नामसाधना – भाग २

भाव और भावना

हमारा नामसाधना का अभ्यास चल रहा हैं, चिंतन चल रहा हैं। अभी हमने कुछ अत्यंत भावपूर्ण, मनोहर भजन सुने। उन भजनों की मिठास और गहराई ऐसी थी कि मन हुआ—काश, मैं भी श्रोता बनकर बस उन्हें सुनता रहूँ, वे ही यहाँ चलते रहें।

इन भजनों की सबसे बड़ी विशेषता है—इनमें भाव है। भाव क्या है? जब हम नामसाधना करते हैं, तब जिस ‘नामी’ का नाम हम जपते हैं, उसके प्रति हमारे मन में गहरा, स्थिर और निरंतर भाव होना चाहिए। यही भाव साधना को सार्थक बनाता है। परंतु यहीं सबसे बड़ी चुनौती भी है: हम जिन्हे ‘देव’ कहते हैं, उनके प्रति कई प्रकार की भावनाएँ प्रसंगवश या परिस्थितिवश मन में आती-जाती रहती हैं। प्रसंग बदलते ही वे भावनाएँ भी बदल जाती हैं या लुप्त हो जाती हैं। परमार्थ—विशेषकर नामसाधना—में ‘भावना’ से कहीं अधिक महत्त्व ‘भाव’ का है।

भावबळें आकळे येऱ्हवीं नाकळे। (ज्ञाने हरि. १२.१)

भाव का सामर्थ्य साथ होगा तो जिन भगवानके नाम का स्मरण करता हूँ, उनकी अनुभूति अवश्य होगी; किंतु भाव कमजोर या अस्थिर है तो साधना निष्फल हो जाती है। अब ज़रूरी है—भाव और भावना में अंतर समझना और यह देखना कि क्षणिक भावना किस तरह स्थायी भाव में बदल सकती है। साधना तभी सार्थक होती है जब वह ज्ञान, समझ और सजगता से की जाए। कई बार हम अपेक्षाएँ रखकर साधना करते हैं—‘मैंने इतना नामजाप किया , फिर भी फल क्यों नहीं मिला?’ ऐसी अपेक्षाएँ साधना के मार्ग में बाधा ही बनती हैं। नामस्मरण का वास्तविक लक्ष्य सिर्फ यही होना चाहिए: जिसका नाम लेता हूँ, उसके साथ एकरूपता की अनुभूति—यही अपेक्षा श्रेष्ठ है।

देव शोधावया गेलो। तो देवची होऊनी ठेलो ॥(तुकाराम)

अर्थात—मैं ईश्वर की खोज में निकला, खोजते-खोजते स्वयं उसी में एकरूप हो गया। यही संतों का अनुभव  है—‘मैं ही तत्त्वरूपसे देव हूँ।’ जब यह अनुभूति आती है, तब खोज अपने-आप शांत हो जाती है। भगवान से एकरूप होने की यह प्रक्रिया नामसाधना से संपन्न हो, यही नामसाधना में अपेक्षा है। 

भाव और भावना के अंतर को समझने के लिए एक सुंदर उदाहरण लें: भावना एक छोटे तालाब जैसी है—एक ओर कोई हलचल हो, तो उसका असर तुरंत हर बाजू, हर ओर पहुँचता है। हमारा मन भी अक्सर इसी तरह संवेदनशील और अस्थिर रहता है। अर्थात, कहीं कुछ घटित हुआ तो उसका संपूर्ण परिणाम हम पर होता हैं। किंतु भाव एक विशाल, गहरे सरोवर जैसा है; उसमें कहीं पर लहर आए, कहीं पर तरंग उठे, कोई उसमें डुबकी लगाए, दूसरे छोर तक कोई परिणाम नहीं पहुँचता । सरोवरके ऊपरी भाग पर चाहे कितनी भी लहरें उठें, उसका तल हमेशा शांत रहता है। तलकी यही शांत गहराई साधना का लक्ष्य है: बाहरी परिस्थितियों से विचलित हुए बिना, भीतर की स्थिरता और शांति में टिकना।

कल्पना कीजिए एक विशाल सरोवर की; यदि कोई नौका सरोवर से गुजरती है, तो तरंगें उठती हैं, लेकिन वे गहराई तक नहीं पहुँचतीं। हमारी साधना और जीवन में भी यही होता है: रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, हनुमान जयंती, संतों की पुण्यतिथि—हर पर्व, हर आयोजन, हमारे अंतर्मन में हलचल, भावनाओं की तरंगें उत्पन्न करता है। हमारे पूर्वजों ने पंचांग में इतने उत्सव और विशेष दिन इसी उद्देश्य से जोड़े हैं कि जीवन में ऊर्जा और प्रेरणा की तरंगे बनी रहें। फिर भी, ये तरंगें केवल भाग पर रहती हैं—आंतरिक गहराई में शांति बनी रहती है। उस गहराई को ही ‘भाव’ कहा गया है, और तरंगो को ‘भावना’। भावनाएँ अस्थिर, बदलती रहती हैं—कभी तेज, कभी मंद। लेकिन जब यही भावनाएँ साधना, अनुभव और निरंतर अभ्यास द्वारा शांत हो जाती हैं, तो वे ‘भाव’ में रूपांतरित हो जाती हैं। स्थिरता मिलते ही, भावना ‘भाव’ बन जाती है।

‘भाव’ का अर्थ ही है—’अस्तित्व’, ‘होना’, ‘विद्यमान’। इसके विपरीत, ‘अभाव’ यानी ‘न होना’। भावबळें आकळे—अर्थात, यदि ईश्वर के अस्तित्व का सौ प्रतिशत, सतत निश्चय और अनुभूति हो जाए, तो ‘आकळे’ (समझ में आता है); यदि यह दृढ़ता न हो, तो ‘आकळत नाही’ (समझ में नहीं आता)।

भावबळें आकळे येऱ्हवीं नाकळे। (ज्ञाने हरि. १२.१)

ईश्वर के अस्तित्व का अखंड निश्चय

‘ईश्वर हैं’, इस भाव का कैसे जतन करें? कैसे संजोएँ? ज्ञानेश्वर महाराज के उदाहरण से समझते हैं,

सटवीचिये रातीं । न विसंबिजे जेवीं वाती ।
तैसा ईश्वरनिर्णयो चित्तीं । वाहणें सदा ॥ (ज्ञाने. १८.८३७)

पुराने काल में ‘सटविकी रात’ नामक एक प्रथा प्रचलित थी। शिशु के जन्म के उपरांत पाँचवीं रात को ‘सटविकी रात’ कहा जाता था। मान्यता थी कि इस रात सटवी नामक देवी आती है और शिशु के ललाट पर उसके प्रारब्ध की रेखाएँ लिख जाती हैं। सटवी को उसका कार्य निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए, घर में एक दीपक पूरी रात जलाया जाता था, जिसे बुझने नहीं देना था। यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि इस दृष्टांत का उद्देश्य किसी अंधविश्वास का समर्थन करना नहीं है, न ही ज्ञानेश्वर महाराज या संत परंपरा अंधश्रद्धा की ओर संकेत करते हैं। यह केवल एक सांस्कृतिक रूपक है—एक प्रतीक, जो यह सिखाता है कि जिस तरह सटविकी रात को दीपक बुझने नहीं दिया जाता, उसी तरह साधक को अपने अंतर्मन में ईश्वर के अस्तित्व की ज्योति, उसके प्रति विश्वास और निश्चय का दीप, अखंड प्रज्वलित रखना चाहिए। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं की साधक के मन में ईश्वर के होने का निश्चय कभी मंद न पड़े, कभी बुझने न पाए। यह आंतरिक ज्योति विश्वास की है—जब तक यह अखंड जलती रहती है, तब तक उसे ‘भाव’ कहते हैं। जब यह ज्योति केवल अवसर-विशेष, आयोजन या प्रसंग पर ही प्रज्वलित होती है और फिर बुझ जाती है, तो वह ‘भावना’ कहलाती है। 

आज यहाँ भजन का आयोजन है, वातावरण भावनाओं से परिपूर्ण है; सबके मन में भावनाएँ जागृत हो रही हैं, और संभव है कि ये भावनाएँ कुछ समय तक बनी भी रहें। परंतु जैसे ही यह प्रसंग समाप्त होगा, हम अपनी दिनचर्या में लौटेंगे, तो ये भावनाएँ भी स्वाभाविक रूप से क्षीण होने लगती हैं। मैं यह बात अपने अनुभव से कह रहा हूँ—यह सबके लिए सच हो, आवश्यक नहीं, परंतु अक्सर भाव का रूपांतरण भावना में हो जाता है, और वहाँ से मन में खलबली, अस्थिरता आ जाती है। जब खलबली बढ़ती है, तो शांति कम होने लगती है; और जब शांति नहीं होती, तो सुख भी दूर हो जाता है। भगवद्गीता हमें यही समझाती है—

अशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ (गीता २.६६)

जहाँ अशांति है, वहाँ सुख नहीं। इसलिए सबसे ज़रूरी है—अपने भीतर भाव को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखना। भाव का अर्थ है: ईश्वर के अस्तित्व को बनाए रखना और यह नामसाधक का एक बहुत बड़ा काम है। आगे मैं चर्चा करूंगा—नामसाधना की विधि क्या हो, किस पद्धति से नामस्मरण करना चाहिए, कितने प्रकार से नाम लिया जा सकता है। साथ ही, जब हम नामसाधना नहीं कर रहे होते, और अपने व्यवसाय में व्यस्त होते हैं तब भी अपने भाव को कैसे सुरक्षित रखें—इस विषय पर शास्त्र और संत क्या मार्गदर्शन देते हैं, इस पर भी विचार करेंगे।

सर्वांभूति भगवद्दर्शन

भाव की गहराई को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण विचार है:

जें जें भेटे भूत । तें तें मानिजे भगवंत ।
हा भक्तियोगु निश्चित । जाण माझा ॥(ज्ञाने. १०.११८)

इसी को ‘ईश्वर के प्रति अखंड भाव’ कहते हैं। हर वह वस्तु, व्यक्ति या जीव, जो हमारे सामने आता है—वह ‘भूत’ है, अर्थात जिसका जन्म हुआ है। यह घास हो सकती है, कोई पशु, पक्षी, मनुष्य या कोई अन्य प्राणी—सभी ‘भूत’ हैं, सभी सृष्टि के सजीव रूप हैं। ‘सर्वांभूति भगवद्दर्शन’—इस शब्द का अर्थ है, समस्त जड़-चेतन, हर एक भूत में भगवान का दर्शन करना। यह विचार प्रवचन में सुनने में जितना मधुर लगता है, व्यवहार में उतना ही चुनौतीपूर्ण है। अक्सर प्रवक्ता बोलकर मुक्त हो जाता है और श्रोता सुनकर शांत हो जाते हैं, लेकिन इस सत्य को केवल सुनना या कहना पर्याप्त नहीं—यह जीवन का अभ्यास बनना चाहिए। यहाँ एक गहरी जिम्मेदारी जुड़ी है: ‘जिम्मेदारी का परमार्थ’। केवल मंदिर जाना, नामस्मरण या पारायण करना योग्य नहीं; असली परीक्षा तब होती है, जब हमारे सामने कोई व्यक्ति आता है—क्या उसमें भी हम वही ईश्वरत्व देख सकते हैं? यही असली कसौटी है।

मेरा स्वयं का अनुभव है—डॉक्टर रहते हुए, जब भी मेरे पास रोगी आते थे, मुझे बार-बार इस बात की याद दिलानी पड़ती थी: क्या मैं प्रत्येक रोगी में उसी ‘तत्व’ का दर्शन कर पा रहा हूँ? हम धार्मिक विधि तो सारे करते हैं, लेकिन व्यवहार में यह दृष्टि अक्सर छूट जाती है। यदि यह दृष्टि विकसित न हो, तो ‘भावबल से समझ में आता है, अन्यथा नहीं आता’—यानी भाव की शक्ति के बिना यह अनुभूति संभव नहीं इसलिए साधना का एक अहम अभ्यास है: सारे लोगों के बाहरी रूप, उनकी विशेषताओं—लंबाई, रंग, रूप, आकर्षण, बुद्धि, धन या दरिद्रता—इन सबसे ऊपर उठकर, उस मूल ‘तत्व’ पर ध्यान केंद्रित रखना। व्यवहारिक जीवन में हम प्रत्येक से उसके रूप, परिस्थिति और भूमिका के अनुसार व्यवहार करें, लेकिन भीतर यह स्मरण रहे कि उसमें भी वही परमात्मा है। यह अभ्यास आसान नहीं, लेकिन यही सच्चा परमार्थ है—‘जें जें भेटे भूत, तें तें मानिजे भगवंत’। हर मिलने वाले में भगवान का ही दर्शन करें।

वास्तव में, शरीर की दृष्टि से प्रत्येक मनुष्य एक देह है, बुद्धि की दृष्टि से विचारशील प्राणी, वासना की दृष्टि से सांसारिक जीव—परंतु, ‘शरीर पर जीव का स्वामित्व हैं और आत्मा उसमें निर्लिप्तता से वास करता हैं।’ आत्मा सम्पूर्ण व्याप्त होते हुए भी निर्लिप्त रहता हैं। तो करना क्या चाहिए? – उस अलिप्त आत्मा पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए और जो जीवस्वरूप हैं, उससे जैसा व्यवहार करना अपेक्षित हैं, वैसा ही व्यवहार करना चाहिए—यही सच्ची साधना है।

