछ भिन्नताएँ स्मरण रखें—जब ये भिन्नताएँ स्मरण में रहती हैं, तब हमें सत्य का ज्ञान हो जाता है। सत्य का ज्ञान होने पर insight आती है; और जब यह insight प्राप्त हो जाती है, तब जो ‘गौडबंगाल’ (रहस्यमय) है, उसे हम समझ सकते हैं। ऐसा होने पर उसका रहस्य मिट जाता है। जब रहस्य सुलझ जाता है, तो यह ठीक है, यह सही है, यह feasible (संभव) है—यह मैं कर सकता हूँ, अनुभव कर सकता हूँ; आखिर अनुभव असंभव क्यों हो? ऐसा विश्वास बन जाता है। ऐसा विश्वास निर्माण के लिए शास्त्रों की प्रणालियों की आवश्यकता होती है, इसलिए कृपया शास्त्रों से दूर न जाएँ। शास्त्र का भय भी न रखें—शास्त्र हमारा कल्याण करते हैं। यदि शास्त्रों पर ऐसा विश्वास रहेगा, तो ‘हमें आपके शास्त्रों की कोई आवश्यकता नहीं।’ ‘आपके’ यह जो शब्द हैं… सभी संतों ने—तुकाराम महाराज, समर्थ रामदास स्वामीजी—शास्त्र का अवलंब किया। शास्त्र का उपयोग करने के बाद, उन्हें जो अनुभव हुआ, उस अनुभव का रूपांतरण अध्यापन में किया और शास्त्र को सरल वाणी में हमारे समक्ष प्रस्तुत किया। अभी यहाँ हम क्या कर रहे हैं? जो वेदांत हैं, जो शास्त्र हैं, उन्हें अति सरल पद्धति और स्पष्ट वाणी में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसा प्रस्तुत करने का उद्देश्य यही है कि हम जिसे मैं, मैं, मैं समझते हैं, वह वास्तव में कौन है—यह हमें समझ में आए। यह (टॉर्च का प्रकाश—आत्मप्रकाश) मैं हूँ, वही वास्तविक मैं हूँ।
सुषुप्ति और आत्म-आनंद
नींद किसे आती है?—चिदाभास को आती है। प्रतिदिन जब इसे (पेपरवेट का प्रकाश—चिदाभास) नींद आती है, तो वह यहाँ (टॉर्च में—आत्मप्रकाश मेंं) लौटता है। कहाँ लौटता है?—इसी (टॉर्च में—आत्मप्रकाश में)। मुख्य बात यह है कि चिदाभास प्रतिदिन आत्मप्रकाश में लौटता है; इसलिए गहरी निद्रा में आत्मा का आनंद अनुभव होता है। आत्मा कैसी है?—सद्रूप, चिद्रूप, आनंदरूप है। इसमें (चिदाभास में) जो प्रकाश है, वह निरंतर बुद्धि के संपर्क में रहा है, जिससे उसे भ्रम हो गया है कि ‘मैं देह हूँ’, ‘मैं सुखी हूँ’, ‘मैं दुखी हूँ’, ‘मैंने जन्म लिया है’, ‘मैं अब जीवित हूँ’, ‘मेरी मृत्यु होगी’। ऐसे वचन बुद्धि के संबंध के कारण उत्पन्न हुए हैं और ऐसे ही भ्रम भी उत्पन्न हुए हैं। गहरी निद्रा में (पेपरवेट का प्रकाश) (टॉर्च में) (चिदाभास—आत्मप्रकाश में) विलीन हो जाता है। यह (आत्मप्रकाश) आनंदरूप है, इसलिए गहरी निद्रा में आनंद की अनुभूति होती है। यही मुख्य बात है: गहरी निद्रा का आनंद इसलिए मिलता है, क्योंकि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार कुछ भी कार्य नहीं करते, सभी निवृत्त हो जाते हैं। जिस समय बुद्धि निवृत्त होती है, मन निवृत्त होता है, अहंकार निवृत्त होता है, चित्त निवृत्त होता है—तब हम सभी को आत्यंतिक आनंद की अनुभूति होती है। अब एक सरल कल्पना कीजिए—यदि ये सभी तत्त्व जागृति में भी निवृत्त हो जाएँ… समझना सरल है: यदि सचेत अवस्था में, जाग्रत रहते हुए, मैं मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को शांत कर पाऊँ, तो जो आनंद गहरी निद्रा में अनायास (involuntarily) प्राप्त होता है—जो ईश्वर की योजना से मिलता है—वह आनंद मुझे मेरे स्वयं के प्रयास से भी मिल सकता है।
