तत्वज्ञान और साधना – भाग १

तत्वज्ञान और साधना का संबंध

जिस प्रकार भोजन को खाना, चबाना और पचाना आवश्यक होता है, ताकि वह शरीर में समाकर उसे पुष्ट कर सके, उसी प्रकार तत्वज्ञान को सुनना, उस पर चिंतन करना और अपनी प्रकृति के अनुसार उसे आत्मसात करना आवश्यक है। तत्वज्ञान के माध्यम से जीव, जगत और जगत-कारण के स्वरूप तथा उनके आपसी संबंधों की स्पष्टता होती है। इसके पश्चात, उस जगत के कारण का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने के लिए साधना करनी पड़ती है। उपनिषद, गीता और संत साहित्य में तत्वज्ञान, उसके अनुभव के साधन तथा साधना के लिए आवश्यक अधिकार का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं की जा सकती। अद्वैत वेदान्त का तत्वज्ञान उसके उपविभागों सहित गहराई से समझकर उनमें से किसी एक को स्वीकार करना अत्यंत कठिन कार्य है, किंतु तत्वज्ञान को निश्चित किए बिना साधना का सही मार्ग नहीं चुना जा सकता। साथ ही, मानसिक और शारीरिक अनुकूलता के बिना साधना संभव नहीं है।

यदि हम परमार्थ के मूल ग्रंथों और अधिकारी व्यक्तियों द्वारा लिखित टीकाओं को अलग रख दें, तो शेष उपलब्ध पारमार्थिक साहित्य में क्या प्रमुखता दिखाई देती है? इनमें प्रसिद्ध संतों के चरित्र, उनके अनुयायियों को हुए विविध अनुभव, तत्वज्ञान के अंतहीन विचार, तीर्थक्षेत्रों की जानकारी, छायाचित्र, साधना संबंधी विचार, भावनात्मक कविताएँ और सीधे-सरल विचारों का प्रचुर वर्णन मिलता है। किन्तु, साधना के लिए आवश्यक प्रारंभिक तैयारी या अधिकार का उल्लेख बहुत कम मिलता है। व्यावहारिक जीवन में अनावश्यक बातों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ा जा सकता है, परंतु परमार्थ के मार्ग में ऐसा करना संभव नहीं। साधना के लिए अपेक्षित अधिकार सामान्य लोगों की सामर्थ्य से बाहर की बात प्रतीत होती है, जिससे उसके बारे में पढ़ना या सुनना भी उनके लिए कष्टदायक लगता है। ऐसे सोचने वाले लोगों को छत्रपति शिवाजी के गुरु, मराठी संत समर्थ रामदास स्वामी ने ‘मूर्ख’ कहा है।

परमार्थ मार्ग और साधक का अधिकार

परमार्थ के वास्तविक विचारों का वर्णन करते समय शरीर की नश्वरता, संसार की अस्थिरता और जीवन में व्याप्त अवगुणों पर अवश्य विचार किया जाता है। ये तीनों विषय जहाँ सामान्य व्यक्तियों को अप्रसन्न या क्रोधित कर देते हैं, वहीं गंभीर विचारकों को यह बेचैन करते हैं और साधकों में आत्ममंथन एवं पश्चात्ताप की भावना जगाते हैं।

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे।
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥
(कठ. उप. १-१-६)

भूतकाल के महान व्यक्ति और वर्तमान में विद्यमान श्रेष्ठ जन सत्य का अनुसरण क्यों करते हैं? इसका कारण यह है कि जब मृत्यु ही मानव जीवन का अपरिहार्य सत्य है, और मनुष्य भी अन्न के समान जन्म लेकर वृद्ध होता है तथा पुनः जन्म लेता है, तब असत्य को क्यों स्वीकार किया जाए? “सत्यमेव जयते नानृतम्” – यह श्रुति का स्पष्ट उद्घोष है। अतः सत्य को अपनाने से ही इस जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति संभव है। यही सत्य की वास्तविक विजय है। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है –

त्रिविधि नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभः तस्मादेतत्त्रयंत्यजेत ॥
(गीता १६-२१)

काम, क्रोध और लोभ—ये तीनों जैसे नरक के द्वार के तीन स्तंभ हैं; साधक को चाहिए कि वह सदैव इनसे दूर रहे। यही द्वार जीवात्मा को अधोगति की ओर ले जाते हैं। यह अधोगति क्यों और किस प्रकार होती है? दरअसल, जीवात्मा की उन्नति या पतन का रहस्य तत्वज्ञान के गंभीर चिंतन में निहित है। आत्मोन्नति की साधना के आरंभ में ही काम, क्रोध और लोभ का त्याग अनिवार्य है। “आत्मानं नावसादयेत” – यह स्मृति वाक्य और “ये के चात्महनः जनाः” जैसी श्रुतियों का यदि गहराई से, सुसंगत अर्थ में विचार न किया जाए तो साधना मार्ग में भ्रम उत्पन्न हो सकता है। उपर्युक्त गीता के एक श्लोक के आधार पर साधक तत्वज्ञान और साधना के आवश्यक पक्षों का विवेकपूर्ण विचार कर सकता है।

देहाभिमान, प्रतिबिंब और आत्मोन्नति

जब ब्रह्मतत्व देहरूपी उपाधि में पाया जाता है, तो उसे ही ‘आत्मा’ कहा जाता है। यदि साधक का यह अहंकार समाप्त नहीं होता, तो जीव स्वयं को कर्ता मानने लगता है (अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते) और ‘मैं शरीर हूँ’ की धारणा में बंध जाता है। इसी कारण वह कर्तृत्व, भोक्तृत्व, अनुकूलता-प्रतिकूलता के द्वंद्वों तथा त्रिपुटी के जाल में फँसकर अत्यंत दुर्बल और असहाय हो जाता है। इस बंधन से मुक्त होने के लिए निरंतर साधना आवश्यक है।