अब इस विचार को दो प्रकार से समझें। एक बार मेरे पास एक रोगी आया, जिसे मामूली सर्दी-जुकाम और खांसी थी। मैं जानता था कि वह दो-तीन दिनों में अपनेआप ठीक हो जाएगा, लेकिन औपचारिकता के तौर पर उसे दो-तीन गोलियाँ लिख दीं। वैसे भी, जुकाम के बारे में एक मज़ेदार बात यह है—अगर दवा लो तो ठीक होने में सात-आठ दिन लगते हैं, और बिना दवा के दो-तीन दिन में आराम आ जाता है। अब कल्पना कीजिए, अगर मैं उस रोगी को दस दिनों तक रोज़ इंजेक्शन लेने की सलाह देता, पचास रुपये का एक इंजेक्शन, यानी कुल पाँच सौ रुपये! और फिर वही पाँच सौ रुपये जेब में डालकर जब मैं विठ्ठल भगवान के सामने खड़ा होता हूँ—क्या भगवान मेरी ओर प्रेम से देखेंगे? क्या उनकी दृष्टि मेरे आचरण पर नहीं जाएगी? ज़रा सोचिए—यहीं से असली ‘भाव’ का अर्थ स्वतः प्रकट होता है। अगर मैं अपने व्यावसायिक या दैनिक कर्तव्यों में ईमानदारी, न्याय और करुणा का पालन नहीं करता, भले ही बाहर से कितने ही भजन, पूजा, तीर्थयात्राएँ, उपवास या धार्मिक अनुष्ठान करूँ—क्या वह सच्चा भाव कहलाएगा? सत्यनारायण की पूजा, व्रत-उपवास—इन सबका उद्देश्य तो केवल आचरण की शुद्धता ही है। यदि आचरण में ईमानदारी न हो, तो सारी साधना व्यर्थ हो जाती है।

मुख्य बात यह है: हर दृश्य जीव, चाहे वह किसी भी रूप में हो, ‘वह’ (ईश्वर) का ही रूप है। उसके साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा नियमानुसार उचित और धर्मसंगत हो। एक डॉक्टर अपने पेशंट के लिए जो उपचार आवश्यक हो, वही करें; जितना शुल्क उचित हो, उतना ही लें। फिर जब हम ईश्वर के सामने श्रद्धा से सिर झुकाएंगे, तो भगवान प्रेम से हमे देखेंगे । ऐसी स्नेहभरी दृष्टि की योग्यता अर्जित करने के लिए हमें लगातार आत्मचिंतन और आत्मसुधार करना होता है, यह बिना परिश्रम के नहीं मिलता। हम ईश्वर को ‘प्रेममय’, ‘भक्तवत्सल’ जैसे विशेषणों से अलंकृत करते हैं—लेकिन अपनेआप के लिए छूट लेते है कि “मैं जैसा चाहूँ, वैसा आचरण करता रहूँ, और भगवान अपनी भक्तवत्सलता न छोड़ें।” सच्चा भाव वहीं है, जहाँ आचरण और साधना दोनों में सत्य, करुणा और न्याय का समन्वय हो।

परमार्थ और व्यवहार का समन्वय

यहाँ कई बार एक अनदेखी विसंगति सामने आती है। ‘भाव’ शब्द का एक अर्थ है—‘अस्तित्व’। हर दृश्य, हर जीव, हर वस्तु में परमात्मा का अंश या उसकी झलक है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि व्यवहार की सीमाएँ मिटा दी जाएँ। जब हम किसी से व्यवहार करते हैं, तो यह स्मरण रखें कि सामने वाला भी एक जीव है—उसके साथ वही व्यवहार करें जो जीवदृष्टीसे न्यायसंगत, मर्यादित और सामाजिक दृष्टि से उचित हो। यह समन्वय की पहली पद्धति है: परमार्थ और व्यवहार, दोनों को उनके अपने स्थान पर समझना।

कई बार प्रवचनों में श्रोताओं से पूछा जाता है, “क्या आप मानते हैं कि हर प्राणी में ईश्वर है?” स्वाभाविक है, उत्तर ‘हाँ’ ही होगा। लेकिन व्यावहारिकता की कसौटी तब आती है, जब कोई अजनबी कहे, “प्रत्येक स्थान में यदि ईश्वर हैं, तो क्या तेरा – क्या मेरा? मैं अब आजसे आपके घर आकर रहूँगा। आप कहीं और जगह चले जाए और निवास करे!” ऐसे तर्कों से व्यवहारिक समस्याएँ जन्म लेती हैं। तात्पर्य यही हैं कि, व्यवहार में समस्याएँ निर्माण करने के लिए परमार्थ का उपयोग न करें। व्यवहार को व्यवहार की तरह, और परमार्थ को परमार्थ की तरह समझना आवश्यक है। दोनों क्षेत्रों के नियम स्पष्ट और अबाधित रहें, तभी जीवन में संतुलन, सुरक्षा और सच्ची साधना बनी रह सकती है। यदि इन सीमाओं का ध्यान न रखा जाए, तो ‘जो मेरा है वह मेरा, और जो तेरा है वह भी मेरा’ जैसी विकृत प्रवृत्तियाँ पनपने लगती हैं, जिससे न केवल आर्थिक या सामाजिक हानि होती है, बल्कि आध्यात्मिक मार्ग भी बाधित होता है। मेरे परिचय में ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्होंने परमार्थ की गलत व्याख्या या सीमाओं की अनदेखी के कारण जीवन में भारी नुकसान उठाया है। उनका नुकसान केवल व्यवहारिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी हुआ है, क्योंकि आध्यात्मिक सिद्धांतों  को जीवन मे उतारने कि  कला नहीं सीख पाए ।

अब, मैं कई बार अपने बारे में चुटकुले सुनाया करता हूँ! यह उस समय की बात है जब मैं वैद्यकीय चिकित्सा करता था। एक बार एक रोगी मेरे पास आया और बोला, “डॉक्टर साहब, कल रात मुझे एक बड़ा डरावना सपना आया!” मैंने उससे पूछा, “क्या सपना देखा?” वह बोला, “मैंने देखा कि काले भैंसे पर एक काले व्यक्ति बैठे हैं!” आप समझ ही गए होंगे कि वह यमराज के बारे में बात कर रहा था—दक्षिण दिशा के स्वामी! हम सबने सुना है कि दक्षिण दिशा की ओर देखना अशुभ होता है। ऐसी अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं। रोगी ने आगे पूछा, “अब मुझे क्या करना चाहिए?” मैंने कहा, “भैया, सपना आपने देखा है, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?” वह बोला, “डॉक्टर साहब, आपकी और यमदेव की अच्छी जान-पहचान है, ऐसा लोग कहते हैं।” मैंने पूछा, “ऐसा क्यों सोचते हो?” उसने जवाब दिया, “आपने अपने तीस साल के करियर में कई लोगों को उनके पास भेजा है—इसलिए आपकी वहाँ बड़ी पहुँच होनी चाहिए! अब कृपा करके मुझे इस संकट से बचा लीजिए!” मैंने भी मजाक में कहा, “बिल्कुल, मेरी सिफारिश वहाँ भी चलती है! अब आप एक काम कीजिए—दस तोले सोने का एक भैंसा मुझे भेंट कर दीजिए, फिर मैं रास्ता निकाल दूँगा।” डर के मारे वह मोलभाव करने लगा—“डॉक्टर साहब, दस तोला ज्यादा है, आठ तोला चलेगा क्या?” मैंने भी हँसते हुए कहा, “चलो, मंजूर है!”

सोचिए, बिना पसीना बहाए आठ तोला सोना! यह तो मज़ाक था, लेकिन हमारे समाज में यही मज़ाक कभी-कभी हकीकत बन जाता है। ऐसे ही अंधविश्वास, भय और अनुचित मान्यताओं के कारण लोग न केवल आर्थिक नुकसान उठाते हैं, बल्कि अपने प्रपंच (दैनिक जीवन) और परमार्थ (आध्यात्मिकता) दोनों को बिगाड़ बैठते हैं। जिस धन को अपने घर-गृहस्थी के लिए बचाना चाहिए था, वही व्यर्थ कारणों पर खर्च हो जाता हैं। परिणाम यह होता है कि न सही परमार्थ साधा जाता है, न प्रपंच सुचारू रहता है। इसीलिए दोनों क्षेत्र ना बिगड़ें, इसलिए समर्थ रामदास स्वामी जी ने स्पष्ट निर्देश दिया है—

आधी प्रपंच करावा नेटका ।
मग घ्यावा परमार्थ विवेका ॥  (दास. १२.१.१)

समर्थ रामदास स्वामी जी यह भी कहते हैं कि सिर्फ और सिर्फ प्रपंच करना भी अनुचित हैं। प्रपंच चलाते-चलाते थोड़ा परमार्थ का भी विचार करें। थोड़ा-थोड़ा करके परमार्थ की ओर अग्रसर हो जाइए। यदि आप इस क्षेत्र की ओर पूरी तरह पीठ दिखाए खड़े हो, तो उसकी ओर भी ध्यान दीजिए। समर्थ रामदास स्वामी जी हमें समझाते हैं कि यही हमारे कल्याण का मार्ग हैं।

ऐसे विचार करने पर भाव और भावना के अंतर को हम स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं। भाव अत्यंत स्थिर होता है, जबकि भावना अत्यंत अस्थिर होती है। भावना का रूपांतरण भाव में करना आवश्यक है, और भाव का अर्थ ‘अस्तित्व’ से है। ईश्वर कहाँ-कहाँ हैं, इस विषय की स्पष्टता होनी चाहिए। हर प्राणी में ईश्वर का वास है, यह ध्यान में रखकर ही हमें व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी हो सकता है कि मैं यह मान लूं कि आप में ईश्वर हैं, फिर भी मेरा व्यवहार पहले जैसा ही रहे। यदि ऐसा हुआ, तो ‘सबमें ईश्वर हैं’ का ज्ञान केवल एक सिद्धांत बनकर रह जाएगा और उसका वास्तविक रूपांतरण अनुभव में नहीं हो पाएगा। इसलिए तुकाराम महाराज ने कहा है,

देव आहे सुकाळ देशीं । अभाग्यासी दुर्भिक्ष ॥ (तु.गा. २७९१)

हर परिस्थिति में संत हमें उचित मार्गदर्शन देते हैं। ईश्वर सर्वत्र प्रचुर मात्रा में हैं, लेकिन फिर भी अभक्त को ईश्वर अपर्याप्त प्रतीत होते हैं। अब दोनों दृष्टिकोणों के अंतर पर ध्यान दीजिए—संतों की दृष्टि में ईश्वर सर्वत्र और विपुल हैं, जबकि अभक्त की दृष्टि में ईश्वर अपर्याप्त हैं। यह अंतर क्यों है? कारण यह है कि संतों ने सर्वत्र ईश्वर के दर्शन करने की दृष्टि विकसित की है, जबकि हमने ऐसी दृष्टि नहीं विकसित की है। इसी कारण, ईश्वर सर्वत्र होते हुए भी हमारे लिए दृश्य नहीं हैं। हम ‘भरला घनदाट हरि दिसे’ (हरी द्वारा सारा जगत व्याप्त है) हरिपाठ में रटते तो हैं, लेकिन उसका अनुभव नहीं करते। इसलिए पारमार्थिक दृष्टि से हमारी फिसलन होती है । जैसे हर राज्य में महापालिका द्वारा निर्मित सार्वजनिक बगीचे होते हैं, जिनमें खेलने के लिए फिसलपट्टी (slides) होती हैं। एक ओर सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं, दूसरी ओर फिसलने की व्यवस्था होती है। बच्चे सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हैं, तो केवल फिसलने के लिए। यही स्थिति बड़ों के साथ भी देखी जा सकती है!​ विभिन्न सप्ताह होते हैं। पंचमी को सप्ताह का आरंभ होता है और एकादशी के दिन उद्यापन होता है। पंचमी से आरंभ कर, एकादशी को कीर्तन और प्रसाद ग्रहण किया, और सब फिर से नीचे फिसलने को तैयार! परमार्थ के क्षेत्र में भी यही खेल चलता है— जिस तत्त्व को साध्य करना है, वह साध्य नहीं हो पाता। इसी कारण भावना का परिवर्तन भाव में नहीं हो पाता। ज्ञानेश्वर महाराज हमें अभ्यास कराते हैं कि सभी ओर ‘भरला घनदाट हरि दिसे’—हरि सर्वत्र हैं। ‘देखिए, वहीं तो है!’ – इसी निश्चय का अभ्यास जरूरी है।

तुकाराम महाराज कहते हैं, 

देव राखी तया मारील कोण । न लागे काटा हिंडता वन । (तु.गा. १६०९)

