आचरण का परमार्थ
आज का विषय ‘नाम साधना’ है। अब एक घंटे तक और शाम को एक घंटे तक, इस तरह कुल दो घंटे इस विषय पर चर्चा के लिए हैं। किसी भी आध्यात्मिक विषय को समय की मर्यादा मे पूर्णता से स्पष्ट करना कठीण होता हैं। धीरे-धीरे किसी न किसी कारण से विषय लंबा खिंचता ही जाता है। लेकिन मैं इस बात का ध्यान रखूँगा कि विषय अनावश्यक रूप से न बढ़े और और हमारी चर्चा नामस्मरण व नामसाधना के मुख्य मुद्दों तक सीमित रहे।
परमार्थ में यह आग्रह होना चाहिए कि मैं जो भी पढ़ता हूँ, करता हूँ या सुनता हूँ, उसे पूरी तरह समझने का प्रयास करूँ। जो परमार्थ केवल भावनाओं, श्रद्धा, परंपरा या उपासना-पद्धति पर आधारित होता है, उसमें इस तरह की सोच बहुत कम होती है—यह मेरा पिछले पच्चीस-तीस वर्षों का अनुभव है। इसलिए ‘जिम्मेदारी का परमार्थ’ सामान्यतः अपनाया नहीं जाता। अधिकतर लोग सिर्फ आध्यात्मिक ग्रंथों और विचारों को पढ़ने, सुनने और बोलने पर ही जोर देते हैं।
लेकिन ‘आचरण का परमार्थ’ इन सबसे भिन्न होता है। शास्त्र और संत मार्गदर्शन करते हैं कि आध्यात्मिक ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में प्रत्यक्ष रूप से कैसे उतारा जाए । इसलिए, मै जो बोलता हूँ, सुनता हूँ, करता हूँ या पढ़ता हूँ—जैसे जब मैं ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’, ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे’ या ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण करता हूँ—तो उस नाम के नामी का वास्तविक स्वरूप क्या है, यह समझना हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है। यही सभी संतों और शास्त्रों का विशेष आग्रह है।
समजले आणी वर्तले । तेचि भाग्यपुरुष जाले ।
यावेगळे उरले । ते करंटे पुरुष ॥ (दास. १४.६.२५)
प्रस्तुत पंक्तियों में समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं कि हर बात को जानो और जैसा समझ में आए, उसे पूरी तरह समझने के बाद वैसा ही आचरण करो। ‘जैसे समझ में आया’ का अर्थ है—जैसा शास्त्रों में लिखा है, जैसा संतों ने बताया है, वैसा ही। शास्त्र समझने के बाद उसी के अनुसार व्यवहार करो, आचरण करो, विचार करो और उसी के अनुसार बोलो। इस तरह जो जीवन जीते हैं, वे भाग्यशाली होते हैं, और जो ऐसा नहीं करते, उन्हें समर्थ रामदास स्वामी ‘कंगाल’ कहते हैं।
कुछ क्षण पहले कठोर भाषा का उल्लेख हुआ था। मेरी भाषा कठोर नहीं है। जब आप संतों की वाणी सुनेंगे, तो कठोरता की असली परिभाषा समझ पाएंगे। संत सत्य को बिना किसी संकोच के स्पष्ट रूप से कहते हैं। जो लोग अध्यात्मशास्त्र समझते है परंतु वैसा आचरण नही करते ऐसे व्यक्तियों को संत रामदास स्वामी ‘कंगाल’ और ‘कमनसीब’ कहते हैं। हमें लगता है कि यह केवल किसी एक व्यक्ति या संप्रदाय के प्रमुख व्यक्ति की राय है, लेकिन ऐसा नहीं है।
भगवान श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं –
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ (गीता ७.१)
‘असंशयं समग्रं माम्’ का अर्थ है—“मेरा ज्ञान तुम्हें पूर्ण और संदेह-रहित रूप में प्राप्त होना चाहिए।” यह भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। अगर हम यह सोचें कि यह केवल उनके बीच की बातचीत है और हमारा इससे कोई संबंध नहीं है, तो हम भूल जाएंगे कि श्रीकृष्ण यह बात हमसे भी कह रहे हैं—‘तुम मेरे स्वरूप को जैसा है, वैसे ही जानो और संदेह-रहित होकर समझो।’ वे जैसी अपेक्षा अर्जुन से करते हैं, वैसी ही मुझसे भी करते हैं । यदि हम इस बात को याद रखें, तो इसे प्रथम-पुरुषी परमार्थ कहते हैं। परमार्थ तीन प्रकार का होता है—प्रथम-पुरुषी: जब कोई स्वयं आचरण करता है; द्वितीय-पुरुषी: जब कोई केवल दूसरों को उपदेश देता है; तृतीय-पुरुषी: जब शास्त्रवचन और संत वचनों पर बाकी लोग चर्चा करते है। जब भगवान या संतों के उपदेशों पर ‘मैं आचरण करता हूँ’, तो उसे प्रथम-पुरुषी परमार्थ कहते हैं। ‘जिम्मेदारी का परमार्थ’ हमेशा प्रथम-पुरुषी होता है। परमार्थ को प्रथम-पुरुषी ही होना चाहिए, द्वितीय या तृतीय-पुरुषी नहीं। जब यह स्मरण रहे, तो अपनी जिम्मेदारी (उत्तरदायित्व) का बोध होता है, और इसके लिए भीतर से प्रेरित होना आवश्यक है। जैसे इस समारोह के आयोजन और सफलता के लिए आयोजकों को कितने प्रयास करने पड़ रहे हैं, यह मैं अपनी आँखों से देख रहा हूँ। वे इसके लिए समर्पित हैं। उनकी प्रेरणा का मुझ पर भी प्रभाव पड़ा है; इसका क्या असर हुआ, वह मैं यहाँ नहीं बताऊँगा, क्योंकि मुझे अभी आठ-दस दिन और रहना है।
जब तक भीतर से सही प्रेरणा न मिले, हम कोई भी कार्य जिम्मेदारी से नहीं उठाते, न ही उसे संभालते या स्वीकार करते हैं। यह समझना बहुत जरूरी है कि प्रेरित (motivate) होना कितना आवश्यक है। इन तीन दिनों में हम इसी प्रेरणा को जगाने के उद्देश्य से भी विचार करेंगे। तभी भगवान श्रीकृष्ण की कही हुई बातें हमें सही मायनेमें समझ में आएंगी।
समझ बिना साधना व्यर्थ
ज्ञानेश्वर महाराज बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं —
आंधळेया गरुडाचे पांख आहाती । ते कवणा उपेगा जाती।
तैसें सत्कर्माचे उपखे ठाती । ज्ञानेंवीण॥ (ज्ञाने. ९.३०६)
यहाँ गरुड़ का उदाहरण दिया गया है। कहा जाता है कि गरुड़ की दृष्टि, शक्ति और गति अद्भुत होती है, और उसे पक्षियों का राजा माना जाता है। लेकिन यदि वही गरुड़ अंधा हो जाए, तो उसकी तीव्र उड़ान, शक्तिशाली पंख और विशाल शक्ति—सब उसके लिए व्यर्थ हो जाते हैं। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं, ठीक इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति अपने मन से कितने भी अच्छे कर्म करता रहे, लेकिन यदि उसके बारे में ज्ञान न हो, तो उसके सभी प्रयास और सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है, वे उसे कहीं आगे नहीं ले जाते। यह बात स्वयं संत ज्ञानेश्वर महाराज कह रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी यही कहा है, समर्थ रामदास स्वामी ने भी यही कहा है, और ज्ञानेश्वर महाराज ने भी यही कहा है। इतना सब विचार करने के बाद, चलिए उपनिषदों का आधार लेते हैं। उपनिषद कहते हैं—
यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति ॥ (छांदोग्य १.१.१०)
जो कार्य समझदारी और ज्ञान के साथ किया जाता है, वह अधिक प्रभावशाली होता है। बिना समझे किए गए कार्य से सही परिणाम की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अब सभी ने निर्णय दे दिया—भगवान श्रीकृष्ण (स्मृति), उपनिषद (श्रुति) और संत। श्रुति, स्मृति और संतों से परे अन्य कोई आधार नहीं होता। इसलिए, जब इन सभी का मत एक है, तो हमें उसे स्वीकार करना ही चाहिए।
अब एक व्यक्तिगत उदाहरण देता हूँ कि किस तरह बाहरी दिखावा और ऊपरी अनुभव कई बार भ्रामक होते हैं। मैं अपने कंसल्टिंग रूम में रोगियों का परीक्षण कर रहा था। मेरी कुर्सी बड़ी, आरामदायक और घूमने वाली थी, जिसे executive chair कहते हैं। एक दिन, एक माँ अपने चार साल के बेटे को लेकर आई और बोली—‘डॉक्टर साहब, इसकी जांच कीजिए।’ मैं बच्चे की जाँच करने ही वाला था कि अचानक किसी indoor patient की स्थिति बिगड़ गई, और मुझे तुरंत वहाँ जाना पड़ा। करीब दस मिनट बाद जब मैं लौटा, तो देखा—वही चार साल का बच्चा मेरी कुर्सी पर बैठा है, मेरे स्टेथोस्कोप को कान में लगाए, अपनी माँ की ‘जाँच’ कर रहा है!