साधना के माध्यम से आत्मा की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि आत्मा तो सर्वदा उपलब्ध और स्वयं जीव का स्वरूप ही है। वेदान्त का चिंतन करने वाले प्रत्येक साधक को यह सत्य भली-भाँति ज्ञात रहता है। इसी परिप्रेक्ष्य में, शरीर मात्र उपाधि है। आत्मा का जो प्रतिबिंब बुद्धिरूपी दर्पण में प्रकट होता है, वही जीव कहलाता है। यही जीव अहंकार के कारण अपनी वास्तविकता को भूल जाता है और ‘मैं केवल शरीर हूँ’ की भ्रांति में जीता है।

इस प्रकार ब्रह्मतत्व की अवनति देह या शरीर तक हो जाती है। शरीर नश्वर है, इसलिए इस भ्रांति के कारण ब्रह्म – जो वास्तव में अविनाशी है – शरीर के साथ नष्ट होने वाला प्रतीत होता है। यही स्थिति आत्मनाश या आत्महत्या कहलाती है। इसके विपरीत, जब साधक सही दिशा में प्रवृत्त होता है, तो यह आत्मोद्धार या आत्मोन्नति कहलाती है। संत ज्ञानेश्वर जी ने इस प्रक्रिया की शुरुआत अपनी ओवी में स्पष्ट की है –

हा विचारु नि अहंकार सांडिजे। मग असतीच वस्तू होईजे।
तरी आपली स्वस्ति सहजे। आपण केली ॥
(ज्ञानेश्वरी ६-७१)

अर्थात साधक को चाहिए कि वह गहन विचार के साथ देहाभिमान का त्याग करे और अपने मूल ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो जाए। तभी उसका सच्चा कल्याण संभव है।

शास्त्राभिमान और  अपरोक्षानुभूति

अनेक लोग वेदान्त की जटिल प्रक्रियाओं में उलझकर स्वयं को सिद्ध मानने लगते हैं। किंतु आद्य शंकराचार्य ने इस विषय में स्पष्ट मार्गदर्शन दिया है –

अविज्ञाते परे तत्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला।
अविज्ञातेपि परे तत्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला ॥
(विवेकचूडामणी ६१)

अर्थात वेदान्तशास्त्र का गहरा चिंतन करने के पश्चात भी यदि नित्य प्राप्त परमतत्व का दृढ़, अपरिवर्तनीय,  अपरोक्ष अनुभव नहीं मिल पाए, तो वह चिंतन व्यर्थ हो जाता है। इसके विपरीत, उस परमतत्व का अनुभव प्राप्त होने पर भी वह चिन्तन व्यर्थ ही होता है।

इस श्लोक के माध्यम से वेदान्त चिंतन की (पूर्वोत्तर पक्ष विचार सहित) विशालता, गहराई और प्रखरता को उनका उचित स्थान मिल जाता है। तात्पर्य यह है कि साधना आत्मप्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि केवल अविद्या की निवृत्ति के लिए की जाती है। कुछ लोग सोचते हैं कि केवल शब्दों के माध्यम से अविद्या का नाश होने पर आत्मप्राप्ति सहज ही हो जाएगी। ऐसी सरल और सुविधाजनक धारणा साधक को भ्रमित कर देती है, क्योंकि यह त्याग, तप और विरक्ति के वास्तविक मार्ग से दूर ले जाती है।

गीता का मार्ग

काम, क्रोध और लोभ – ये मानों अविद्या के साकार रूप ही हैं। इसलिए भगवद्गीता के तेरहवें से सत्रहवें अध्यायों में इनका विस्तार से विश्लेषण किया गया है। गीता के आरंभिक छह अध्याय “त्वं” पद (जीव), मध्य के छह अध्याय “तत्” पद (ब्रह्म), और अंतिम छह अध्याय “असि” पद (होना) की विवेचना करते हैं। इसी क्रम में साधना का विचार स्वाभाविक रूप से आता है। “त्वं” का अर्थ है जीव, “तत” का अर्थ है ब्रह्म, और “असि” का अर्थ है हो – अर्थात् तुम (जीव) ब्रह्म हो।

परंतु ब्रह्म स्वरूप होते हुए भी जीव क्यों बना? इसका कारण काम, क्रोध, दंभ, लोभ, दर्प, गर्व, त्रिगुण और त्रिपुटी जैसे दोष हैं। यहाँ एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है – क्या आत्मज्ञान के बाद ये दोष स्वतः समाप्त हो जाते हैं, या इनका नाश होने के बाद ही आत्मज्ञान होता है? इसका उत्तर उतना कठिन नहीं है जितना प्रतीत होता है; गीता में इसका समाधान स्पष्ट रूप से बताया गया है। यह समाधान गहन विचार योग्य है, जिससे संतुलित चिंतन द्वारा साधना का अनुकूल मार्ग निश्चित किया जा सकता है।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
(गीता २-५९)

अर्थात्, निराहार पुरुष के विषय तो छूट सकते हैं, किंतु विषयों का रस – अर्थात वासना – अंत तक बनी रहती है। यह वासना भी तभी पूर्णतः समाप्त होती है, जब ब्रह्मानंद की अनुभूति हो जाती है।

क्रमशः… 

🌸 Ram Krishna Hari 🌸

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