ईश्वर जिसका रक्षण करते हैं, वह व्यक्ति चाहे संपूर्ण जंगल भी पार कर ले, उसे कांटा तक नहीं चुभता। इसके विपरीत, यदि ईश्वर का रक्षण नहीं है, तो कोई भी उसकी सुरक्षा नहीं कर सकता। अब प्रश्न यह है कि ‘ईश्वर किसका रक्षण करेंगे या नहीं करेंगे?’ इसका निर्णय किन आधारों पर होता है? यह विचार करना अत्यंत आवश्यक है। अक्सर हमारा स्वभाव यह होता है कि हम दूसरों के धन, पद, शिक्षा या लोकप्रियता को देखकर ही उनके बारे में निर्णय लेते हैं। लेकिन ईश्वर ऐसे भेदभाव नहीं करते। उनके पास हमारे प्रारब्ध का पूरा लेखा-जोखा होता है और वे उसी के अनुसार हमारे लिए जो उचित है वही करते हैं—चाहे रक्षण करें या न करें। इसे ही ‘either way’ कहा गया है। वे हमारे लिए अनुकूल रहें या प्रतिकूल, वे सदा ईश्वर ही हैं। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर का अस्तित्व हमारे जीवनमे होने वाली घटनाओं पर निर्भर नहीं है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है—हम सोचते हैं कि जीवन में सब अच्छा हो तो ईश्वर प्रसन्न हैं, और कुछ बुरा हो जाए तो वे नाराज़ हैं। इसी द्वंद्व में जीवन बीत जाता है। फिर वही प्रश्न उठते हैं—“मैंने इतनी भक्ति की, फिर भी मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” या “मैंने इतनी सेवा की, फिर भी मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” ऐसे प्रश्न केवल सांसारिक सोच के कारण आते हैं, क्योंकि हम मान लेते हैं कि हमने बहुत सेवा की है। इन विचारों को छोड़ दो। रामकृष्णहरी! हर बात को सही दृष्टिकोण से समझो।

प्रातःकालीन सत्र में भगवद्गीता का एक श्लोक कहा था,

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ (गीता १८.६१)

इसका तात्पर्य है कि ईश्वर हमारे साथ वही करते हैं, जो हमारे लिए उचित है, भले ही हम उनकी कोई सेवा न भी करें। किंतु हम अक्सर सोचते हैं, “मैंने इतनी सेवा और आराधना की, फिर भी मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” या “वह मनुष्य कुछ नहीं करता, फिर भी उसके साथ सब अच्छा क्यों है?” यही उलझन मनुष्य को घेरे रहती है। इसी भ्रम के कारण हमारे भीतर अनुकूल और प्रतिकूल भावनाएँ जन्म लेती हैं, और यह भावनाएँ ईश्वर के प्रति भी उत्पन्न होती हैं। मनुष्यों के प्रति यह भेदभाव कि भावनाएँ होना स्वाभाविक है, लेकिन जब ईश्वर के प्रति भी ऐसी भावनाएँ आती हैं, तो यह हमारी समझ की सीमा को दर्शाता है। इसे एक उदाहरण से समझिए—एक बड़ा जंगल था, जिसमें शेर रहते थे। एक युवक को उस जंगल को पार करना था। उसके मित्रों ने उसे डराते हुए कहा, “वहाँ बड़े-बड़े शेर हैं, अगर शेर सामने आ गया तो क्या करोगे?” युवक ने सहजता से उत्तर दिया, “मैं कुछ नहीं कर सकता, जो भी होगा वो शेरही करेगा।” यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है—हम केवल प्रयास कर सकते हैं, लेकिन अंतिम रूप से जो होना है, वो ईश्वरही करेंगे।

यदि यह स्मरण रहे, तो…

ठेविलें अनंतें तैसें चि रहावे । चित्तीं असों द्यांवे समाधान ॥ (तु.गा. ११९१)
ठेविले विठ्ठलें तैसें चि रहावे । चित्तीं असों द्यांवे समाधान ॥
ठेविले गणपतीने….

ईश्वर के नाम को अपने इष्ट देवता के नाम से बदल दीजिए। जैसे ही आप इष्ट देवता का नाम लेते हैं, स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी नाम का जाप किया जा सकता है—क्योंकि सभी इष्ट, अंततः एक ही सत्य में एकत्र हैं। जब इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए आचरण किया जाता है, तभी इष्ट देवता के प्रति सच्चा भाव उत्पन्न होता है। यदि भावना को भाव में बदलना है, तो हर जगह इष्ट देवता के अस्तित्व का निश्चय दृढ़ करना सीखना होगा। यही साधक का कार्य है और इसी को साधना कहते हैं। साधना केवल यह नहीं है कि “सुबह और शाम के दस-दस मिनट मैंने इष्ट देवता के लिए रख दिए।” यदि साधना केवल इतनी ही है, तो इष्ट देवता भी केवल “धन्यवाद!” कहेंगे। ऐसा रिश्ता केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। किंतु जब इष्ट देवता का भावपूर्ण, निरंतर चिंतन होता है, तो उसे अनुसंधान कहते हैं। अनुसंधान एक अत्यंत सुंदर और गहरा शब्द है, जिसकी कई पद्धतियाँ हैं—भगवान के नाम का अनुसंधान भी उन्हीं में से एक है। अनुसंधान पूजा से भी साध्य किया जा सकता है। नवविधा भक्ति के प्रत्येक चरण में अनुसंधान समाहित है। केवल अंतिम चरण, जिसे आत्मनिवेदन भक्ति कहते हैं, उसमें अनुसंधान का स्थान नहीं रहता। 

आत्मनिवेदन भक्ति में ‘आत्मनिवेदन’ का अर्थ है कि जिन भगवान की मैं भक्ति करता हूँ, जिनकी उपासना करता हूँ, उनसे मेरी भिन्नता समाप्त हो जाती है। जब साधक और भगवान में तत्त्वतः कोई भेद नहीं रह जाता, तब अनुसंधान का प्रश्न ही नहीं उठता। यह वास्तव में एक गूढ़ और गहरा विषय है। इसी संदर्भ में समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं – 

साध्य होतां साधनाचा ठाव नाही। (दा. २०.१०.२७)
जालें साधनाचें फळ। संसार जाला सफळ।
निर्गुण ब्रह्म तें निश्चळ। अंतरीं बिंबलें॥ (दास. २०.१०.२६)

ये पंक्तियाँ अक्सर सस्वर कंठस्थ की जाती हैं—“साध्य होता साधनाचा ठाव नाही,” जैसा कि समर्थ रामदास स्वामीजी ने कहा है। आरती के अंत में जो कथन होता है, वह रचयिता का अनुभव और भाव होता है। परमार्थ में यही सबसे बड़ी विडंबना है—शब्द, भाव और अनुभव लेखक के होते हैं, लेकिन हम केवल स्वर, ताल और वाद्य अपने समझते हैं। सच्ची आरती तब ही सार्थक है, जब रचयिता का भाव और अनुभव हमारा भी अनुभव बन जाए। केवल स्वर या ताल से नहीं, बल्कि भावानुभूति से ही आरती पूर्ण होती है।

यह विचार लगातार मन में बना रहना चाहिए। यदि हम इस विचार की रक्षा करें, तो नामसाधना के माध्यम से जो लक्ष्य प्राप्त करना है, वह संभव हो सकता है। अक्सर हम नामसाधना को जितना सहज मानते हैं, वास्तव में वह उतनी सरल नहीं होती—उसपर केवल ‘सहज’ होने की एक मोहर लगा दी गई हैं।

नामसंकीर्तन साधन पैं सोपें। जळतील पापे जन्मांतरे॥ (हरिपाठ २८) (तु.गा. २३५३.१)

संत अवश्य ऐसा कहते हैं की नामसंकीर्तन इतना सहज या आसान है की उससे अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते है। हरिपाठ में जो आरंभ में कहा गया हैं, हरी मुखे म्हणा हरी मुखे म्हणा—उससे लेकर अठ्ठाइसवें अभंग तक जो कहा गया हैं, उसे स्मरण रखते हुए आचरण करने की जो ज़िम्मेदारी स्वीकार करता हैं, उसके लिए नामसंकीर्तन की आसानी हैं। ज़िम्मेदारी स्वीकारते समय selective नहीं होना चाहिए कि अभंग में केवल अपने लिए अनुकूल बातें ग्रहण कर लीं और प्रतिकूल बातें त्याग दीं। ऐसा करने पर उपासना निरर्थक हो जाती हैं।

नाम, नामी और साधक

वर्तमान में हम नामसाधना पर विचार कर रहे हैं। मैंने प्रातःकाल के सत्र में पूछा था: “मुझे नाम लेने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है?” इसका कारण है विस्मृति। अब दो बातों पर ध्यान दीजिए—’नाम का स्मरण’ और ‘नाम का नामी’। हर नाम का एक नामी होता है, और नाम-नामी में भेद नहीं है। जैसे—‘घड़ी’ एक नाम है, उसका नामी भी ‘घड़ी’ ही है। जो रूप प्रकट है, उसका नाम भी वही है, और नाम का रूप भी वही है। इसी तरह, राम और ब्रह्म अभेद हैं; कृष्ण और ब्रह्म में भेद नहीं; श्रीदत्त और ब्रह्म भी एक ही हैं। जब हम दत्त का नाम लेते हैं, तब वास्तव में हम ब्रह्म का अनुसंधान करते हैं। ब्रह्म स्वयं निराकार है, उसका अनुसंधान करना कठिन है, इसलिए मूर्तियों और अवतारों के माध्यम से अनुसंधान की सुविधा प्राप्त हुई है। किंतु इसे केवल ‘अनुसंधान की सुविधा’ ही मानिए। एक बात गांठ बाँध लीजिए—यदि मैं राम का नाम जपता हूँ, तो यह अपेक्षा न रखें कि इससे ब्रह्म या आत्मज्ञान की कोई विशेष अनुभूति अवश्य मिलेगी। नाम और नामी अभेद हैं—‘रामराम’ कहते ही, उसी क्षण ब्रह्म का अनुसंधान होता है। तुकाराम महाराज अभंग में कहते हैं—

मुखीं नाम हातीं मोक्ष । ऐसी साक्ष बहुतांसी॥ (तु.गा. २२८५.१)

तुकाराम महाराज कहते हैं कि जिस क्षण आप नाम लेते हैं, उसी क्षण मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। वे ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि नाम और नामी अभेद हैं—अर्थात् दोनों में कोई अंतर नहीं है। जब यह निश्चय दृढ़ हो जाता है, तब नाम का स्मरण करते समय साधक, नाम और नामी—तीनों एकरूप हो जाते हैं। यही वास्तविक साधना है।

हम एक महत्वपूर्ण विचार पर चिंतन कर रहे हैं—नाम का जाप वास्तव में कौन करता है? चाहे कोई भक्त हो, ज्ञानी हो या पंडित, जब तक वह ‘जीव’ और ‘आत्मा’ की एकता को नहीं समझता, तब तक उसकी साधना पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकती। यह बात साहसिक लग सकती है, लेकिन सभी शास्त्रों और संतों ने यही शिक्षा दी है। दुर्भाग्यवश, हमने उनकी सीखों को अनदेखा कर दिया है। कल हमने जो सिद्धांत प्रस्तुत किया था—‘ज्ञानपूर्वक किया गया साधन अधिक फलदायक होता है, जबकि अज्ञान से किया गया साधन निष्फल रहता है’—वह इसी संदर्भ में है। उदाहरण स्वरूप, एक बच्चा मेरी कुर्सी पर बैठा है; इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि जिसका मैं नाम लेता हूँ, उसके स्वरूप का ज्ञान होना अनिवार्य है।

​इस ज्ञान के बाद, जब मैं नामसाधना करता हूँ, तो उसका दर्जा, स्तर स्वतः ही बदल जाता है। नाम, नामी और साधक—इन तीनों के बीच का संबंध कब और कैसे कमजोर पड़ा? यदि संबंध बिगड़ गया है, तो उसे फिर से सुधारना आवश्यक है। इसका उत्तर सीधा है: नामस्मरण की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि हम भूल जाते हैं—विस्मरण हो जाता है। अब प्रश्न यह है कि इस विस्मरण से हानि क्या है? दुनिया में कई लोग ऐसे हैं जो श्रीरामजी को याद नहीं करते, फिर भी वे बाहरी रूप से सफल, धनवान, प्रसिद्ध और सम्मानित नजर आते हैं। उनके जीवन में कोई अभाव नहीं दिखता। लेकिन एक बात ध्यान देने योग्य है—नामसाधना का उद्देश्य इन सांसारिक उपलब्धियों को पाना नहीं है।

​यह अत्यंत महत्वपूर्ण ज्ञान है—सत्ता, संपत्ति, यश, कीर्ति और प्रतिष्ठा इनमें से कुछ भी नामसाधना से नहीं मिलता। जो कुछ भी हमें मिलना है, वह केवल प्रारब्ध के अनुसार ही मिलता है। भारत में प्रायः ट्रकों के पीछे लिखा मिलता है: ‘वख्त से पहले और नसीब से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता।’ यह गहरी बात है, जिसे शायद एक साधारण वाहन चालक तो समझ जाता है, लेकिन एम.ए., एम.एस., पीएच.डी. और विभिन्न डिग्रीधारी लोग भी नहीं समझ पाते। यही वजह है कि हमारा श्रीरामजी के साथ संबंध कमज़ोर हो जाता है—क्योंकि कब, क्या और कितना मिलेगा, यह सिर्फ वही तय करते हैं। यदि हम संसार की उपलब्धियों को नामसाधना या भगवान के नाम से जोड़ देते हैं, तो हमारी भावना कभी भाव में रूपांतरित नहीं हो पाएगी। परिणामस्वरूप, जब सब कुछ अनुकूल हो तो हम भगवान की प्रशंसा करते हैं—‘आपके जैसा कोई नहीं!’ और प्रतिकूलता में उनकी उपेक्षा करने लगते हैं—‘अब मैं उनका नाम नहीं लूंगा!’