अब देखिए, यह दृश्य कितना सुंदर और मनमोहक था! वह चार साल का बच्चा मेरी कुर्सी पर बैठा है, उसके चेहरे पर खुशी है। स्टेथोस्कोप कान में लगाया हुआ है, वह माँ की छाती और पीठ को बहुत गंभीरता से जाँच रहा है। क्योंकि आम धारणा है कि डॉक्टर का चेहरा गंभीर होना चाहिए, तो वह भी गंभीर दिखने का प्रयास कर रहा था। अब इस घटना का विश्लेषण करें—कमरा वही, कुर्सी वही, स्टेथोस्कोप वही, जाँच करने की प्रक्रिया भी वही। लेकिन सबसे जरूरी चीज—आंतरिक समझ और ज्ञान—वह मौजूद नहीं था! क्या आप उस बच्चे से इलाज करवाएँगे? बिल्कुल नहीं! शायद उसकी मासूमियत की photo लेंगे, उसकी तारीफ करेंगे, उसे चॉकलेट भी देंगे, लेकिन इलाज कभी नहीं करवाएँगे। इसका कारण यही है कि ऊपर-ऊपर से दृश्य चाहे जितना सुंदर हो, यदि भीतर जरूरी ज्ञान नहीं है, तो उसका कोई महत्व नहीं।
अब इसी सिद्धांत पर विचार करें—पंढरपुर वही है, एकादशी भी वही है, ज्ञानेश्वरी भी वही है। मैं ज्ञानेश्वरी का उदाहरण देता हूँ क्योंकि वह मेरे संप्रदाय से जुड़ी है, और अपने संप्रदाय की चर्चा करते समय उसकी कमियाँ बताने की भी अनुमति होती है। इसी प्रकार, दासबोध वही है, सज्जनगड वही है। लेकिन अगर भीतर आत्मबोध का अभाव है, तो बाह्य अनुष्ठानों का कोई महत्व नहीं। केवल भावना, श्रद्धा या भक्ति काम नहीं आती। इसका मुख्य कारण यह है कि जब तक हम ज़िम्मेदारी नहीं लेते, तब तक जो मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता।
इन सभी बातों पर विचार करने से यह स्पष्ट होता है कि हर कार्य को समझकर करना अत्यंत आवश्यक है। केवल भावना, केवल श्रद्धा, या केवल भावुकता—ये सब काम नहीं आते। ज्ञानेश्वर महाराज ने अपनी सुंदर रचना ज्ञानेश्वरी में लिखा है—
नुसधियाची श्रद्धा । झोंबों पाहसी परमपदा ।
तरी तैसें हें प्रबुद्धा । सोहोपें नोहे ॥ (ज्ञाने. १७.५०)
सुनो अर्जुन! यदि तुम्हें लगता है कि केवल श्रद्धा के बल पर मोक्ष प्राप्त हो जाएगा, तो यह उतना सरल नहीं है जितना तुम समझते हो। इसके लिए कई और तत्त्व आवश्यक हैं। केवल श्रद्धा, केवल भावना, केवल परंपरा, या केवल निर्धारित विधियों का पालन—ये सब पर्याप्त नहीं हैं; ये अवश्य सहायक हैं, इनका उपयोग होता है; लेकिन इनसे जो अंतिम उद्देश्य है, उसकी प्राप्ति संभव नहीं। यदि इस बात को समझ लें, तो अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों की सही समझ विकसित होगी।
कर्तृतंत्र और वस्तुतंत्र
एक और बात समझ लें कि नाम-साधना वास्तव में भक्ति-साधना है, यह उपासना है। भगवद्गीता में केवल दो प्रकार की निष्ठाओं का उल्लेख है—एक ज्ञाननिष्ठा और दूसरी कर्मनिष्ठा। ये दोनों ही शास्त्र-सम्मत हैं, और शास्त्र का सही विचार करना आवश्यक है—
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ॥ (गीता ३.३)
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि पहले मैंने दो निष्ठाएँ बताई थीं—एक ज्ञाननिष्ठा और दूसरी कर्मनिष्ठा। लेकिन उपासना को एक स्वतंत्र निष्ठा के रूप में नहीं बताया गया है। यह एक महत्वपूर्ण बात है। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि उपासना भी एक कर्म है, और इसलिए उसका समावेश कर्मनिष्ठा में होता है। जब मैं नाम-स्मरण करता हूँ, ध्यान-साधना करता हूँ, तीर्थयात्रा करता हूँ, ग्रंथ पढ़ता हूँ, उपवास करता हूँ, व्रत करता हूँ—‘करता हूँ, करता हूँ, करता हूँ’—ये सभी कर्म हैं। अतः उपासना भी कर्म के अंतर्गत आती है। यहाँ एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है—कर्म से जो भी किया जाता है, वह शाश्वत नहीं होता। यह सुनने में अच्छा न भी लगे, फिर भी सत्य को स्पष्ट रूप से बताना आवश्यक है। सत्य सुनने में कैसा लगता है, इसका विचार करना मेरा काम नहीं है। लोग सत्संगमें, प्रवचनोंमें मधुर बातें क्यों बोलते हैं? ताकि उस कहनेवाले वक्ता को बार-बार आमंत्रण देके बुलाया जाए । लेकिन मेरी स्थिति यह है कि यदि मुझे दोबारा न भी बुलाया जाए, तो भी कोई चिंता नहीं। विनोद बाजूँ मे रखकर मुख्य बात समझनी चाहिए। मुद्दा यह है कि केवल दो निष्ठाएँ हैं—ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा। अब, दो प्रकार की व्यवस्थाएँ होती हैं—कर्तृ-तंत्र और वस्तु-तंत्र। यह शास्त्र है, और मैं इस बात का ध्यान रखता हूँ कि शास्त्र को जटिल न बनाऊँ। शास्त्र जटिल नहीं होगा। ‘कर्तृतंत्र’ शब्द का अर्थ है—जो करने से होता है; और जो सहज रूप से होता है, उसे ‘वस्तुतंत्र’ कहते हैं (जो सत्ता पर आधारित हो, सहज प्राप्त हो, नित्य उपलब्ध हो)। अब, जो कुछ भी कर्तृतंत्र होता है, वह मिथ्या होता है, वह कभी भी शाश्वत नहीं होता। लेकिन जो वस्तुतंत्र होता है, वही शाश्वत होता है।