मेरे साधना करने पर वह प्राप्त हो जाएगा, और जब मेरी साधना से वह उपलब्ध हो जाएगा, तब मुझ पर जो पुराने संस्कार हैं, वे नष्ट हो जाएंगे—हमारे प्रयास से वे नष्ट किए जा सकते हैं। जब हम गहरी निद्रा से जागृत होते हैं, तब सभी संस्कार पूर्ववत लौट आते हैं। कल्पना कीजिए, गहरी निद्रा में या स्वप्न में मैं contract bridge (ताश का एक खेल) खेल रहा हूँ, शनिवार रात के तीन बजे तक—three notram, double, re-double (ताश की बाजियाँ)… गहरी निद्रा में भी, स्वप्न में भी re-double, इसका कारण यह है कि गहरी निद्रा में भी जागृति के संस्कार विद्यमान रहते हैं। और जिसके संस्कार जिस प्रकार के होते हैं, वे उसी प्रकार से स्वप्न में प्रकट होते हैं। होता यह है कि गहरी निद्रा से जब जगते हैं, तब पूर्व दिवस के संस्कार अथवा अनंत जन्मों के संस्कार ज्यों के त्यों लेकर बुद्धि सचेत होती है। किंतु जब हम बुद्धि को स्पष्ट रूप से पहचान लेते हैं कि ‘यह प्रकाश’ (चिदाभास) तुम नहीं हो और ‘यह प्रकाश’ (आत्मा) तुम हो, तब बुद्धि से सभी प्राचीन संस्कार—उदाहरणार्थ ‘मैं क्रोधी हूँ’—नष्ट हो जाते हैं।
जिस कारणवश यह चिंतन चल रहा है, वह यह है कि बुद्धि के जो धर्म हैं, वे ऐसे धर्म हैं जिनका मैं क्रमशः त्याग करता जा रहा हूँ। बुद्धि के धर्मों का त्याग कर मैं इसमें (आत्मतत्त्व में) प्रवेश करता हूँ और क्रमशः इसके धर्म को स्वीकार करता हूँ। अब इसके (आत्मतत्त्व के) धर्म क्या हैं?—सत् रूप, चित् रूप, आनंदरूप। जब यह अनुभव की अवस्था आती है, तभी—
संत आनंदाचे स्थळ। संत सुखचि केवळ।
नाना संतोषाचे मूळ। ते हे संत॥ (दास. १.५.१६)
यह (चिदाभास) क्लेश का स्थान है—यहाँ अखंड दुःख है। इसलिए जो भी कष्ट हैं, वे सब इसी के कारण हैं। सभी पीड़ा और क्लेश इसी से उत्पन्न होते हैं। ‘मैंने जन्म लिया’, यह भी इसमें है; ‘मैं अब जीवित हूँ’, यह भी इसमें है; ‘मैं वेदांत का अध्ययन कर रहा हूँ’—यह भी इसी (बुद्धि मेंं) है।
‘आत्मा जीवित नहीं है’, यह विधान उचित है या अनुचित? ‘जीवित’ शब्द में ‘जीव’ है या नहीं? जीवित शब्द में ही जीव का समावेश है। किंतु इसमें (आत्मा में) बुद्धि न होने के कारण, वह जीवित नहीं है; और आत्मा को यह (बुद्धि) न होने के कारण, आत्मा जीवित कैसे हो सकती है? तो फिर क्या आत्मा मृत है? और दूसरा प्रश्न—वह मृत क्यों नहीं हुई?—जिसका जन्म ही नहीं हुआ, वह जीवित भी कैसे हो सकता है, और उसकी मृत्यु भी कैसे हो सकती है? इसलिए आत्मा न जीवित है, न मृत; और ‘वह मैं हूँ’।
तर्क बहुत सरल है—आत्मा को कभी जन्म ही नहीं हुआ, इसलिए वह न जीवित है, न उसकी मृत्यु होती है। जब यह ज्ञान दृढ़ हो जाता है, तब आत्मा का अज, अजर, अमर स्वरूप स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। तब तक इसका पुनरुच्चारण करते रहें—आत्मा अज, अजर, अमर है। आगे प्रश्न उठता है: वह आत्मा तो अज और अमर है, लेकिन मैंने निश्चित रूप से जन्म लिया है। यदि मेरे जन्मदिन को कोई भूल गया, तो विचार आता है—‘सबके लिए इतने कष्ट उठाए, और मुझे फोन तक नहीं किया।’ उस दिन भी वेदांत का अध्ययन चल रहा होता है! आत्मा अज, अजर, अमर है, और ‘वह मैं हूँ’—हमारी सोऽहम् साधना अच्छी तरह चल रही है। यदि ऐसी साधना प्रगाढ़ होती जाए, और जो ‘सः’ है, वह ‘मैं’ हूँ—ऐसी अनुभूति गहरी होती जाए, तो स्मरण रहे कि यदि ‘सः’ का कभी जन्म नहीं हुआ, तो मेरा भी जन्म नहीं हुआ। यदि मेरा जन्म नहीं हुआ, तो मेरा जन्मदिवस भी नहीं होगा, और इसलिए अभिनंदन की कोई आवश्यकता भी नहीं। किंतु यदि किसी ने अभिनंदन नहीं किया, तो वही चक्र दोबारा शुरू हो जाता है—‘जिनके लिए इतने कष्ट उठाए, जीवन का सर्वस्व अर्पण किया, खून पसीना एक किए, इ.—इसे wailing कहते हैं। सारा समाज बच्चों के विषय में ऐसीही कुछ पंक्तियों में उलझा रहता है। आप सबके लिए अभी समय है, क्योंकि आपके बच्चे अभी उस उम्र तक नहीं पहुँचे हैं। लेकिन शीघ्र ही वे भी वहाँ पहुँच ही जाएँगे—ऐसी परिस्थिति कभी न कभी आ ही जाती है, यही मेरा आशीर्वाद है!