अब एक बात पर चिंतन करें—आप स्वयं स्वीकार करेंगे कि नाम और नामी के ऐक्य का सिद्धांत सत्य है। जीव नामसाधना करता हैं। उस जीव ने नाम उच्चारण करते हुए नामी से एकरूपता साध्य करनी होती हैं। इस ध्येय तक पहुँचने के लिए नामस्मरण की पद्धति कैसी हो, यह विचार करना भी आवश्यक है।

नामसाधना की विधि

नामसाधना दो प्रकार से की जाती है। पहली विधि है—एकांत, शांत वातावरण में, पूरी एकाग्रता के साथ बैठकर नाम का जप करना; और दूसरी है—दिनचर्या के विभिन्न कार्यों जैसे टहलना, खाना-पीना, या अन्य रोज़ के काम करते हुए नामस्मरण करना। दोनों ही तरीकों का अपना महत्व है, परंतु बैठकर की गई साधना अधिक गहन और प्रभावशाली मानी जाती है, क्योंकि उस समय मन की एकाग्रता सबसे अधिक रहती है। जब हम चलते-फिरते या काम करते हुए नाम लेते हैं, तब चित्त स्वाभाविक रूप से इधर-उधर बिखरता है। इसे समझने के लिए सर्कस के कलाकार और ताल (rhythm) का उदाहरण लें—सर्कस में हर खेल एक निश्चित ताल या संगीत के साथ होता है, और कलाकारों की सफलता उसी ताल पर निर्भर करती है। जैसे ही ताल बदलती है, खेल भी बदल जाता है। उसी तरह, यदि जीवन के हर कर्म में नामसाधना की लय तथा ताल बना रहे, तो साधना सहज और सुंदर बन जाती है। लेकिन आमतौर पर होता यह है कि हम कर्म (नृत्य) में उलझे रहते हैं और नाम (ताल) को भूल जाते हैं, या फिर दोनों के बीच संतुलन नहीं बना पाते। परिणामस्वरूप, यदि ताल छूट जाए तो सर्कस का खेल बिगड़ जाता है, वैसे ही नामसाधना की लय छूटने पर जीवन प्रभावहीन हो जाता है।

यह नामसाधना की एक व्यावहारिक पद्धति है। टहलते-घूमते, खाते-पीते, या दैनिक कार्य करते हुए भी नामस्मरण होना चाहिए। यदि यह स्मरण किसी मनभावन पार्श्वसंगीत के साथ तालमेल में हो, तो साधना और भी सहज हो जाती है—जैसे चलते-चलते ‘राम म्हणे वाटचाली’। हमने कल भी विचार किया था कि काम करते हुए या भोजन करते समय ‘श्रीराम जयराम जय जयराम’ का स्मरण किया जाए। यद्यपि इस प्रकार की साधना को बैठकर की जाने वाली एकाग्र साधना का स्तर नहीं मिलता, क्योंकि तब चित्त अधिक भटकता है, फिर भी इसका अपना महत्व है। ऐसे निरंतर स्मरण से चित्त की चंचलता धीरे-धीरे कम होती जाती है। उदाहरण के लिए, यदि मैं वाहन चलाते हुए नामस्मरण करता हूँ, तो शाम को जब मैं शांत होकर बैठूंगा, मेरा मन अपेक्षाकृत जल्दी स्थिर और एकाग्र हो जाएगा। इन बातों को आप स्वयं अनुभव करके देख सकते हैं—घर में, काम के समय या किसी भी परिस्थिति में। प्रयोग करें, और आप पाएंगे कि दिनभर में किन कारणों से चित्त विचलित रहा, किस घटना, व्यक्ति या परिस्थिति ने ध्यान भटकाया। ऐसे व्यर्थ विचार बार-बार आते ही रहते हैं; परंतु निरंतर नामस्मरण से उनका प्रभाव कम होने लगता है।

एक दादीजी की कथा सुनाता हूँ। समय-समय पर जीवन में ऐसे झटके देना आवश्यक होता है, अन्यथा मज़ा नहीं बना रहता। ये दादीजी स्वयं कीर्तनकार थीं, जो अपने आप में एक विशेष बात है। उनकी पोती का विवाह हो रहा था, और दादीजी भी वहाँ उपस्थित थीं। विवाह के अवसर पर उन्हें अपने विवाह की यादें सताने लगी । उस समय की प्राचीन परंपराओं के अनुसार, दादीजी को उनके सास-ससुर और अन्य घरवालों से काफी कष्ट झेलने पड़े थे। सास-ससुर, देवरानी, ननंद—सभी ने नए परिवार की बहू को जमकर परीक्षा में डाला। ये सारे पुराने कष्ट दादीजी को याद आने लगे, जबकि पोती का विवाह संपन्न हो रहा था। विवाह की सारी रस्में चल रही थीं, उसी समय दादीजी के मन में अपने पुराने कष्टों की यादे उभर आई। उनका चेहरा बदल गया, जिसे देखकर पोती ने समझा कि दादीजी के मन में कुछ चल रहा है। वह पास आकर पूछने लगी, “दादीजी, आपको किसी ने कष्ट दिए हैं क्या?” दादीजी बोलीं, “हाँ, किन्तु अभी नहीं।” पोती ने पूछा, “तो कब दिए?” दादीजी बोलीं, “तब, जब मेरा विवाह हुआ था।” पोती ने समझाते हुए कहा, “दादीजी, जिन्होंने आपको कष्ट दिए, वे अब यहाँ नहीं हैं—वे सब तो बहुत पहले चले गए।” दादीजी ने हँसते हुए कहा, “तो क्या हुआ? मैं उन्हें छोड़ूँगी नहीं!” पोती ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “दादीजी, फिर आप भी जल्दी जाइए, वरना वे और आगे निकल जाएँगे!” सोचिए, दादीजी को क्या सुनना पड़ा! यह भूतकाल की स्मृतियों में उलझे रहना—कहाँ-कहाँ की बातें याद कर-करके स्वयं को बार-बार कष्ट देना, यही हमारी विशेष प्रवृत्ति है। एक बार कष्ट हुआ, वह मान्य है, लेकिन उसी कष्ट को स्मरण करके हम बार-बार स्वयं को ही पीड़ा देते रहते हैं। एक बार जो पीड़ा मिली, वह तो हुई, लेकिन उसे जीवन भर ढोते रहना—यह हमारी आदत बन जाती है । यह आदत नामसाधना से रुक सकती है। यदि हम निरंतर नामस्मरण करें, तो ऐसे व्यर्थ विचार नहीं आते। दादीजी यदि उस समय नाम जप रही होतीं, जिस प्रकार वे कीर्तन में प्रचार करती थीं, (वे स्वयं कीर्तनकार थीं), तो वे इन विचारों से मुक्त हो सकती थीं।

कीर्तन यदि केवल एक शौक या सामाजिक रुचि के रूप में किया जाए—मनोरंजन या समय बिताने के लिए—तो उसका असर भी उतना ही सतही होता है। जीवन में अनेक प्रकार की रुचियाँ होती हैं, संगीत, खेल, यात्रा, पठन-पाठन—यदि कीर्तन भी केवल इन्हीं में एक बनकर रह जाए तो उसकी आत्मा खो जाती है। कीर्तन की असल सार्थकता तभी है जब इसमें आंतरिक शुद्धि और जीवन-परिवर्तन की भावना निहित हो। इसलिए हमें केवल शौक के लिए नहीं, बल्कि आत्मविकास और गहन अध्ययन के उद्देश्य से कीर्तन और परमार्थ विषयों की ओर बढ़ना चाहिए।

हमारे विचार का विषय चल रहा है कि जब हम चलते-फिरते, खाते-पीते नामसाधना करते हैं, तो मन में उठने वाले अनावश्यक विचार—जिन्हें हम ‘कूड़ा’ कहते हैं—धीरे-धीरे दूर होते हैं। जीवन में आवश्यक विचार—जैसे व्यवसाय, परिवार, भविष्य की योजनाएँ—अवश्य करने चाहिए, लेकिन व्यर्थ की चर्चा और चिंता से बचना चाहिए। राष्ट्र की परिस्थितियों की जानकारी रखना आवश्यक है, परंतु उस पर निरर्थक बहसें या चर्चा करना अक्सर समय और ऊर्जा की बर्बादी है। जहाँ सत्ता में वे लोग हों जिनकी नीयत संदिग्ध है, वहाँ आम नागरिक के सोचने या बहस करने से शायद कुछ भी बदलने वाला नहीं। उल्टा, ऐसी बातों में उलझने से मानसिक अशांति और स्वास्थ्य की हानि ही होती है।

आजकल जानकारी और सूचना का संग्रह भी एक प्रतिस्पर्धा बन गया है। कौन ज्यादा पढ़ता है, किसके पास अधिक ‘अप-टू-डेट’ जानकारी है—इसकी होड़ रहती है। अंग्रेज़ी पत्रिकाओं की सदस्यता, अंतरराष्ट्रीय समाचार-पत्र पढ़ना, और इन जानकारियों का प्रदर्शन सामाजिक प्रतिष्ठा का साधन बन गया है। Indian Express, India Today, Frontline, Time, Newsweek जैसी पत्रिकाएँ पढ़ना और स्थानीय भाषाओं की पत्रिकाओं को कमतर मानना—यह अभिजात वर्ग की मानसिकता को दर्शाता है। यह सब प्रतिष्ठा के, दिखावे के लिए किया जाता है, असल में इसका कोई वास्तविक लाभ नहीं होता। यह अतिरिक्त जानकारी और सूचनाओं का संग्रह जीवन में न तो शांति लाता है, न ही संबंधों में विशेष सुधार करता है। 

वर्तमान विषय यह है कि जब हम नियमित रूप से नामसाधना करने लगते हैं, और उसमें विशेष रूप से आसनस्थ होकर साधना करते हैं, तो मन अपेक्षाकृत शीघ्र एकाग्र हो जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि मन को अब स्थिर रहने का अभ्यास होने लगता है—विचलित न होने की आदत विकसित हो जाती है। यही वजह है कि जब हम आसनस्थ होते हैं, तब मन भटकता नहीं, बल्कि स्वतः ही स्थिरता की ओर बढ़ता है। प्रत्येक साधक को चाहिए कि वह अपनी दिनचर्या में कुछ समय विशेष रूप से आसनस्थ होकर नामसाधना के लिए निश्चित करे। पूरे दिन में इसके लिए कोई भी समय अनुपयुक्त नहीं है—किसी भी क्षण यह साधना आरंभ की जा सकती है। अक्सर देखा जाता है कि साधकों के मन में यह भ्रम या उलझन रहती है—“क्या ब्रह्ममुहूर्त में ही नामसाधना करनी चाहिए? क्या स्नान के बाद ही साधना करना उचित है?” यदि ऐसे कठोर नियम बना लिए जाएँ, तो जिनकी ड्यूटी ब्रह्ममुहूर्त में है या जो यात्रा पर हैं, वे क्या करेंगे? ऐसे में आसनस्थ होकर नामस्मरण कैसे संभव होगा, इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसी कारण, मुहूर्त या स्नान जैसे बाह्य प्रतिबंधों में स्वयं को न उलझाएँ। चौबीस घंटों में जब भी समय, मन और परिस्थिति अनुकूल हो—वही सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त है। यदि इस सहज पद्धति से साधना करें तो उत्तम, अन्यथा कठोर नियमों के कारण साधना छूटने लगती है और मन में यह भावना घर कर जाती है कि ‘हमसे कुछ नहीं हो पाएगा।’ मराठी का प्रसिद्ध मुहावरा है—‘आधीच उल्हास…’—यानी आरंभिक उत्साह के बाद साधना रुक जाती है। ऐसे निर्णय लेने में देर नहीं लगती। अतः समय की पाबंदी छोड़कर, दिन के किसी भी समय पर नामसाधना करना उचित है। शुभ-अशुभ या किसी विशेष काल की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। जैसा शास्त्रों में कहा गया है,

शुभाशुभ पाहता भावना राम झाली।
निशिदिनी गुरुराया …. (श्री पंत महाराज)