छोटी-छोटी बातों को समझना चाहिए। यहाँ सुनने आए हैं, तो हर शब्द और हर बात को सही मायने में समझकर उन्हें मन में बिठाना है। तर्कबुद्धि से समझने का उद्देश्य यही है कि जो भी मैं करूँ, उसका मुझे संपूर्ण लाभ मिले। हर कर्म का पूरा फल मुझे प्राप्त होना चाहिए। जब सम्पूर्ण फल मिलता है, तो उसका आनंद अनोखा होता है। लेकिन यदि हम केवल ऊपर-ऊपर से काम करें, तो आनंद भी ऊपरी ही रहेगा। ‘आनंद’ शब्द अपने आप में खास है। जब लोग पूछते हैं, “आपके बेटे की पढ़ाई कैसी चल रही है?” तो हर पिता जवाब देता है, “बेटे की पढ़ाई के नाम पर आनंद ही आनंद है!” लेकिन उस उदाहरण में ‘आनंद’ केवल नाम मात्र है—ऐसा दिखावटी आनंद हमे नहीं चाहिए।
हम जिस वास्तविक आनंद की तलाश में हैं, वह है सच्चिदानंद तत्त्व का ‘आनंद’। इस आनंद को प्राप्त करने के लिए कर्तृतंत्र (जो कर्म से होता है) और वस्तुतंत्र (जो स्वभाव से होता है) का विचार जरूरी है। उदाहरण के लिए—सूर्य स्वयं प्रकाशमान है। उसका प्रकाश और ताप उसकी स्वाभाविक प्रकृति हैं, इसलिए वह वस्तुतंत्र है। किसी को सूर्य को जलाना नहीं पड़ता। सूरज हर सुबह अपने आप उदय होता है, और उसके लिए किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि प्रकाश और उष्णता उसकी स्वभावगत विशेषताएँ हैं। लेकिन अगर हम कोयले के टुकड़े को लें, तो उसे जलाना पड़ता है। जब वह जलता है और अंगारे बनते हैं, तब अग्नि प्रकट होती है। यह अग्नि कर्तृतंत्र है, यानी उसे प्रकट करने के लिए कर्म करना पड़ता है। कोयला और अंगार का यह भेद सबको समझ में आ गया होगा। पुराने समय में, जब लोग लकड़ी और कोयला जलाते थे, तब वे जानते थे कि कोयला जलाने पर ही अंगार प्रकट होता है। यह कर्तृतंत्र का उदाहरण है—क्योंकि कर्म करने पर ही अग्नि प्रकट होती है। और जो अग्नि सहज उपलब्ध है, उसे उत्पन्न करने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता—यही वस्तुतंत्र है।
अब एक बात और समझनी है—जो कुछ भी कर्म से किया जाता है, वह कर्तृतंत्र या कर्मजन्य (कर्मसिद्ध) है। जैसे अंगार (जलता हुआ कोयला) कुछ समय तक ही ज्वाला देता है, फिर बुझ जाता है। लेकिन सोचिए—क्या सूर्य कभी बुझता है? नहीं! (यह केवल दृष्टांत के लिए है, वरना कोई यह न कहे कि सूर्य भी कभी बुझ सकता है।) इस दृष्टांत का सार यही है कि ज्ञान और आत्मा वस्तुतंत्र (स्वभावसिद्ध) हैं—वे अपनी सत्ता में स्वतः उपलब्ध रहते हैं। जबकि जो भी कुछ कर्म द्वारा प्राप्त होता है, वह कर्तृतंत्र (कर्मजन्य) होता है। इसलिए कर्तृतंत्र से कभी शाश्वत फल नहीं मिलता, लेकिन वस्तुतंत्र से शाश्वत फल अवश्य मिलता है।
अब, यदि हम परमार्थशास्त्र की भूमिका को ध्यान में रखें, तो प्रश्न उठता है—नामसाधना (ईश्वर के नाम का जप) से हमें क्या प्राप्त करना है? कर्तृतंत्र नामसाधना के माध्यम से हमें वस्तुतंत्र ज्ञान और आत्मानुभव प्राप्त करना है। यह विचार शुरू में कठिन लग सकता है, लेकिन मेरा विश्वास है कि यदि आप छह प्रवचनों तक इसे सुनेंगे, तो यह कठिन नहीं लगेगा। उपासना कर्तृतंत्र है, क्योंकि यह हमारे प्रयास से संपन्न होती है। लेकिन इसी उपासना से हमें वह नित्य प्राप्त, नित्य सिद्ध और सदा विद्यमान वस्तुतंत्र तत्त्व का अनुभव करना है।
कर्म और ज्ञान इन दोनों में यही मुख्य अंतर है कि कर्म से प्राप्त होने वाला फल शाश्वत नहीं होता, जबकि जो बिना कर्म किए सहज उपलब्ध है, वही शाश्वत होता है। अब सोचिए, बिना किसी प्रयास के सहज रूप से क्या उपलब्ध है?—वह है आत्मा। इसी कारण उसे ‘आत्माराम’ कहा गया है। यह शब्द सुनकर अच्छा लगता है, है न? जब हम केवल ‘आत्मा’ कहते हैं, तो यह विषय कुछ शुष्क और गूढ़ लगता है, लेकिन ‘आत्माराम’ में ‘राम’ जुड़ने से उसमें सहज आनंद का भाव आ जाता है। यही सगुण और निर्गुण का ऐक्य है, जिसमें आनंद की संपूर्ण व्यवस्था निहित है।
अब हम इस पूरे विषय का गहराई से अध्ययन करेंगे। इसमें कई रोचक पहलू हैं। व्यवहार में आम मनुष्यों के नाम और भगवान के नाम में स्पष्ट अंतर है; साधारण नाम के उच्चारण से भगवान के नामस्मरण की भूमिका अलग होती है। व्यवहार में नाम का अपभ्रंश होना, या उसे अनौपचारिक, ढीले या मिलावटयुक्त तरीके से पुकारना संभव है—जैसे ‘नंदन’ को ‘नंदू’ या ‘सरिता’ को ‘सरू’ कहना। लेकिन भगवान के नाम का उच्चारण और स्मरण, शुद्धता और आदर के साथ होना चाहिए। इसलिए उसके नाम का संपूर्ण स्वरूप जानना आवश्यक है। इस नाम का नामी कौन है? उसके साथ मेरा क्या संबंध है? यदि यह संबंध समझ मे ना आए, तो क्या मेरा कुछ बिगड़ जाएगा? यही बड़ा प्रश्न है। अगर मैं नामजाप नहीं करूंगा, तो मेरा क्या बिगड़ेगा? इस प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलना चाहिए; तभी सच्ची प्रेरणा (motivation) प्राप्त होगी!