कवडसा दृष्टांत व सहजावस्था
परमार्थ शास्त्र के विषय में यदि इस प्रकार सुंदरता से विचार किया जाए, तो ध्यानसाधना का वास्तविक स्वरूप समझ में आता है। एक अंतिम दृष्टांत प्रस्तुत करता हूँ। एक उदाहरण से समझाता हूँ, ताकि समझने में सरलता हो। एक कुटिया होती है—घास-पत्तों की बनी हुई। उस कुटिया की छत में घास के कारण एक छिद्र होता है। जब सूर्य की किरणें उस छिद्र से होकर दीवार पर पड़ती हैं, तो उसे ‘कवडसा’ कहते हैं। यहाँ ‘कवडसा’ जीव है, और सूर्य आत्मा है—कल्पना कीजिए कि सूर्य आत्मा है और ‘कवडसा’ जीव है।
कवडसा क्यों बन गया? कवडसा के निर्माण में कितने घटकों का योगदान हैं?
१. सूर्य आवश्यक हैं,
२. छिद्र आवश्यक हैं,
३. दीवार आवश्यक हैं।
इन तीन घटकों के बिना, कवडसा का निर्माण संभव नहीं है। अब कल्पना कीजिए—यदि कवडसा को सूर्य के समीप जाना हो, तो क्या आवश्यक होगा? सीधी सी बात है, यदि छिद्र नष्ट हो जाए, तो कवडसा कहाँ जाएगा?—जहाँ से आया था, वहीं लौट जाएगा। लेकिन वास्तव में, क्या कवडसा कभी प्रकट हुआ था? यदि गहराई से विचार करें तो, यदि कवडसा वास्तव में आया होता, तो छिद्र बंद करने के बाद भी क्या वह दीवार पर दिखाई देता? छिद्र के बंद होने पर कवडसा दीवार पर नहीं दिखता, अर्थात् कवडसा कभी आया ही नहीं था। तो फिर उसका दर्शन कैसे हुआ? क्या यह भ्रम था या सत्य? सोचिए, वह असत्य था या सत्य? यदि असत्य कहें तो अभी-अभी दिख रहा था; यदि सत्य कहें तो न आरंभ में था, न अब है। तो फिर कवडसा कैसा है?—मिथ्या।
वैसे ही जीव कैसा है? कवडसा के विषय में कहना तो ठीक है, लेकिन यह गांठ कैसे खुलेगी? दृष्टांत के लिए यह स्वीकार्य है, किंतु… जैसे कवडसा मिथ्या है, वैसे ही इसका (पेपरवेट का प्रकाश—चिदाभास) प्रकाश भी मिथ्या है। और वह ‘मैं हूँ’—इस कारण, जो जीव संबोधित ‘मैं’ है, वह भी मिथ्या है; जबकि इसमें (टॉर्च में—आत्मप्रकाश) जो ‘मैं’ है, वह सत्य है। वही कवडसा ‘परतोनि पाठिमोरें ठाके’—वही ओवी कवडसा पर भी लागू होती है। वह कवडसा वापस सूर्य के समीप जाकर कहता है, ‘मैं सूर्य हूँ’। जैसे यह कवडसा के लिए उपयुक्त है, वैसे ही यदि ध्यान पूरी तरह स्थिर हो जाए, तो इसमें (पेपरवेट में) जो बुद्धि है, वह निवृत्त हो जाती है; और उसके पश्चात उसमें जो चिदाभास है—जब बुद्धि निवृत्त हो गई (पेपरवेट की)—वह (चिदाभास) पीछे मुड़ता है और कहाँ जाता है? जहाँ से आया था, वहीं लौट जाता है। वैसे इसमें (पेपरवेट का) प्रकाश कहाँ जा सकता है?—जहाँ से आया था, वहीं।
यदि यह स्मरण में रहा, और चिदाभास ‘सः अहम्’ कहने लगे, तथा बुद्धि के द्वारा नियमित सोऽहम् साधना का अभ्यास हो जाए, तो एक दिन इस निर्णय में सहजता आ जाती है। तब उसकी कृत्रिमता दूर हो जाती है। कृत्रिमता के हट जाने और सहजता के आ जाने पर ही हमारा कार्य साध्य हो जाता है। इसी सहजता को सहजावस्था कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि सहजावस्था प्राप्त होने तक साधना करना आवश्यक है।
अब ध्यानसाधना नामक जो विषय हैं,… हमने अधिक विचार निर्गुण ध्यान का किया, सगुण ध्यान का विचार संध्या के सत्र में करेंगे।
हरिः ॐ तत् सत् !!!