अब आइए, आसनस्थ होकर नामसाधना के विषय पर और गहराई से विचार करें। जब आप आसनस्थ होते हैं, तो वही आसन चुनें जो आपके लिए सबसे अधिक सुविधाजनक और आरामदायक हो—ऐसा आसन जिसमें आप बिना असुविधा के दस-पंद्रह मिनट या उससे अधिक समय तक स्थिर बैठ सकें। पारंपरिक रूप से पालथी मारकर बैठना आदर्श माना जाता है, लेकिन हर किसी के लिए यह संभव नहीं होता। यदि आपके लिए पालथी मारना कठिन है, तो तनिक भी चिंता न करें; अपने शरीर की सुविधा और उम्र के अनुसार कोई भी सुखद आसन अपनाएँ। अनेक लोगों के लिए विशेषकर उम्र बढ़ने पर, जमीन पर बैठना या उठना कठिन हो सकता है। ऐसे में आसन को लेकर कठोरता न बरतें—सुखासन ही उपयुक्त है, निद्रासन नहीं! अन्यथा साधना निद्रा में बदल सकती है और उसका उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा। नामसाधना करते समय कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है, परंतु यह भी जानना आवश्यक है कि किन नियमों का और क्यों पालन करना है। जब भी परमार्थशास्त्र का अध्ययन करें, हर ‘क्यों’ का उत्तर तलाशें। यदि “क्यों” की जानकारी होगी, तो यह देख पाना संभव होगा कि साधना से जैसे परिणाम अपेक्षित हैं, वैसे मिल रहे हैं या नहीं। यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं, तो समय रहते साधना के मार्ग को सुधार सकते हैं। इस प्रकार का विवेकशील विश्लेषण ही साधक के मार्ग को सरल, सुरक्षित और सफल बनाता है।

आप जब आसनस्थ होकर नामसाधना करते हैं, तब वाणी से नाम लेना पड़ता है।

घेई घेई माझे वाचे । गोड नाम विठोबाचे ॥ (तु.गा. ३९५.१)

तुकाराम महाराज बार-बार हमारे सामने आदर्श प्रस्तुत करते हैं! वे अभंग का उल्लेख तो करते ही हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उस अभंग के भाव को अपने आचरण में उतारना। ‘घेई घेई माझे वाचे, गोड नाम विठोबाचे’—इस अभंग में तुकाराम महाराज अपनी ही वाणी को सूचना दे रहे हैं। यही संदेश है कि नाम का उच्चारण वाणी से करना चाहिए, वह भी शांत, मधुर और स्थिर लय में—जल्दबाजी में नहीं, जैसे कोई पीछे पड़ा हो! यदि आप ‘श्रीराम जयराम जयजयराम’ बहुत तेज़ी से दोहराएँगे, तो संभव है कि शब्दों का रस और अर्थ ही खो जाए, और रामजी भी समझ न पाएं कि आप क्या कह रहे हैं। नामस्मरण सौम्य लय में, शांति और एकाग्रता के साथ करें, ताकि हर शब्द हृदय में उतर सके। अक्सर हम संख्या बढ़ाने की जल्दी में गति बढ़ा देते हैं, मगर परमार्थ साधना में ‘संख्या बनाम गुणवत्ता’ का प्रश्न बार-बार उठता है। जब मैं अत्यंत शांत चित्त से जप करता हूँ और जब जल्दबाजी में करता हूँ, तो दोनों स्थितियों में अंतर सहज अनुभव किया जा सकता है। अब मुझे भलीभांति समझ में आता है कि यह अंतर क्यों है—गुणवत्ता की साधना में ही सच्चा रस और अनुभव है।

चाहे आप ‘श्रीराम जयराम जयजयराम’, ‘जयजय रामकृष्णहरी’, ‘ॐ नमः शिवाय’—कोई भी नाम लें, उसे शांत, मधुर और एकाग्रचित्त वाणी से उच्चारण करें। गिनती या संख्या का बोझ छोड़कर, शब्दों के रस, उनका भाव, और उनके प्रभाव को पूरी तरह अनुभव करें—यही नामसाधना का सार है। एकाग्रता का अर्थ है कि समस्त ध्यान शब्दों पर, नाम के अर्थ और भाव पर केंद्रित रहे। यदि इस बीच आपने माला ली, तो अब ध्यान माला की गिनती पर चला जाता है—एक-एक मनका, मेरु का उलटना, दस माला पूरी करना—यानी अब मन कई हिस्सों में बंट गया। यदि लक्ष्य मन को एकाग्र करना है, तो ऐसे विभाजन क्यों? अनुशासन के लिए आरंभ में माला उपयोगी है—जैसा निर्देश दिया गया हो, वैसा पालन करें। गिनती भी करें, ताकि निश्चित संख्या पूरी हो सके, और यदि कम रह जाए तो उसे पूर्ण किया जा सके। किंतु साधना के क्रमविकास में एक समय ऐसा भी आना चाहिए, जब ये सारे बाह्य साधन स्वतः छूटने लगें और साधना का केंद्र केवल नाम और भाव बन जाए। इस क्षेत्र में कोई भी ईमानदार प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता, पर साधना में क्रमशः बाह्य साधनों का मोह कम होना ही प्रगति का संकेत है।

एक कहानी सुनते हैं—जब छोटे बच्चे पहली बार स्कूल जाते हैं, तो उनके पास एक छोटा सा थैला होता है। उस थैले में आमतौर पर क्या होता है? एक टिफिन डिब्बा, एक रुमाल, और सुरक्षा के लिहाज से एक अतिरिक्त चड्डी—अगर कुछ अनहोनी हो जाए तो! लेकिन गौर करें, उस थैले में न किताब होती है, न कापी, न पेंसिल—यानि शिक्षा का कोई भी असली साधन नहीं होता। अब सोचिए, यदि वह थैला जीवन भर वैसा ही रहे, तो क्या वह विकास कहलाएगा? जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, उस थैले में अध्ययन-सामग्री जुड़ती है—किताबें, कापियां, पेन-पेंसिल। और जब हम कॉलेज या विश्वविद्यालय पहुँचते हैं, तो बाहरी साधन गौण हो जाते हैं—हाथ खाली, लेकिन भीतर अनुभव और समझदारी से भरे रहते हैं। यही क्रमविकास है—आरंभ में साधन आवश्यक हैं, लेकिन यदि वे हमेशा वैसे ही रह जाएँ, तो उसे प्रगति नहीं कहा जा सकता। यही बात केवल मैं नहीं, तुकाराम महाराज भी कहते हैं: “नित्य नवा दिवस जागृतीचा”—हर दिन नया, हर दिन जागरूकता से भरा हो। इसका सार यही है कि जीवन में निरंतर क्रमविकास होना चाहिए, और इसकी जिम्मेदारी भी मेरी ही है। जब साधना निरंतरता से आगे बढ़ती है, तो एक समय ऐसा आता है कि नामस्मरण सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाता है—

घेवो राम हमारा जप करे, हम बैठे आराम  – (संत कबीर)

इसी ऊँचाई को असली साधना की पराकाष्ठा कहा जाता है। यह शिखर सहजता से नहीं मिलता, बल्कि निरंतर प्रयास, दृढ़ संकल्प और एकनिष्ठ अभ्यास से ही संभव होता है। संत कबीर महाराज इस अवस्था का अत्यंत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं—वे कहते हैं कि अब वे स्वयं राम का जाप नहीं करते, बल्कि कहते हैं, “अब मुझे नाम लेने की आवश्यकता नहीं, अब तो वही (प्रभु) मेरे लिए जप करेंगे!” यह स्थिति किसी Relay race की तरह है, जिसमें एक धावक अपने साथी को बैटन सौंप देता है; उसी प्रकार साधक अपने समस्त प्रयास प्रभु को समर्पित कर देता है। अब भगवान स्वयं साधना की जिम्मेदारी उठाते हैं। ऐसे संत भगवान को भी अपने ‘सहकर्मी’ बना लेते हैं—जिन्होंने जीवन भर साधना की, उन्हें पूरा विश्वास होता है कि भगवान उन्हें कभी छोड़ेंगे नहीं। भक्त और भगवान के बीच का यह ‘लेन-देन’, यह परस्पर समर्पण, अध्यात्म का सबसे सुंदर बंधन है। यदि हम भी साधना के इस शिखर तक पहुँच सकें, तो यही साधना की पूर्णता है—जहाँ साधक और साध्य एकरस हो जाते हैं।

इसी कारण वाणी से धीरे-धीरे, शांत लय में नामसाधना करनी चाहिए। यह भी संभव है कि किसी को पाँच वर्ष तक, किसी को दस वर्ष तक या उससे भी अधिक समय तक माला या गिनती का सहारा लेना पड़े। यह अवधि हर साधक के लिए अलग-अलग हो सकती है—क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत सुकृत और अर्जित पुण्य भिन्न होता है। साधना की गति और अवस्था का निर्धारण बाहरी मानकों से नहीं, बल्कि अपने भीतरी संस्कारों और पुण्य संचय से होता है। इसलिए साधना में धैर्य, निरंतरता और आत्मनिरीक्षण सबसे महत्वपूर्ण हैं।

जन्मोजन्मी आम्ही बहु पुण्य केलें । 
म्हणोनि विठ्ठलें कृपा केली ॥  –संत भानुदास

इसका अर्थ है कि अनंत जन्मों में हमने असंख्य पुण्यों का संचय किया, इसी कारण विठ्ठलजी की कृपा हम पर हुई। इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि यदि मैंने पुण्य संचय किया, तो विठ्ठलजी मुझ पर कृपा करेंगे। अब यहाँ प्रश्न उठता है—क्या पुण्य का संचय करना पड़ता है या वह स्वाभाविक रूप से हो जाता है? यह विचार मन में आता है कि पुण्य अर्जित करना एक जिम्मेदारी है, एक सचेतन प्रयास है। इस प्रकार विचार करते-करते धीरे-धीरे ‘जिम्मेदारी का परमार्थ’ क्या है, इसका बोध होने लगता है।

तात्पर्य यह है कि नामसाधना के समय वाणी से शांत, स्थिर लय में नाम लें, गिनती में न उलझें; मन को एक ही लक्ष्य पर केंद्रित रखें, उसे इधर-उधर बिखरने न दें। साधना के क्रम में एक समय ऐसा भी आएगा जब आपके लिए यह आवश्यक होगा कि जो नाम आप जप रहे हैं, वह आपके कानों को स्पष्ट सुनाई दे। यह एक महत्त्वपूर्ण नियम है: जब आपके आस-पास कोई न हो, तब ऊँची आवाज़ में नाम लें; और जब कोई आस-पास हो, तो मन ही मन नामस्मरण करें। साधना से किसी दूसरे को कष्ट न हो, इसका ध्यान रखना चाहिए—क्योंकि जिस दूसरे को आप देख रहे हैं, उसमें भी वही परमात्मा स्थित हैं, जिसका नाम आप ले रहे हैं। ऐसा विचार करने से यह बोध होता है कि वाणी की चार अवस्थाओं में वैखरी वाणी से नामस्मरण सर्वोत्तम है। ‘हरी मुखे म्हणा हरी मुखे म्हणा’—यह उद्घोष सबसे श्रेष्ठ है। जब हम ऊँची आवाज़ में नामसाधना करते हैं, तो उसे सुनना भी सुलभ हो जाता है; यद्यपि यह इतना सहज नहीं है। जैसा अनुभव है कि कोई भी पाठ यदि मुख से ऊँचे स्वर में किया जाए तो वह आसानी से कंठस्थ हो जाता है, वही बात यहाँ भी लागू होती है। मन ही मन पाठ करना उतना सुलभ और सशक्त नहीं होता। इसी कारण मैंने ऊँचे स्वर में ‘रामकृष्णहरी रामकृष्णहरी’ उच्चारण किया, ताकि मेरा कहा हुआ नाम मेरे कानों में पड़े—इसलिए वाणी से नाम उच्चारण करना श्रेयस्कर है।

तुम्ही आईकारे कान। माझ्या विठोबाचे गुण। (तु.गा. ३९५.३)

तुकाराम महाराज ने प्रत्येक इंद्रिय को काम नियत कर दिए हैं।

सदा माझे डोळा जडो तुझी मूर्ति। — (तु.गा. १५)

आँखों का उपयोग किसलिए करें? आँखों से भगवान का दिव्य रूप देखें; कानों का उपयोग किसलिए करें? कानों से भगवान का नाम श्रवण करें; और वाणी का उपयोग किसलिए करें? वाणी से भगवान का नाम उच्चारित करें। इस प्रकार, प्रत्येक इंद्रिय को उसका श्रेष्ठतम कर्तव्य सौंपना ही साधना की पूर्णता है।

हमारी इंद्रियाँ—मुख्यतः आँखें, कान और वाणी—हमारे जीवन के व्यवहार में सबसे अधिक सक्रिय रहती हैं। हम देख कर, सुन कर, और बोल कर इस संसार से जुड़ते हैं। नामसाधना के संदर्भ में भी यही तीनों इंद्रियाँ केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। अक्सर साधकों के सामने यह चुनौती आती है कि वे वाणी से नामोच्चारण तो कर रहे होते हैं, लेकिन मन में अलग-अलग विचार चल रहे होते हैं, या उनकी आँखें और कान इधर-उधर भटक रहे होते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि नामस्मरण की संख्या तो बढ़ती है, पर उसमें वह गुणवत्ता और एकाग्रता नहीं आ पाती, जिसकी साधना से अपेक्षा होती है।