जब मैं अपनी प्रैक्टिस के शुरुआती दौर में था, तब एक दिन वारकरी संप्रदाय के एक महाराज मेरे पास आए। मैंने उनकी जांच की और, क्योंकि वे महाराज थे, उनसे कोई फीस नहीं ली। वे इस बात से बहुत प्रसन्न हुए। जाते-जाते उन्होंने मुझे उपदेश दिया—“डॉक्टर साहेब, आपके साथ सबकुछ ठीक है, सब अच्छा है, लेकिन आप ज़रा नामजाप करते रहे!” मैंने उनकी बात सुनी और उनसे प्रतिप्रश्न किया—“नाम जपने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? यह पहले समझाइए!” ऐसा सवाल किसी ने पहले कभी उनसे पूछा नहीं था! आमतौर पर लोग नामस्मरण का उपदेश पाकर तुरंत श्रद्धा से सिर झुका देते हैं और नामजप शुरू कर देते हैं। इस प्रकार का प्रश्न पूछना उनके लिए एक नई बात थी। उन्हें इसका उत्तर पता नहीं था, इसलिए उन्होंने निष्कर्ष निकाल लिया कि ‘डॉक्टर लोग नास्तिक होते हैं!’ बस, यही था मेरे प्रश्न का उत्तर! जब परमार्थ के क्षेत्र में ऐसी स्थिति आती है, तब वहाँ सत्य को सामने लाने और समझने की गहरी आवश्यकता होती है। इसी दिशा में हम एक बड़ा प्रयास करने जा रहे हैं।
‘अनुसूय’ और ‘अत्रि’ का तात्त्विक अर्थ
अब बात करें नाममंत्र की… उदाहरण के लिए, जब हम किसी नाममंत्र का उच्चारण करते हैं, तो उसका अर्थ समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे—‘दत्त’ नाम लें। विचार करें—राम यह नाम है, विठ्ठल यह नाम है, दत्त यह नाम है। अब सवाल है—‘दत्त’ शब्द का अर्थ क्या है? ‘दत्त’ का अर्थ है—जो दिया गया है। जो कुछ भी प्रदान किया गया है, उसे ‘दत्त’ कहा जाता है। उदाहरण के लिए, ‘यज्ञदत्त’ का अर्थ है—‘जो यज्ञ द्वारा दिया गया है’। जिसे यज्ञ ने दिया, वह यज्ञदत्त कहलाता है। दृष्टद्युम्न नामक एक योद्धा था, जो यज्ञ से प्रकट हुआ था—द्रोणाचार्य के वध के लिए उसका विशेष जन्म हुआ था। चूंकि वह यज्ञ से प्रकट हुआ है, इसलिए वह यज्ञदत्त है। अब बात करें दत्त भगवान की, जिनकी हम उपासना करते हैं—वे दत्तात्रेय भगवान। हमें दत्तात्रेय किसने दिए? उनके पिता का नाम ‘अत्रि’ और माता का नाम ‘अनसूया’ है। इसलीये दत्तभगवान को अत्रिनंदन (अत्रि ऋषि के पुत्र) या अनसूयानंदन (अनसूया माता के पुत्र) कहा जाता है। इस नाम को समझने के पीछे एक गहरी सोच है। समझना यह है कि ‘जो अनसूया ने दिया और जो अत्रि ने दिया, वही दत्त है!’ अब—‘अनसूया’ और ‘अत्रि’—इन दो नामों का विशेष अर्थ क्या है? इन दोनों के नामों में कौन-से विशिष्ट भाव हैं? इन दोनों के मिलन से ‘दत्त’ तत्त्व हमें कैसे मिला, उसका इनसे क्या संबंध है?
‘दत्त! दत्त!’ कहते हुए नाचना, दत्त की पालकी तैयार करना, उन्हें झूला झुलाना, विधिपूर्वक पूजन करना और अन्य धार्मिक विधियाँ करना—ये सभी भक्ति के दृश्य रूप हैं। ये सब सगुण उपासना के अंतर्गत आते हैं और इन्हें अवश्य करना चाहिए। लेकिन ऐसी सगुण उपासना करते हुए यह समझना बहुत जरूरी है कि इनका वास्तविक अर्थ क्या है? अनसूया क्या है? अनसूयादत्त का अर्थ क्या है? अत्रिदत्त का अर्थ क्या है? जब हम इनका चिंतन करते हैं, तो हमें अनसूया शब्द का असली अर्थ समझ में आता है। अनसूया का अर्थ है—जिसके हृदय में असूया (ईर्ष्या), द्वेष, मत्सर, घृणा, भेदभाव या तिरस्कार नहीं होते। ऐसे शुद्ध अंतःकरण को ही ‘अनसूय’ कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के नवमे अध्याय में सबसे पहले यही कहा कि मैं ये बातें तुम्हें क्यों बता रहा हूँ? क्योंकि तुम ‘अनसूय’ हो।
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे॥ (गीता 9.1)
क्यों प्रवक्ष्यामि? क्योंकि तुम अनुसूय हो। इसका अर्थ यह है कि जिस अंतःकरण से नामसाधना करनी है, वह अनसूय हो। अनसूया का यही अर्थ है—जिसमें द्वेष, मत्सर, ईर्ष्या या किसी के प्रति घृणा न हो। ऐसा शुद्ध अंतःकरण ही नामसाधना के लिए अनुकूल भूमि बनता है। आप जानते ही हैं की, जैविक स्तर (biologically) पर भी ‘अनुसूय’ के लिए उचित भूमि होनी चाहिए, तभी उसमें अत्रि द्वारा डाला गया बीज सही प्रकार से अंकुरित हो सकता है। यदि हम इस रूपक को ध्यान में रखें, तो पुराणों में जो कथा आती है—कि अनसूया के पास तीनों देव आए और वे एक विशेष स्थिति में आए—यह कथा सगुण दृष्टि से पूरी तरह उचित है। लेकिन जब हम सगुण से निर्गुण की ओर बढ़ते हैं, तब यह समझना आवश्यक है कि सगुण और निर्गुण वास्तव में एक ही हैं। इसके लिए कथाभाग थोड़ा अलग रखकर, उसमें छिपे तत्त्व को ग्रहण करना चाहिए।
यदि हम इस तत्त्व को सही से समझ लें, तो हमें यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिस अंतःकरण में ‘दत्त’ का अनुभव पाना है, उस तत्त्व के लिए अंतःकरण की भूमि कैसे तैयार करनी चाहिए। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। जैसे यदि भूमि अच्छी तरह तैयार की गई हो, तो उसमें पड़ा बीज अच्छी तरह अंकुरित होता है; लेकिन यदि भूमि उपयुक्त नहीं है, तो परिणाम नहीं मिलेगा। संत ज्ञानेश्वर महाराज की ओवी तो खडकी जैसे वर्षले। (ज्ञानेश्वरी 12.131) में कहा गया है—यदि पत्थर पर वर्षा हो, तो वहाँ पड़ा बीज कभी अंकुरित नहीं होता। पत्थर पर बीज रखकर उस पर कितना भी पानी डालें, कोई अंकुर नहीं फूटता। इसी तरह, यदि अंतःकरण तैयार न हो, या उसका समुचित परिशोधन न हुआ हो, तो ‘दत्त’ नाम का जो प्रभाव है, जो अनुभव प्रकट होना चाहिए, वह नहीं होगा। इसलिए, मेरा अंतःकरण इस अनुभव के लिए तैयार होना चाहिए, और अंतःकरण को तैयार करने की प्रक्रिया ही ‘साधना’ है। इस अधिकार को प्राप्त करने में ‘अनुसूय’ का बहुत बड़ा योगदान है।
संत ज्ञानेश्वर महाराज ने इस विषय पर बहुत सुंदर टीका लिखी है: यालागी सुमनु आणि शुद्धमती (ज्ञानेश्वरी ९.४०)। अर्जुन से वे कहते हैं कि, “तुम विशेष हो, इसलिए मैं तुम्हें यह नवम अध्याय सुना रहा हूँ।” इसका अर्थ है कि ‘राजविद्या’, जो अत्यंत श्रेष्ठ और ‘राजगुह्य’, यानी अत्यंत गोपनीय विद्या है, वह मैं तुम्हें दे रहा हूँ—क्योंकि तुम्हारा अंतःकरण विशेष है।
तुम कैसे हो? ‘सुमन’ हो—तुम्हारा मन बहुत सुंदर है; ‘शुद्धमती’ हो—तुम्हारी बुद्धि अत्यंत शुद्ध है; ‘अनिंदक’ हो—तुम किसी की निंदा नहीं करते; ‘अनन्यगति’ हो—तुम्हारी दृष्टि केवल मुझ पर है, तुम मुझसे अलग कहीं और नहीं जाते। भगवान को यह क्यों कहना पड़ा? क्योंकि मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी है: यदि एक देवता कार्य पूरा न करे, तो लोग दूसरे देवता के पास चले जाते हैं; यदि एक संत का आशीर्वाद फलित न हो, तो लोग दूसरे संत के पास चले जाते हैं; यदि एक डॉक्टर ठीक न करे, तो लोग दूसरे डॉक्टर की ओर चले जाते हैं। मनुष्य इतनी आसानी से बदल जाता है—यह भगवान भली-भाँति जानते हैं। इसलिए वे कहते हैं: ‘तुम अनन्य हो, अनन्यगति हो,’ यानी तुम मेरे अतिरिक्त किसी और की शरण नहीं लेते। तरी परियेसीं प्राज्ञा (ज्ञानेश्वरी 9.36)—अर्थात्, ‘तुम अत्यंत विद्वान हो।’
अब, यदि हम इन विशेषणों को ध्यान से देखें तो हमें समझ आता है कि ये गुण अर्जित करने की आवश्यकता है। और यदि ये गुण अर्जित हो जाएँ, तो अंतःकरण एक शुद्ध भूमि बनता है। जब भूमि शुद्ध होती है, तो बीज अत्यंत सुंदर रूप से अंकुरित होता है। अब, ‘दत्त’ नाम को ही क्यों चुना गया? प्रत्येक नाम की अपनी व्युत्पत्ति होती है—नाम तो अनेक हैं, लेकिन ‘दत्त’ नाम चुनने का विशेष कारण यह है कि वह ‘अनसूयानंदन’ हैं। ‘अनसूया’ शब्द का अर्थ पहले ही स्पष्ट हो चुका है—जहाँ द्वेष न हो, तिरस्कार न हो, मत्सर न हो, ईर्ष्या न हो। ऐसा अंतःकरण ही ‘शांत अंतःकरण’ होता है। यदि ऐसे अंतःकरण में बीज बोया जाए, तो वह अत्यंत सुंदर रूप से अंकुरित होता है।
यहाँ ‘अत्रिनंदन’ का अर्थ है—अत्रि के पुत्र। लेकिन ‘अत्रि’ शब्द का तात्त्विक अर्थ क्या है? ‘त्रि’ का अर्थ होता है ‘तीन’, तो ‘अत्रि’ का अर्थ हुआ—‘जहाँ तीन नहीं हैं।’ अब, यह कौन-से तीन नहीं हैं? यहाँ एक गहरा विचार है: जिसमें तीन गुण नहीं हैं (सत्त्व, रज, तम), तीन शरीर नहीं हैं (स्थूल, सूक्ष्म, कारण), और तीन अवस्थाएँ नहीं हैं (जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति)। जिसमें इन तीनों का अभाव है, वही एक तत्त्व है। और यदि उस तत्त्व को अपने भीतर प्रकट करना है, तो आंतरिक भूमिका कैसी होनी चाहिए? जिनमें ये तीन प्रकट नहीं होते—तीन देह, तीन गुण, तीन अवस्थाएँ—उस तत्त्व को ही आत्मा कहते हैं, और यही ‘दत्तात्रेय’ का वास्तविक स्वरूप है। जब हम ‘दत्तात्रेय’ का नाम लेते हैं या ‘दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा’ कहते हैं, तो हमें जिन दत्तात्रेय का अनुभव होना चाहिए, वे इसी स्वरूप के हैं—एक तत्त्व, तीन देह नहीं। त्वं देहत्रयातीतः। गणपति का वर्णन होता है—त्वं गुणत्रयातीतः, त्वं अवस्थात्रयातीतः, त्वं कालत्रयातीतः। अर्थात्, जो गणपति का वर्णन है, वही दत्तात्रेय का भी स्वरूप है।
यदि हम इस प्रकार समन्वय स्थापित करें, तो जब मैं दत्त का या विठ्ठल का भजन करता हूँ, तब मुझ पर कौन-सी जिम्मेदारी आती है, यह समझना चाहिए। जब यह जिम्मेदारी स्पष्ट हो जाए, तो उसी के अनुसार अंतःकरण की भूमिका तैयार करना भी हमारा कर्तव्य बनता है।
कोण्याही जीवाचा न घडो मत्सर ।
वर्म सर्वेश्वर पूजनाचे ॥ (तुकाराम गाथा २१.३)
इस प्रकार, संतों के उपदेश इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए मार्गदर्शक बनते हैं।
अब मैं अपना एक अनुभव बता रहा हूँ। एक बार मैं मुरगुड के विठ्ठल मंदिर मे गया। जब विठ्ठल भगवान की पूजा करने के लिए अंदर गया, तो देखा कि मंदिर के दरवाजे पर एक ओर गाँव के डॉक्टर और दूसरी ओर गाँव के ही एक प्रवचनकार (कीर्तनकार) खड़े हैं। गाँव के डॉक्टर—यानी मेरे व्यावसायिक प्रतिस्पर्धी। प्रवचनकार—मेरे आध्यात्मिक क्षेत्र के प्रतिस्पर्धी। यह सुनने में अजीब लगता है: ‘आध्यात्मिक प्रतिस्पर्धी’, ‘व्यावसायिक शत्रु!’ कितना विचित्र विधान! लेकिन ऐसे लोग होते हैं। जैसे ही मैंने उन दोनों को देखा, मेरा क्रोध मस्तिष्क पर चढ़ गया। इसी क्रोधित अवस्था में मैंने विठ्ठल भगवान की पूजा की। मैंने विठ्ठल भगवान को एक हजार रुपये का हार अर्पित किया। कितने रुपयों का? बताइए! क्योंकि जब तक मैं आपको बता न दूँ, मेरी पूजा पूरी नहीं होती। यदि आपको पता ही न चले, तो? भगवान सर्वज्ञ है, सर्वसाक्षी है, यह तो मानता हूँ; परंतु मेरी पूजा सबको दिखे, तभी वह पूर्ण होगी ऐसा मन में लगता है। अब, वह पूजा भगवान को ज्ञात होगी या नहीं, कौन जाने? हो भी सकती है या नहीं, इसका कोई भरोसा नहीं! जब तक उपासना के नाम पर ऐसे दिखावे चलते रहेंगे, तब तक भगवान हमारे ‘अनुभव’ में आने के लिए संभव नहीं होगा। मैंने यह पूजा की और घर चला गया। अगले दिन फिर विठ्ठल भगवान के पास गया और पूछा, “प्रभु! मैंने कल आपकी जो पूजा की, वह आपको कैसी लगी?” विठ्ठल भगवान ने उत्तर दिया, “दरवाजे पर तुम्हारा जो क्रोध मस्तिष्क पर चढ़ गया था, वही मुझ तक पहुँचा। लेकिन तुमने जो एक हजार रुपये का हार अर्पित किया, उसका मुझे कोई अनुभव नहीं हुआ।” इस घटना से यह निष्कर्ष निकलता है, —कोण्याही जीवाचा न घडो मत्सरl वर्म सर्वेश्वर पूजनाचेl—पूजा का सार बाहरी प्रदर्शन नहीं, आंतरिक भाव है। वर्म सर्वेश्वर पूजनाचे – यदि पूजा का यह रहस्य (वर्म) समझ में आ जाए, तो दिखावे के लिए एक हजार रुपये का हार चढ़ाना, एक दर्जन सेब रखना, या कोई और हरकत करना—ये सब सिर्फ बाहरी कर्म रह जाते हैं। एक दृष्टि से ये कर्म आवश्यक भी हैं, इन्हें ‘अर्चन भक्ति’ कहते हैं। और अर्चन भक्ति भी निर्विवाद रूप से भक्ति ही है। परंतु अर्चन भक्ति करते समय, जो आंतरिक स्थिति होनी चाहिए, जो भूमिका भीतर तैयार होनी चाहिए, यदि वह भूमिका तैयार न हो, तो ‘विठ्ठल’ तो वहीं रहेंगे, परंतु मेरा और विठ्ठल भगवान का ‘संबंध’ कैसे बनेगा?