यदि आप चाहते हैं कि आपकी साधना में गुणवत्ता आए, तो तीनों इंद्रियों का समन्वय आवश्यक है। सबसे पहले, नाम का उच्चारण शांत, लयबद्ध और भावपूर्ण होना चाहिए। जब आप नाम जपें, तो उसी क्षण अपने कानों से उस उच्चारण को ध्यानपूर्वक सुनें। और जिसका नाम ले रहे हैं, उसका रूप मन की आँखों के सामने लाने का प्रयास भी साथ-साथ करें। यह रूप कोई भी हो सकता है—कृष्ण, राम, शिव, या कोई भी आराध्य, जिसका स्वरूप आपके मन में गहरा अंकित हो।

यहाँ एक रोचक चुनौती भी आती है: जब साधना के समय नाम सुनने का प्रयास करते है तो भगवान का रूप देखने पर ध्यान नहीं राहता, और जब रूप देखते है तब नाम सुनने पर ध्यान नाही टिकता। इसी द्वंद्व को साधन का आविष्कार करने वालों ने बारीकी से समझा है और एक चक्रीय अभ्यास का सुझाव दिया है। उदाहरण के लिए—पहली बार ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण करें और उस ध्वनि को पूरी तरह सुनें। अगली बार वही नाम लेकर शिवजी का रूप मन में लाएँ। इस तरह एक बार श्रवण, एक बार दर्शन—इस चक्रीय अभ्यास से मन की एकाग्रता विकसित होती है। ध्यान भटकने की संभावना कम हो जाती है, क्योंकि बार-बार मन को सुनने और देखने के बीच स्थानांतरित करना पड़ता है। ये जो दो व्यवधान हैं, वे नाम से संलग्न हैं; रूप नामी का देखें, कानों से उसी का  नाम श्रवण करें, उसी के नाम का वाणी से नाम उच्चारण भी करें। जब यह सिद्ध होता है, तब नाम से निष्ठा बनी रहती है।

धीरे-धीरे जब अभ्यास परिपक्व होता है, तब तीनों इंद्रियाँ—आँख, कान और वाणी—एक ही लक्ष्य में जुड़ जाती हैं। इसे ‘नामनिष्ठा’ कहा गया है—पूर्ण समर्पण और एकाग्रता के साथ नामस्मरण। कई बार यह देखा जाता है कि वाणी से नामोच्चारण हो रहा होता है, लेकिन कान किसी और बात पर लगे हैं, या आँखें भटक रही हैं। कुछ साधक सलाह देते हैं कि नामसाधना के समय आँखें बंद कर लें, ताकि दृश्य भंग न हो। लेकिन बहुत लोगों के लिए बंद आँखों से मन और अधिक भटकने लगता है। हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त विधि अलग हो सकती है, इसलिए यह प्रक्रिया पूरी तरह ‘कस्टम मेड’ है—हर साधक को अपनी प्रवृत्ति, परिस्थिति और जीवनशैली के अनुसार अपनी साधना की पद्धति को खोज लेना चाहिए।

अंत में, सबसे महत्त्वपूर्ण यही है: साधना का सूत्र साधक के हाथ में है। अपने अनुभव, सहजता और आंतरिक प्रेरणा के अनुसार ध्यान विधि को अपनाइए—यही सच्ची नामसाधना की राह है।

वैराग्य, संग-त्याग और गृहस्थ

हर व्यक्ति की आवश्यकताएँ और साधना की पद्धति अलग-अलग होती हैं—यह स्वाभाविक और आवश्यक भी है। जब साधक वाणी से नाम जपता है, कानों से उसे सुनता है और आँखों से अपने आराध्य का रूप देखता है, तो उसका मन जगत के अन्य विचारों से स्वतः ही कट जाता है। यह अवस्था अनायास ही वैराग्य की ओर ले जाती है। यह वैराग्य साधना का एक बड़ा मील का पत्थर है, जिसे प्राप्त करना हर साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।

हमें अक्सर ‘वैराग्य’ शब्द सुनकर लगता है कि इसका अर्थ संन्यास लेना, संसार छोड़ना या जंगल में चले जाना है। लेकिन वास्तव में वैराग्य का अर्थ है—दृश्य जगत के चिंतन का अंत। दृश्य तो सामने हो सकते हैं, लेकिन यदि उनके विषय में मन में कोई विचार नहीं उठता, तो वही सच्चा वैराग्य है। दृश्य स्वयं कष्टप्रद नहीं होते; उनके बारे में बार-बार सोचते रहना, वही पीड़ादायक होता है।

इसी को समझाने के लिए एक कथा है। एक राजा था, जिसकी रानी ही उसकी गुरु थी—इस वर्ग को (महिलाओं को) सुनने में बड़ी प्रसन्नता होगी। एक दिन उस राजा को अचानक वैराग्य का भाव आ गया। उसे लगा कि अब उसे संसार से दूर रहना चाहिए। उसने महल की सबसे ऊँची मीनार पर चढ़कर, वहाँ एकांतवास शुरू किया। उसके लिए सीढ़ियाँ लगाई गईं और भोजन की टोकरी रोज़ डोर से ऊपर भेजी जाने लगी। उसने न बाहर देखा, न ऊपर, न दाएँ-बाएँ—पूर्ण एकांत में रहने का संकल्प लिया। एक महीने बाद रानी ने उसे नीचे बुलाया और पूछा, “क्या तुम्हें मीनार की दीवारें दिखाई देती थीं?” राजा ने कहा, “हाँ।” फिर पूछा गया, “क्या वहाँ पत्थर था? हवा थी? भोजन था?”—राजा ने सबका स्वीकार किया। रानी ने समझाया, “फिर आपका वैराग्य कहाँ था? तुम इन सब विषयों का लाभ लेते रहे, भोजन करते रहे, हवा लेते रहे, दीवारों का सहारा रहा—फिर सच्चा वैराग्य कहाँ? अगर ये न होते तो क्या तुम जीवित रह पाते?” डोर लगाकर रोज़ डिब्बा राज्य के लिए नीचे से ऊपर आता था। और वह भी राजा के लिए बनाए गए भोजन का डिब्बा! वैराग्य के अनुकूल ही होगा! रानी ने कहा, “आइए अब नीचे, बहुत हुआ आपका वैराग्य!”

अर्थ है: दृश्य जगत का अस्तित्व कष्ट नहीं देता, बल्कि बार-बार उसके विषय में सोचते रहना ही कष्टप्रद है। साधना की सच्ची अवस्था वही है, जब मन को दृश्यों के चिंतन से मुक्त कर दिया जाए—बाहरी वस्तुएँ रहें, लेकिन मन उनका आश्रित न रहे। यही वैराग्य है, और यही साधक की प्रगति का मापदंड भी है।

यदि हम इस विचार के मर्म को समझें, तो ‘वस्तु-त्याग’ और ‘संग-त्याग’ के अर्थ और अंतर हमारे सामने स्पष्ट हो जाते हैं। नामसाधक के लिए आवश्यक यह नहीं है कि वह वस्तुओं का त्याग करे, बल्कि उसे संग-त्याग—अर्थात संग की आसक्ति का त्याग—करना चाहिए। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है कि वस्तु-त्याग की अपेक्षा संग-त्याग अधिक सरल और प्रभावी है। अमृत की उपासना के लिए भी संग-त्याग को ही प्रमुख बताया गया है। श्रीकृष्ण का यह विचार हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि हम सभी गृहस्थ हैं—प्रपंच में रत हैं—और हममें से अधिकांश के लिए संन्यास और वस्तु-त्याग व्यावहारिक नहीं है, इसमें मैं स्वयं भी शामिल हूँ।

इस प्रकार, यह निश्चित है कि हम गृहस्थ जीवन नहीं छोड़ेंगे, लेकिन आत्मिक मुक्ति प्राप्त करना हमारा भी लक्ष्य है। जब दोनों ही बातें स्पष्ट हैं, तो साधना का मार्ग भी स्पष्ट हो जाता है: वस्तु-त्याग नहीं, बल्कि संग-त्याग। यहां संग-त्याग का अर्थ है—संग के प्रति मन की आसक्ति का त्याग। परंतु इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जब हम भीतर से आसक्ति छोड़ते हैं, तो उसका प्रदर्शन बाहर प्रकट नहीं होता, और न ही समाज को इस  बारे कुछ पाता चलता है। संसारी लोगों की प्रवृत्ति यह होती है कि वे कोई भी विशेष कार्य करें, तो समाज को उसका पता चलना चाहिए, उनकी प्रशंसा होनी चाहिए—‘वाह! आपके जैसा कोई नहीं।’ उन्हें सामाजिक मान्यता की आवश्यकता होती है।

यही कारण है कि परमार्थशास्त्र का एक मूल नियम है: यदि हम अपनी सांसारिक आदतों और स्वभावों को ही आध्यात्मिक जीवन में उतारने लगें, तो सच्चा परमार्थ कभी सिद्ध नहीं होगा। वस्तु-त्याग के बाह्य रूप को अपनाने की आवश्यकता नहीं है। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में स्पष्ट किया है—“असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा”—मजबूत असंग की तलवार से आसक्ति का निवारण करो।

सारी जानकारी पहले से ही उपलब्ध है, सब कुछ हमारे सामने है। कोई भी वक्ता कुछ मूल रूप से नया नहीं कहता; अधिकतर वक्ता वही बातें थोड़े नमक-मिर्च के साथ दोहराते हैं, बस श्रोताओं को लुभाने का प्रयास करते हैं। सच्चाई यह है कि अध्यात्म में कोई नई खोज नहीं होती—यदि कोई कुछ नया बताने का दावा करे, तो उसे सुनना भी उचित नहीं। जो भी उपदेश गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, दासबोध, ज्ञानेश्वरी, एकनाथी भागवत, तुकाराम महाराज की गाथाएँ या अन्य संत वाङ्मय में कहा गया है, केवल वही सत्य मानना चाहिए; जो इनमें नहीं है, उसे अस्वीकार करना ही श्रेयस्कर है। यह निर्णय दृढ़ और अडिग होना चाहिए—तब मन में ‘किसका अध्ययन करूँ?’ यह प्रश्न ही नहीं उठेगा।

लेकिन एक और रोचक बाधा सामने आती है। जैसे ही मित्र या परिवारजन जान लेते हैं कि आप परमार्थशास्त्र में रुचि रखने लगे हैं, वे अपने घर की सारी किताबें आपके पास छोड़ जाते हैं! यह वस्तुतः संग-त्याग का व्यावहारिक अर्थ भी है। साधक को वस्तु-त्याग नहीं, संग-त्याग करना चाहिए—यहाँ तक कि पुस्तकों का भी! मित्रों की आदत होती है—जिन किताबों से वे स्वयं मुक्त होना चाहते हैं, वे आपके ऊपर ‘बमबारी’ कर देते है। अब आपके पास हर संप्रदाय की, हर मत-मतांतर की किताबें आ जाती हैं—द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, आदि। वे जो उन्हें पसंद है, वही आपको सौंप देते हैं। और जब इतना संग्रह इकट्ठा हो जाए, तो आपको लगता है कि उनका अध्ययन करना आपकी जिम्मेदारी है, क्योंकि आपके पास आ गई हैं। इससे साधक की बुद्धी भ्रमित हो जाती है।

इसलिए समस्त साधकों को जागरूक रहना चाहिए कि संत वाङ्मय व गीता आदि शास्त्रों की जो मर्यादा है, उसका अतिक्रमण न हो। शास्त्रों की सीमाएँ, संतों की मर्यादा, शंकराचार्य के भाष्य—इन सबकी मर्यादा का सम्मान आवश्यक है। यही मर्यादा हमें यह ज्ञान कराती है कि अंत में हमारा आध्यात्मिक लक्ष्य क्या है—और वह लक्ष्य बहुत सीमित, अल्प, संक्षिप्त और केंद्रित होता है—वह सर्वत्र फैला नहीं होता।

इसलिए तुकाराम महाराज हमें आश्वस्त करते हैं,

थोडें आहे थोडें आहे। चित्त साह्य जालिया॥

यह उपलब्धि विशाल है या सूक्ष्म—इस पर विचार करने की आवश्यकता नहीं। परमार्थशास्त्र में कोई असाध्य या भयावह बात नहीं है, बस चित्त का सहयोग चाहिए। चित्त यदि स्थिर रहे, तो साधना सहज होती है। आवश्यकता से अधिक वाङ्मय का अध्ययन चित्त को अस्थिर कर देता है, जिससे विवेक क्षीण हो जाता है और आगे का मार्ग अस्पष्ट हो जाता है। इसी असमंजस से अविवेक जन्म लेता है और साधक की साधना दिशा विहीन हो जाती है—जैसे नौका बेराह हो जाती है। इससे बचने के लिए यह विचार आवश्यक है। यह विचार संकुचित नहीं, बल्कि व्यावहारिक है; अन्यथा लोग आक्षेप करते हैं, ‘सारे मार्ग वहीं जाते हैं!’ यह बात सत्य है, लेकिन प्रत्यक्ष अनुभव के बाद ही इसका महत्व समझ में आता है। ज्ञानेश्वर महाराज की एक ओवी इसी संदर्भ में है—

जैसा प्रगटलिया गभस्ती  । अशेषही मार्ग दिसती  ।
तरी तेतुलेही काय चालिजती  । सांगे मज ॥ (ज्ञाने. २.२६१)

सूर्य के उदय के साथ, वनों और पर्वतों पर अनेक मार्ग स्पष्ट हो जाते हैं। यह निर्विवाद सत्य है कि सभी मार्ग पर्वत के शिखर तक पहुँचते हैं। लेकिन क्या प्रत्येक मार्ग का अनुसरण किया जाना चाहिए? मराठी में कहा गया है—‘तरी तेतुलेही काय चालिजती’—हर मार्ग का अनुसरण करने से उद्देश्य नहीं सधता। यदि आप एक मार्ग पर अडिग रहते हैं और शिखर तक पहुँचते हैं, तभी स्पष्ट होता है कि अन्य सारे मार्ग भी वहीं पर आते हैं। यदि बार-बार मार्ग बदलते रहे, तो शिखर तक पहुँचना कठिन है। यह बराबर है कि सभी मार्ग एक ही शिखर पर मिलते हैं, लेकिन यह तभी समझ मे आता है जब आप स्वयं उस शिखर तक पहुँचें। इस सत्य का उपयोग केवल तर्क-वितर्क के लिए नहीं, बल्कि साधना के मार्ग पर दृढ़ता के लिए होना चाहिए। सारांश यह है कि वाणी से नाम उच्चारण, कानों से श्रवण, और आँखों से रूप दर्शन—संतों द्वारा बताई गई पद्धति का अनुसरण—साधना को अत्यंत सरल और सुलभ बना देता है।

नाम में आत्मचर्चा

अब नामसाधना संबंधी एक ओवी पर विचार करते हैं। यह ओवी हमें अपरिमित ज्ञान प्रदान करती है, मैं उसका उच्चारण करता हूँ –

कृष्ण विष्णु हरि गोविंद । या नामाचे निखळ प्रबंध ।
माझी आत्मचर्चा विशद । उदंड गाती ॥ (ज्ञानेश्वरी ९.२१०)

नामसाधना के संदर्भ में संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा रचित यह ओवी अत्यंत प्रभावशाली है। यदि इन ओवियों का अभ्यास सही पद्धति से किया जाए, तो वे साधक से संवाद करती हैं—उनका भावार्थ जीवन में उतरता है। यदि केवल यांत्रिकता से पाठ किया जाए, तो वह सतही रह जाता है; गहराई तभी आती है जब हम ओवियों को आत्मसात करें।

हमारे यहाँ एक सौ आठ पाठ की परंपरा है। एक बार नासिक जाना हुआ, जहाँ एक दंपत्ति ने दासबोध ग्रंथ के एक सौ आठ पाठ किए थे। पाठ का समापन भोजन के आयोजन से होता है—एक सौ आठ दंपत्तियों को आमंत्रित किया गया था। मैं भी अपनी पत्नी के साथ वहाँ गया था। उस अवसर पर मेरा प्रवचन था, और वह सफल भी रहा। भोजन के बाद सभी दंपत्तियों ने प्रसादी ग्रहण की और प्रस्थान किया। कुछ दूर चलने के बाद मेरी पत्नी को याद आया कि वह अपना बटुआ वहीं भूल गई है। हम आधे घंटे बाद पुनः उस घर पहुँचे, तो देखा—जिस दंपत्ति ने एक सौ आठ परायण किए थे, उनके बीच जोरदार विवाद चल रहा था।

जालें साधनाचें फळ। संसार जाला सफळ।
निर्गुण ब्रह्म तें निश्चळ। अंतरीं बिंबले  ।। (दासबोध २०.२६)
हिसेब जाला मायेचा। जाला निवाडा तत्वांचा।
साध्य होतां साधनाचा। ठाव नाहीं ।। (दासबोध २०.२७)

यदि एक सौ आठ परायणों के पश्चात भी घर में कलह और असंतोष उत्पन्न हो, तो सोचिए—समर्थ रामदास स्वामी जैसे संत, जो समाधि में स्थित हैं, वे हमारे आचरण के विषय में क्या सोचते होंगे? क्या केवल ग्रंथों का पाठ, जप, या वाचन करना ही पर्याप्त है, जब तक वह हमारे व्यवहार, संबंधों और मनोस्थिति में परिवर्तन न लाए? वास्तव में, साधना और उपासना का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन को संवेदनशील, शांत और स्वस्थ बनाना है। इसलिए ज़रूरी है कि आचरण, उपासना और पाठ को केवल परंपरा या संख्या की दृष्टि से नहीं, बल्कि समझ-बूझ, आत्म-परीक्षण और सजगता के साथ किया जाए। यही वास्तविक साधना है। मेरे अनुभव में, ऐसे कई प्रसंग हैं, जहाँ बाहरी साधना के साथ-साथ आंतरिक परिवर्तन पर भी ध्यान देना आवश्यक सिद्ध हुआ है।

कितनी गहराई या तन्मयता किसी में होती है—यह अनुभव से ही जाना जा सकता है। एक बार मेरा प्रवचन एक महिला मंडल में आयोजित हुआ था। विषय वेदांत का था और मैंने इसे पूरी तन्मयता से प्रस्तुत किया। प्रवचन के समाप्त होते ही मंडल की अध्यक्षा मंच पर आईं। मुझे अपेक्षा थी कि वे विषय या प्रवचन पर कुछ विचार साझा करेंगी या आभार व्यक्त करेंगी। लेकिन उन्होंने बिना भूमिका के घोषणा की—“इस कार्यक्रम के अवसर पर जो ‘फैंसी ड्रेस’ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है, उसका registration मेरे पास करवाएँ।”

यह देखकर स्पष्ट हो गया कि वेदांत जैसे गंभीर विषय की चर्चा वहाँ उपस्थित लोगों के लिए केवल एक औपचारिकता थी—प्रमुख रुचि तो फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में थी! अध्यक्षा शायद पूरे प्रवचन के दौरान मन ही मन यही गिन रही थीं कि कब यह प्रवचन समाप्त हो और वे अपने असली कार्यक्रम की ओर लौटें। ऐसे आयोजनों का वास्तविक परिणाम क्या होता है, इसका अनुभव मुझे पिछले तीस वर्षों में कई बार हुआ है। मैं जो भी लिखता या कहता हूँ, वह इन प्रत्यक्ष अनुभवों से ही उपजा है।

इसी संदर्भ में आगे हमारा विचार चल रहा है,

कृष्ण विष्णु हरि गोविंद । या नामाचे निखळ प्रबंध ।
माझी आत्मचर्चा विशद । उदंड गाती ॥ (ज्ञानेश्वरी ९.२१०)

इस ओवी में कई ‘ज्ञानबा की मेख’ छिपी हुई हैं। हमारे व्यवहार में भी ‘ज्ञानबा की मेख’ का उल्लेख आता है—यानी वे सूक्ष्म सूत्र, जिनसे नामसाधना सार्थक बनती है।

पहली मेख—‘या नामाचे निखळ प्रबंध’। ‘निखळ’ का अर्थ है पूर्णतः शुद्ध, बिना किसी मिलावट के। जब हम ‘रामकृष्णहरी’ या ‘गोविंद’ का नाम लेते हैं, तो उस क्षण हमारे मन में केवल वही नाम, वही भाव रहना चाहिए—कोई अन्य विचार, और कोई स्मृति उसमें न घुलनी चाहिए। यही ‘निखळ’ है—नामस्मरण की निर्मलता। दूसरी मेख—‘प्रबंध’। यहाँ ‘प्रबंध’ का अर्थ थीसिस या ग्रंथ नहीं, बल्कि माला में फूलों की तरह नामों का सघन क्रम है। जैसे माला में प्रत्येक फूल अगल-बगल, निकटता से जुड़ा रहता है, वैसे ही कृष्ण, विष्णु, हरी, गोविंद—हर नाम आपस में जुड़े हों, उनके उच्चारण के बीच कोई दूरी, कोई अन्य विचार न हो। तीसरी मेख—‘माझी आत्मचर्चा विशद। उदंड गाती॥’—इन चारों नामों का आत्मा के साथ जो संबंध है, हमे उस संबंध की चर्चा करनी चाहिए। कैसे करनी चाहिए? ‘विशद’, अत्यंत स्पष्टता से करनी चाहिए और ‘उदंड’, सातत्य से करनी चाहिए। अब कल्पना कीजिए, यदि हम १०८ बार ओवी का पठन करें, लेकिन इन सूक्ष्म अर्थों को न समझें, तो हर बार हम उस अभ्यास का सार चूक जाते हैं! केवल पठन, संख्या या परंपरा नहीं, बल्कि अर्थ की गहराई और आत्मा के अनुभव का निरंतर अभ्यास ही सच्ची साधना है।

अपने व्यावसायिक जीवन में, मैंने अनेक छोटे बच्चों की चिकित्सा की है—कभी डेढ़ साल के, कभी दो साल के। अक्सर कोई बच्चा इमली का बीज निगल लेता, कोई सिक्का, तो घबराए हुए माता-पिता दौड़े चले आते। मैं उन्हें एक सीधा-सा उपाय बताता—एक चम्मच भर अरंडी का तेल पिला दीजिए, वह निगला हुआ पदार्थ स्वतः फिसल जाएगा। अरंडी के तेल की चिकनाई का असर निश्चित है—जैसे ही वह पेट में जाता है, अटकाव दूर हो जाता है।

कुछ ऐसा ही हमारे जीवन और साधना में भी होता है। हम प्रवचन सुनते हैं, कीर्तन और भजन में भाग लेते हैं, ज्ञान की बातें पढ़ते-सुनते हैं, लेकिन जैसे ही ‘प्रपंच’ की अरंडी का तेल आ जाता है, सब सुनाई-सुनाई बात फिसलकर निकल जाती है—मन पर कोई स्थायी असर नहीं पड़ता। यदि हम जीवनभर इसी तरह सतही रूप से सुनते, पढ़ते और फिर सब कुछ भूलते रहें, तो हमें कभी यह अनुभव ही नहीं होगा कि वास्तव में हमारे लिए उचित मार्ग क्या है। 

असल में, ‘प्रपंच’—यानी संसार, परिवार, सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ—स्वयं में न तो बुरी हैं, न ही बाधा। समस्या तब पैदा होती है, जब हम प्रपंच के प्रति ‘आसक्ति’ पाल लेते हैं—वह आसक्ति जो हमारे मन को बार-बार अपने अहम, इच्छाओं और नियंत्रण की भावना में बाँध देती है। वस्तुएँ, लोग या कार्य स्वयं हानिकारक नहीं हैं; हानिकारक है उनसे जुड़ी मोह या ‘मैं’ की भावना, जो हमें भीतर से जकड़ लेती है।

प्रपंच असूनही परमार्थ केला। तो भला रे भला ॥ (संत बाळेकुंद्री)

समर्थ रामदास स्वामी भी इसी बात को रेखांकित करते हैं कि गृहस्थाश्रम, यानी घर-परिवार का जीवन, कोई अपराध या बाधा नहीं है—बल्कि वही समाज की रीढ़ है। वे स्पष्ट कहते हैं कि गृहस्थ ही हैं, जो समाज में संन्यासियों के भोजन, सेवा, व्यवस्था आदि की जिम्मेदारी निभाते हैं।

जरी झाला संन्यासी। तरी बारा वाजता तोंड वासी ॥  (संत रामदास)

यदि गृहस्थ न हों, तो संन्यासियों की सेवा कौन करेगा? स्वामीजी गृहस्थ जीवन की प्रशंसा करते हैं, निंदा नहीं। मध्याह्न के बारह बजे संन्यासी को भी भूख तो लगती ही हैं। उसे भोजन कौन परोसेगा? उसके  भोजन की व्यवस्था करने के लिए कोई तो आवश्यक हैं। यह जान लेने के बाद यह सोचने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती कि ‘मुझे गृहस्थाश्रम से कब मुक्ति मिलेगी और मेरा परमार्थ कब शुरू होगा।’ ऐसी सोच असल में अज्ञान या भ्रम की निशानी है।

ऐसा जो कहते हैं, उनकी स्थिति, 

रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम् । भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्रीः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार॥

इसी संदर्भ में एक सुंदर संस्कृत सुभाषित है—एक भ्रमर (भौंरा) संध्या के समय एक कमल में फँस जाता है। वह सोचता है, ‘रात बीतेगी, सूर्य निकलेगा, तब यह कमल फिर खिल उठेगा और मैं स्वतः मुक्त हो जाऊँगा।’ लेकिन तभी एक गज (हाथी) आकर कमल तोड़ देता है, और भ्रमर उसी में मारा जाता है। यही प्रपंच की स्थिति है: हम सोचते रहते हैं कि ‘जब मेरे बच्चे व्यवस्थित हो जाएंगे, जब पोते-पोतियों का विवाह हो जाएगा, जब सब खुशहाल हो जाएंगे, तब मैं परमार्थ के लिए समय निकालूँगा।’ लेकिन जीवन की अनिश्चितता और काल का गज कब आकर हमारी योजनाओं को छिन्न-भिन्न कर दे, यह कोई नहीं जानता।