ईश्वररूप और ब्रह्मरूप दत्त
यही दत्त भगवान की उपासना का भी रहस्य है। दत्तात्रेय अनुसूया के पुत्र हैं, वे अनुसूयानंदन हैं, और तीन अवस्थाओं के पार स्थित हैं। जब भगवान दत्तात्रेय की आरती पर विचार करते हैं, तो उसमें उनके दो रूपों का उल्लेख मिलता है—एक ईश्वररूप दत्त और दूसरा ब्रह्मरूप दत्त। इन दोनों रूपों को समझना क्यों आवश्यक है? क्योंकि यदि ‘दत्त’ मेरे आराध्य हैं, तो उनके ये दोनों रूप मेरे लिए स्पष्ट होने चाहिए: ईश्वररूप दत्त और ब्रह्मरूप दत्त। आरती में कहा गया है—त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ति दत्त हा जाणा, त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्य राणा। ‘त्रैलोक्य राणा’ यह विशेषण ईश्वर के लिए प्रयुक्त होता है। इसलिए मुख्य प्रश्न यह है कि आरती में दत्त का कौन-सा रूप मेरा आराध्य है—ईश्वररूप दत्त या ब्रह्मरूप दत्त; या क्या वे ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं?
जब ईश्वर सृष्टि की रचना करते हैं, तो वे रजोगुण को स्वीकार कर ब्रह्मा के रूप में जगत की उत्पत्ति करते हैं। यह समझना इसलिए आवश्यक है कि जब मैं दत्त भगवान की उपासना करता हूँ, तो मुझे उनके समस्त स्वरूपों का ज्ञान होना चाहिए। यदि मैं इस समग्र ज्ञान के साथ उपासना करूँगा, तभी उसका सच्चा लाभ मिलेगा। इसका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मदेव ईश्वर हैं, जो रजोगुण को अपनाते हैं, लेकिन वे स्वयं रजोगुणी नहीं हैं; वे रजोगुण के स्वामी हैं। वे रजोगुण का उपयोग करके सृष्टि की रचना करते हैं। इसी प्रकार, वे सत्त्वगुण से सृष्टि का पालन करते हैं, इसलिए वे विष्णु भी माने जाते हैं। वे तमोगुण से सृष्टि का संहार करते हैं, इसलिए वे शंकर भी हैं। इस प्रकार, ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये तीनों तत्त्व एक ही परम तत्त्व में समाहित हैं। इसका अर्थ यह है कि उत्पत्ति, पालन और संहार—ये तीनों कार्य वही एक तत्त्व करता है। अब प्रश्न उठता है: इन तीनों में से हमें कौन-सा दत्त अधिक प्रिय है? यह सचमुच विचारणीय और गंभीर प्रश्न है। हमने दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु, महेश—इन तीन भागों में बाँट दिया है। एक उत्पत्ति करता है, एक पालन करता है, और एक के संहार के विषय में हम चर्चा तक नहीं करना चाहते। यहीं से हमारे और ईश्वर के बीच दूरी आने लगती है। ईश्वर के ‘शिव’ स्वरूप का कार्य तो चलता रहता है, लेकिन हम दत्तात्रेय के तीन टुकड़े कर देते हैं! ‘ब्रह्मा’ स्वरूप हमें इसलिए स्वीकार्य है क्योंकि उन्होंने हमें जन्म दिया, संसार की रचना की—यह हमें अच्छा लगता है। ‘विष्णु’ स्वरूप और भी प्रिय है क्योंकि वे हमारे पालनकर्ता हैं; उनसे हम बार-बार प्रार्थना करते हैं: ‘हे प्रभु, मेरी रक्षा करो!’, ‘हे प्रभु, मुझे सुखी रखो!’
आजकल परमार्थ के नाम पर जो भी हो रहा है, वह वास्तव में हास्यास्पद है। परमार्थ की आड़ में ही ये सारे खेल चल रहे हैं। जब तक इस दिखावे को रोका नहीं जाएगा, तब तक हमें परमार्थ का वास्तविक लाभ नहीं मिल सकता। खासकर शंकर के स्वरूप में दत्तात्रेय का जो कार्य है, वह हमें स्वीकार नहीं होता। इसका सीधा अर्थ है कि जिन दत्तात्रेय भगवान का मैं नाम जप करता हूँ, उनमें से केवल दो-तिहाई स्वरूप मुझे स्वीकार्य हैं, एक-तिहाई नहीं। ऐसे में दत्तात्रेय भगवान की उपासना पूरी कैसे हो सकती है? पूजा कैसे संभव है? इन प्रश्नों पर विचार करने से एक ही उत्तर निकलता है –
ठेविले दत्ताने तैसेची रहावे । चित्ती असू द्यावे समाधान ।
मूल अभंग मे ‘ठेविले अनंते तैसेची रहावे’ यह चरण है। मैंने इसमें थोड़ा बदलाव किया है। ‘ठेविले अनंते’ के स्थान पर ‘ठेविले दत्ताने’ कहा। दत्तात्रेय ने जैसा जन्म दिया, जैसा रखा, जैसा ले जाएंगे—सब कुछ शांती से स्वीकार करने का भाव। भगवान की जैसी भी व्यवस्था हो, वह मुझे पूरी तरह स्वीकार है, यह भाव मन मे निर्माण होने के बाद ही सच्ची उपासना संभव है। लेकिन अक्सर यह संभव नहीं हो पाता, क्योंकि हमें इस शरणागती के पीछे की भूमिका ही समझ मे नहीं आती। जब हम केवल परंपरा, भावना और श्रद्धा के आधार पर उपासना करते हैं, तब स्पष्टता नहीं होती। लेकिन जैसे-जैसे स्पष्टता आती है, जिम्मेदारी का बोध होता है, तब मैं सचमुच दत्तात्रेय की शरण में जाता हूँ। तब यह स्पष्ट हो जाता है कि मैं किसकी शरण में हूँ। जब यह स्वीकार कर लेता हूँ कि मैं शंकरस्वरूप दत्त की भी शरण में गया हूँ, तब यह भी मानना पड़ता है कि शंकर के रूप में वे मेरे शरीर की अंतिम व्यवस्था करेंगे—और वह भी मुझे उतनी ही सहजता से स्वीकार होगी, जैसे ब्रह्मा और विष्णु द्वारा दी गई व्यवस्थाएँ स्वीकार होती हैं। यदि शंकर द्वारा दी गई व्यवस्था भी सहज स्वीकार हो, तो यही सच्ची शरणागति है। यदि मैं दत्तात्रेय को शरण हूँ, तो तीनों शक्तियों के प्रति निर्विकल्प आत्मसमर्पण (unconditional surrender) होना चाहिए। लेकिन आमतौर पर हमारे मन में यह भाव आता है—“यदि तुम मुझे अच्छे से रखोगे, तो!” पिछले तीस वर्षों से यही वाक्य सुनता आ रहा हूँ: “भगवान! मैंने आपके लिए इतना किया, फिर भी मेरा ऐसा क्यों?” यह विचार ही विचित्र है—भगवान मेरा करता है, या मैं भगवान का करता हूँ?
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ (गीता १८.६१)
हम भगवद्गीता पढ़ते हैं, फिर भी कहते हैं, “भगवान! मैंने आपके लिए इतना किया, फिर भी मेरा हाल ऐसा क्यों?” और बात यहीं नहीं रुकती—लोग कहते हैं, “वह व्यक्ति आपके लिए कुछ नहीं करता, फिर भी उसका जीवन इतना सुखी क्यों है?” ऐसी तुलना और शिकायतें आम हैं। वह व्यक्ति भगवान की सेवा नहीं करता, फिर भी उसके जीवन में सुख, वैभव, आनंद है। “हे भगवान! आपके दरबार में न्याय नहीं है!” और फिर उसी सांस में कहेंगे, ‘दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा’। इस प्रकार की सोच के साथ सच्चा परमार्थ संभव नहीं। यदि इन दिखावटी खेलों को रोकना है, तो एक ही उपाय है—सत्य को समझना। जब सत्य का बोध होता है, ‘दिगंबरा दिगंबरा’ वही रहता है, दत्त वही रहते हैं, पर हमारी दृष्टि बदल जाती है। दत्त को देखने का नजरिया, हमारी समझ बदल जाती है। और जब समझ बदलती है, तो मैं भी वही रहता हूँ, दत्त भी वही रहते हैं—लेकिन हमारा संबंध अधिक सुंदर और स्पष्ट हो जाता है, वैसा जैसा वास्तव में होना चाहिए।
अब आगे बढ़कर विचार करें—‘दत्त दत्त’ की तरह ही, ‘नेति नेति’ इन शब्दों पर भी ध्यान दें। नेति नेति शब्द न ये अनुमाना। – ‘नेति नेति’ का अर्थ है: यह भी नहीं, वह भी नहीं। यही ब्रह्म का स्वरूप है, जिसे ब्रह्मरूप दत्त कहते हैं। दत्तात्रेय स्वयं संपूर्ण हैं—वे ही ईश्वर हैं, वे ही ब्रह्म हैं। यह समझना क्यों जरूरी है? क्योंकि हमारी साधना दो दृष्टियों से चलती है—ईश्वररूप दत्त और ब्रह्मरूप दत्त। ईश्वर के रूप में दत्तात्रेय के साथ हमारा संबंध आदेश और उपासना का है—हमें उनकी आज्ञा माननी है, उनकी उपासना करनी है। ब्रह्मरूप दत्त से हमारा संबंध है एकता का—हमें उनसे एकरूप होना है। दत्तात्रेय स्वयंपूर्ण हैं; ईश्वर भी वही हैं, ब्रह्म भी वही।
यह भेद कैसे स्पष्ट होता है? ‘त्रैलोक्यराणा’ (तीनों लोकों के स्वामी) ईश्वर के लिए कहा गया विशेषण है, जबकि ‘नेति नेति’ ब्रह्म की अनुभूति का मार्ग है। यह समझ उपनिषद पढ़ने के बाद आती है। उपनिषद बार-बार कहते हैं—‘न इति, न इति’—यह भी ब्रह्म नहीं, वह भी ब्रह्म नहीं। फिर ब्रह्म क्या है? जो बचता है, वही शुद्ध ब्रह्म है, और वही दत्त का ब्रह्मरूप है। इसलिए दत्तात्रेय ‘त्रैलोक्यराणा’ हैं—तीनों लोकों के स्वामी, संपूर्ण जगत के शासक। मेरा और उनका संबंध यही है: उनकी आज्ञाएँ मानना, उपासना करना, और फिर उनकी कृपा से ब्रह्मरूप दत्त में एकरूपता पाना। स्मरण रखें: ईश्वररूप दत्त की उपासना, उनके आदेश का पालन, और साथ ही ब्रह्मरूप दत्त के साथ ऐक्य की साधना—यही साधक का मार्ग है।
दत्त दत्त ऐसे लागले ध्यान, हरपले मन…‘दत्त दत्त’ में जितना ध्यान, उतना ही अंतर्मन दत्तमय (ब्रह्ममय) हो जाता है—जैसे एकनाथ महाराज का हो गया। लेकिन आरती गाते समय क्या मेरा भी मन इस तरह भगवान से एकरूप होता है? अक्सर नहीं होता। मैं आरती गाता हूँ, प्रसाद लेता हूँ, और घर चला जाता हूँ। जब तक यह यंत्रवत् होता रहेगा, तब तक परमार्थ ठीक तरह से नहीं होगा। परमार्थ की कोई हानि नहीं होगी, लेकिन मेरे जीवन में उज्ज्वल दिन नहीं आएँगे।
वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ
अब जब इन विचारों को सही मायने में समझ लेते हैं, तो हमें अपनी जिम्मेदारी का भी गहरा अहसास होने लगता है। ठीक वैसे ही जैसे तुकाराम महाराज ने कहा—वि चा केला ठोबा, तेणे नाम विठोबा। जैसे दत्तात्रेय का स्वरूप है, वैसे ही विठ्ठल का भी है। असली विषय यह है: जिनका मैं नाम जपता हूँ, क्या मैं उनके स्वरूप और मर्म को समझता हूँ? अगर यह समझ नहीं आई, तो सारा साधना-विस्तार निरर्थक हो जाएगा।
विठ्ठल नाम मे ‘वि’ का अर्थ है ज्ञान और ‘ठोबा’ का अर्थ है प्रतिमा, यानी ज्ञान की साकार मूर्ति ही विठ्ठल है। इसी भाव से उन्हें ‘ज्ञानमूर्ति’ कहा जाता है। जैसे सद्गुरू ज्ञानमूर्ति हैं, वैसे ही विठ्ठल भी ज्ञान का साकार रूप हैं। हम जब गुरुदेव की स्तुति करते हैं—‘ब्रह्मानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्’—तो उसी परंपरा में विठ्ठल का भी स्थान है। इसलिए तुकाराम महाराज कहते हैं: ‘प्रत्यक्ष परब्रह्म उभे विटेवरी’—अर्थात् ज्ञान का साकार, प्रत्यक्ष रूप ही विठ्ठल है। इसका गूढ़ अर्थ यही है: जब मैं विठ्ठल को नमस्कार करता हूँ, तो शब्दार्थ से वह ईश्वर हैं, और लक्ष्यार्थ से वे ब्रह्म हैं। वे दत्तात्रेय की ही तरह, कहने को ईश्वर हैं, लेकिन वस्तुतः ब्रह्म ही हैं। ‘कहने के लिए’ (वाच्यार्थ) और ‘वास्तव में’ (लक्ष्यार्थ) —इन दो स्तरों को समझना ही साधना की गहराई है।
वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ में क्या अंतर है? कई बार हम विवाह समारोह में जाते हैं। मैं डॉक्टर हूँ, इसलिए कई बार देर से पहुंचता हूँ, और अक्सर विवाह के आखिरी ‘शुभमंगल’ पर ही पहुँचता हूँ। जब हम विवाह में अक्षत (चावल) वधू-वर पर डालते हैं, तो क्या यह सचमुच वधू-वर तक पहुँचती है? नहीं! वे बीच में खड़े लोगों के सिर पर गिरती हैं, जिससे उन्हें अपने विवाह की याद आती है और वे कभी मुस्कुराते हैं या फिर कभी पछताते हैं। राम कृष्ण हरि! इसका तात्पर्य यह है कि वाच्यार्थ (शाब्दिक अर्थ) से तो अक्षत अतिथियों पर गिरती है, लेकिन लक्ष्यार्थ (अर्थ-लक्ष्य) से वे वधू-वर के लिए ही होती हैं। ठीक इसी तरह, विठ्ठल वाच्यार्थ से ईश्वर हैं और लक्ष्यार्थ से ब्रह्म। इसलिए, हमें ईश्वररूप विठ्ठल की आज्ञा माननी है और उनकी आज्ञा मानकर ब्रह्मरूप विठ्ठल के साथ एकरूप होना है। यही विचार सभी देवताओं पर लागू होता है—आपकी इष्ट देवता कोई भी हो, अंततः सभी एक ही तत्त्व की ओर संकेत करते हैं। सभी एक ही माला के मोती हैं।