इसलिए, परमार्थ के लिए ‘उचित परिस्थिति’ की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। सबसे आवश्यक है आसक्ति का त्याग। परिस्थितियाँ, जिम्मेदारियाँ, और व्यवहार सब पूर्ववत रह सकते हैं, लेकिन यदि आप भीतर से निर्लिप्त, आसक्ति रहित होकर कार्य करेंगे, तो वही सच्चा परमार्थ है। “मैं हूँ, इसलिए कार्य हुआ” या “मेरे कारण हुआ, मेरे बिना नहीं होगा”—यह सबसे बड़ा भ्रम है। और उससे भी बड़ा भ्रम: “मेरे बाद क्या होगा?”—यही आसक्ति का मूल लक्षण है, जिसे पहचानना और छोड़ना ही साधक की प्रगति का वास्तविक मार्ग है।

बहुत-से घरों में देखा जाता है कि पिता या परिवार का मुखिया बार-बार यह कहता रहता है—“मैं चला जाऊँगा, तब आप लोग जान जाएँगे कि मैं कितने कष्ट उठाकर परिवार का सब प्रबंध करता हूँ! जब तक मैं हूँ, तब तक मेरा त्याग आप नहीं समझ पाएँगे।” उनके स्वर अक्सर तीखे और पीड़ित होते हैं; ऐसा लगता है जैसे वे अपने योगदान की स्वीकृति और कृतज्ञता के लिए तड़प रहे हों। ऐसी परिस्थिति में कभी-कभी घर के सदस्य, विशेषकर बच्चे, वर्षों तक चुपचाप सब सुनते-सहते रहते हैं, लेकिन अंततः एक दिन कह उठते हैं—“पिताजी, एक बार आप सच में जाकर तो देखिए!” उस क्षण परिवार के मुखिया के लिए जैसे ज़मीन खिसक जाती है। यह जो पिता कहते रहे, “मैं चला जाऊँगा, तब आप जान जाएँगे।”, क्या ऐसा कहना आवश्यक है? जीवन, संबंध और जिम्मेदारियों में ‘मैं’ और ‘मेरे बिना’ का जो मोह है, वह केवल मानसिक बोझ और तनाव ही उत्पन्न करता है।

अंततः, यह स्वीकार करना ही श्रेयस्कर है कि हमारे जाने के बाद भी दुनिया चलती रहेगी—जैसा एक कवि ने कहा है, “जन पळभर म्हणतील हाय हाय” (लोग पलभर दुख ज़रूर मनाएँगे, फिर सब अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाएँगे)। यही समझ यदि जीवन में आ जाए, तो आसक्ति का भार उतर जाता है और परमार्थ का मार्ग स्वतः खुल जाता है। जब आप आसक्ति रहित होकर कर्तव्य करेंगे, तो कहीं कोई बाधा, हानि या अड़चन नहीं आएगी। जीवन भी सहज हो जाएगा और साधना भी।

आधी प्रपंच करावा नेटका। (दास. १२.१)

‘नेटका’ का अर्थ है—हर काम को पूरी तरह व्यवस्थित, सलीके से, जैसी अपेक्षा है वैसा करना। यह बात महत्वपूर्ण है कि ‘नेटकेपणा’ (उत्तमता, सुव्यवस्था) और आसक्ति—इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है। आप अपने कर्तव्यों को पूरी जिम्मेदारी, सलीके और गुणवत्ता के साथ निभा सकते हैं, इसके लिए आसक्ति या मोह पालना आवश्यक नहीं। यदि हम अपनी जिम्मेदारियों को निर्विकार भाव से, लेकिन पूरी निपुणता और सजगता से निभाएँ—तो संतों के वचन भी सहज समझ में आते हैं, और साधना का मार्ग भी सरल हो जाता है। यही संतों की दृष्टि है—कर्तव्य में उत्कृष्टता, लेकिन मन में निर्लिप्तता।

कृष्णविष्णुहरिगोविंद—इन दिव्य नामों की चर्चा करते हुए हम सबसे पहले विष्णु से आरंभ करते हैं। कृष्ण के विषय में चर्चा करना मानो परीक्षा का कठिन प्रश्नपत्र खोलना है, इसलिए फिलहाल उसे स्थगित रखते हैं; समय आने पर उस विषय पर भी विस्तार से चर्चा होगी।

‘विष्णु’ शब्द का अर्थ ‘व्याप्नोति विष्णुः’ है, जिसका अर्थ है ‘व्याप्त होना’—अर्थात वह जो संपूर्ण सृष्टि में व्यापक है और सबमें समाया हुआ है।

अब एक रोचक प्रश्न उठता है: क्या अधिक व्यापक होना वास्तव में समाधान है, या सीमित होना अधिक सहज है? जीवन में हर व्यक्ति यश, संपत्ति, प्रतिष्ठा, सत्ता—इनकी ‘व्यापकता’ चाहता है। लेकिन व्यापकता का बोझ भी बहुत बड़ा होता है। एक बार विमान यात्रा के दौरान, मेरे पीछे की सीट पर एक अत्यंत विशाल महिला बैठी थीं—उनकी उपस्थिति ने बगल की दो सीटों को भी अदृश्य कर दिया था! यह दृश्य यह सोचने पर विवश करता है कि चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या सामाजिक व्यापकता या उत्तरदायित्व अक्सर बोझ और कष्ट का कारण बन जाता है।

परम सत्य यह है कि सबकुछ व्याप्त करने के बाद भी जो शेष रहता है, वही विष्णु है—‘विष्णुर्व्यापनशीलः’। सत्ता, संपत्ति, कीर्ति, प्रतिष्ठा—इन सबकी अंतिम सत्ता विष्णु ही हैं। अब यदि मैं सोचूँ कि मेरी सत्ता मेरे छोटे-से घर में भी नहीं चलती, तो पूरे संसार पर कैसे चलेगी? यही सत्ता और उत्तरदायित्व का मोह जब हम पाल लेते हैं, तो यह अंततः अपयश और तनाव का कारण बनता है। सच्ची व्यापकता वही है, जो विष्णु की तरह सर्वत्र व्याप्त होकर भी निर्लिप्त रहे।​

इस संदर्भ में ‘विष्णुर्व्यापनशीलः’—विष्णु की सर्वव्यापकता—एक अत्यंत गहरा और प्रेरक विचार है। कल्पना कीजिए, एक विशाल सरोवर है, जिसमें जल लहराता है। यदि उस सरोवर से एक बूँद अलग हो जाए और वह भी सरोवर जितनी विस्तृत होना चाहे, तो इसे कैसे संभव बनाया जा सकता है? बूँद को फिर से सरोवर में मिल जाना होगा—तभी वह उसकी समग्रता प्राप्त कर सकता है।

हमारे जीवन में भी यही सत्य है। जब तक अहं की ‘बूँद’ अलग रहती है, तब तक वह सीमित रहती है। लेकिन जैसे ही वह बूँद अपने स्रोत—विष्णु या सच्चिदानंद में—पुनः विलीन होती है, तब उसकी व्यापकता अनंत हो जाती है। यही ‘थेंबुटा सागरी मिळाला’ का गूढ़ रहस्य है: बूँद का सागर में मिल जाना, और सागर के समावेश का अनुभव। यही वास्तविक साधना है—’वह व्यापनशील विष्णु मैं हूँ’ का साक्षात्कार। तब बाहर से व्यापक बनने की कोई आवश्यकता नहीं रहती; भीतर से ही समग्रता और विस्तार का अनुभव होता है।

कृष्ण के विषय में विस्तार से चर्चा यहाँ नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि उस विषय का रस, उसकी अनुभूति कृष्णजन्माष्टमी के विशेष आगे आनेवाले कीर्तन में आएगी। मैं चाहता हूँ कि कीर्तनकार को अपना विषय पूरे आनंद से प्रस्तुत करने का अवसर मिले। फिलहाल, विष्णु पर ही हमारा ध्यान केंद्रित रहें।

अंत में, जब मैं ‘विष्णु’ का नामस्मरण करता हूँ, तो वह आत्मा के अनुसंधान का ही एक रूप है। अब विष्णु का संबंध आत्मा से कैसे स्थापित करें? विष्णु व्यापक हैं, ‘विष्णुर्व्यापनशील:’ यही आत्मा और विष्णु का परस्पर संबंध हैं। जिस समय मैं विष्णु का नामस्मरण करता हूँ, विष्णु के अनुसंधान में रहता हूँ, तब मैं आत्मा के अनुसंधान में रहता हूँ, और किसी दूसरे के नहीं।

जब मैं विष्णु की तरह व्यापकता और विस्तार का अनुभव करूँगा—जितना सृष्टि में विष्णु व्याप्त हैं—तो मुझे अपनी सीमाओं को बढ़ाने या किसी अन्य पद्धति से महत्व पाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। जीवन में जिन उत्तरदायित्वों या ‘व्यापकता’ का विस्तार होना है, वह प्रारब्ध के अनुसार स्वतः ही होता रहेगा; उसके लिए अतिरिक्त प्रयास अथवा चिंता आवश्यक नहीं। यदि यह भाव मन में स्थिर हो जाए, तो कृष्ण, विष्णु, हरि, गोविंद—इन नामों का जप करते समय आत्मचर्चा स्वतः ही गहराई और स्पष्टता से होने लगती है। इसी भाव को ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं—‘उदंड गाती,’ अर्थात अखंड और स्पष्ट आत्मचर्चा।

‘विशद’ का अर्थ है स्पष्टता से समझना और समझाना, जबकि ‘उदंड’ का अर्थ है अखंडता, निरंतरता।

अब ‘हरी’ की बात करें—‘हरी’ वह है जो हरता है, यानी जो अज्ञान और दुःख का हरण करता है। जब हम ‘हरि’ का नाम लेते हैं, तो यह स्मरण करें कि वह हमारे जीवन के अज्ञान, पीड़ा और क्लेश को दूर करता है।

‘गोविंद’ शब्द का अर्थ है—‘गाः विन्दति इति गोविन्दः’—अर्थात वह जिसकी सत्ता पर हमारी इंद्रियाँ कार्यरत हैं। उदाहरण के तौर पर, कान का कान! केनोपनिषद में वर्णन है, कान का कान जो आत्मा है, उसे गोविंद कहते हैं। कान उनके बिना श्रवण नहीं कर सकते। वह नहीं हैं, तो कान सुन नहीं पाएंगे। वह कब नहीं होता? दो अवसरों पर नहीं होता! एक जब गहरी निद्रा में चिदाभास नहीं होता है; इसका कल विचार करते हैं जब जीव का अर्थ समझ लेंगे। और जब अंतिम समय होता है, तब चिदाभास नहीं होता, तब श्रवण नहीं होता। दूर-दूर से लोग आते हैं मिलने। उस विषय मे वार्ता नहीं करनी होती है, ऐसा वह समय! और अनेक जन विलाप कर रहे होते हैं, “पिताजी, मैं आयी हूँ।” बेटी कहती है! वह निश्चल होता है! “मैं आयी हूँ।” ऐसे बेटी दोहराती है। उसे “मैं” क्या है, कुछ ज्ञान नहीं होता, इसका कारण है कि सुनने वाले कान होते हुए भी सुनाई नहीं देता। इसका भी कारण है। क्योंकि कान के पीछे जो सुनता है, वह वहाँ नहीं होता। ऐसे विचार करते हैं, तो कान का कान कौन है? वह जो है, उसे गोविंद कहते हैं। यह सब यदि ध्यान रहा, तो—

कृष्ण विष्णु हरि गोविंद। या नामाचे निखळ प्रबंध।
माझी आत्मचर्चा विशद। उदंड गाती॥ (ज्ञाने. ९.२१०)

यदि इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए नामसाधना की जाए, तो साधक की साधना में स्वतः गहराई और प्रगति आती है। बिना समझ या जागरूकता के केवल नाम का जप करने से, उसका वास्तविक फल कब मिलेगा, यह निश्चित नहीं कहा जा सकता। लेकिन एक बात निश्चित है—यदि ईमानदारी और श्रद्धा से प्रयास किया जाए, तो उसका परिणाम अवश्य मिलता है। साधना के मार्ग में जो भी परिश्रम किया जाता है, वह आगे के पथ को स्वतः ही सहज और प्रशस्त कर देता है।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ (गीता १०.१०)

कई बार हमारे जीवन में आगे की साधना या अध्ययन के लिए कोई व्यक्ति, कोई गुरु, या कोई प्रेरक प्रसंग निमित्त बन जाता है। इसलिए इस मार्ग पर किया गया प्रत्येक प्रयास—चाहे वह कितना भी छोटा या अपूर्ण क्यों न लगे—कभी व्यर्थ नहीं जाता। कभी-कभी जब हम ज्ञान के अभाव में भी केवल श्रद्धा और भावना से नामसाधना करते हैं, तो उसी साधना के कारण आगे चलकर नाम के गूढ़ अर्थ और उसका महात्म्य समझने का अवसर स्वतः मिलता है। तुकाराम महाराज भी यही कहते हैं: ‘इस मार्ग में किया गया कोई भी प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।’ यह विचार साधक को आश्वस्ति देता है—हर प्रयास आगे का मार्ग खोलता है, नए अवसर लाता है। जब ऐसे अवसर मिलें, तो उनका पूरा उपयोग करना ही हमारी जिम्मेदारी है।

इसी विश्वास और तैयारी के साथ, अगली साधना—ध्यानसाधना—का अभ्यास करेंगे।

हरिः ॐ तत् सत्

🌸 Ram Krishna Hari 🌸

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