अब श्रीराम का उदाहरण लें। रामरक्षा स्तोत्र में कहा गया है—‘राम वेदान्तवेद्यः’—अर्थात् राम वे हैं जिन्हें वेदांत के सहारे ही जाना जा सकता है। पर हम श्रीराम का उपयोग प्रायः सुरक्षा के लिए करते हैं—सायंकाल के समय रामरक्षा स्तोत्र पढ़ते हैं ताकि कोई बाधा न आए। यह परमार्थ के नाम पर चलने वाला खेल है। समर्थ रामदास स्वामी ने ‘रामचरित्र’ में कहा है कि श्रीराम ‘वेदान्त से वेद्य’ हैं—भगवान राम को वेदांत के सहारे ही समझा जा सकता है, और वे सगुणरूप से श्रीराम तथा निर्गुणरूप से परब्रह्म हैं।
अब तक हमने चार उपास्य दैवतों—दत्तात्रेय, विठ्ठल, गणपति (त्वं देहत्रयातीतः, त्वं गुणत्रयातीतः, त्वम् अवस्थात्रयातीतः) और श्रीराम—पर विचार किया। निष्कर्ष यह है कि चाहे देवता का नाम, तीर्थ, या चरित्र भिन्न हो, तत्त्वतः वे सभी एक ही हैं। जब उस तत्त्व पर ध्यान केंद्रित कर उपासना की जाती है, तभी सच्चा फल मिलता है। अंततः उपासना भी एक कर्म है, और कर्म से क्या नहीं पाया जा सकता—यह समझना थोड़ा कठिन जरूर है।
अब एक और महत्वपूर्ण विचार करें—उपासना का भक्ति में रूपांतरण होना चाहिए। जब उपासना भक्ति में बदल जाती है, तभी नामसाधना सार्थक होती है। भगवान श्रीराम, शंकर या गणपति जिनकी मैं उपासना करता हूँ, ‘वह तत्त्वरूप से मैं ही हूँ’ ऐसा अनुभव होने के पश्चात् नामसाधना सफल मानी जाती है। उपासना और भक्ति में क्या अंतर है? समर्थ रामदास स्वामी ने एक ओवी में कहा: ‘जो विभक्त नहीं है, वही भक्त है।’ विभक्त यानी अलग। जैसे दो भाई विवाह के बाद अलग हो जाएँ, वैसे ही। विभक्त का अर्थ है ‘अलग’, और भक्त का अर्थ है ‘एकरूप’। जो अपने उपास्य देवता—विठ्ठल, गणपति, राम—से अलग हैं, वे केवल उपासक हैं। जो उनके साथ एकरूप हैं, वही सच्चे भक्त हैं। अपने उपास्य देवता के साथ एकरूप हो जाना ही उपासना का अंतिम लक्ष्य है। यह समझ में आ जाए तो स्पष्ट होगा कि श्रीराम, शिवजी, गणपतिजी—ये सभी ब्रह्मरूप ही हैं, और उनसे एकरूप होने के लिए ही मैं नामसाधना कर रहा हूँ। यदि यह बात स्मरण रहे, तो नामसाधना की सफलता का रहस्य भी समझ में आ जाएगा।
उपासना से भक्ति की ओर
मैंने एक नामसाधना का चार्ट देखा—अगर एक करोड़ नामजप पूरे हो जाएँ तो ये लाभ, दो करोड़ नामजप से और अधिक, बारह करोड़ नामजप से कुंडली के बारहों घर शुद्ध, शनि, मंगल, राहु, केतु सब शांत हो जाएँगे। किसकी वक्रदृष्टि हटेगी, किसका भाग्य सुधरेगा—इन सबकी पूरी सूची। लेकिन थोड़ा ठहरकर सोचें: आखिर ये कुंडली कब तक हमारे काम की है? मैं भी कभी-कभी अपना राशिफल पढ़ता हूँ। उसमें मेरी राशि के बारे में बहुत कुछ लिखा होता है। लेकिन एक दिन ऐसा आएगा, जब मेरी राशि की भविष्यवाणी तो चलती रहेगी, पर वह पढ़ने वाला ‘मैं’ इस दुनिया में नहीं रहूँगा। उस दिन भी, उस राशि के अन्य लोग तो रहेंगे, भविष्य बताने वाले भी रहेंगे, लेकिन देहरूप मैं शाश्वत नहीं हूँ।
यह सब इसलिए कहा, क्योंकि भविष्य हमेशा शरीर और संसार से जुड़ा होता है। भविष्यवाणी का अर्थ है—शरीर और बाहरी जगत के बीच का संबंध। उदाहरण के लिए, ‘वाहन सावधानी से चलाएँ’—यह चेतावनी किसके लिए है? मेरे (देह के) लिए, और वाहन कहाँ चल रहा है? संसार में। यानी भविष्य का संबंध हमेशा ‘मैं’ और ‘संसार’ से है। अब देखिए, वेदांत क्या कहता है—‘मैं शरीर नहीं हूँ’, ‘संसार सत्य नहीं है।’ अब उलझन शुरू हो जाती है। अगर मैं शरीर नहीं हूँ, तो मेरी कुंडली से मेरा कोई संबंध नहीं। अगर संसार सत्य नहीं है, तो उसमें जो घटित हो रहा है, उससे भी मेरा कोई रिश्ता नहीं।
अगर यह बात याद रहे, तो जो भी भक्त, योगी या साधक खुद को आध्यात्मिक मानते हैं, उन्हें कभी भी भविष्य देखने की आवश्यकता नहीं—क्योंकि भविष्य हमेशा समय के संदर्भ में होता है, और आत्मा कैसी है? त्वं कालत्रयातीतः, त्वं देहत्रयातीतः। यदि तुम आत्मा हो, तो भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों का कोई अर्थ नहीं। भविष्य किसका देखोगे?—जीव का। आत्मा का कोई भविष्य नहीं होता। एक तरफ मैं ‘सोऽहम्’ (मैं आत्मा हूँ) ऐसा विचार करूँ और दूसरी तरफ भविष्य देखूँ, तो यह विरोधाभास होगा। अगर मैं हर बार भविष्य देखता रहूँ, तो असल में मैं अपने आपको देहरूप या जीवरूप ही मानता हूँ। एक तरफ ‘सोऽहम्’ बोलना, दूसरी तरफ अखबार में अपना राशिफल देखना—यह दोहरी भूमिका है। जब तक ‘मैं जीव हूँ’ की धारणा बनी रहेगी, भविष्य देखना छूटेगा नहीं। लेकिन अगर ‘मैं आत्मा हूँ’ का बोध दृढ़ हो गया, तो भविष्य देखने की आवश्यकता ही नहीं बचेगी।
यह करना आसान नहीं—आत्मपरीक्षण का समय कठिन होता है। इसलिए अक्सर हम परमार्थ के नियमों को अपने हिसाब से बदल लेते हैं। जैसे मैं अपनी पोती के साथ ताश खेलता हूँ—पत्ते बावन, लेकिन उसके हाथ हमेशा तेईस-चौबीस, मेरे एक-दो, वो भी उसकी कृपा से! उसके ताश के नियम हर बार उसके मुताबिक बदल जाते हैं। कभी दुक्की इक्के से बड़ी, कभी इक्का सबसे ऊपर। ठीक वैसे ही, हम भी आध्यात्मिकता के नियम अपने हिसाब से बदलते रहते हैं। जब सब हाथ भगवान के हो जाते हैं, तब हमारे हिस्से में कुछ भी नहीं आता।
इन बातों को अच्छी तरह से समझना जरूरी है, क्योंकि जब समझ विकसित होती है, तो परमार्थ के नियम भी हमारे लिए स्पष्ट होने लगते हैं। इन्हीं नियमों की सही समझ से यह भी मालूम चलता है कि मैं जिन भगवान की उपासना करता हूँ, उनका सत्य स्वरूप क्या है। शुरुआत में मैंने सवाल किया था—नामस्मरण की आवश्यकता क्यों पड़ती है? इसका सीधा उत्तर है: क्योंकि विस्मरण हो गया है। यह जीवन की सच्चाई है और इसे समझना भी आसान है। लेकिन अगर मैं नामजाप भूल जाऊं, तो मेरा क्या बिगड़ जाएगा? जब इस प्रश्न का उत्तर मिल जाता है, तभी हमारी साधना में सच्ची प्रेरणा (motivation) आती है।
अब इस प्रेरणा के दृष्टिकोण से देखें—नाम किसका है? नाम ‘नामी’ का है। श्रीकृष्ण एक नाम है, लेकिन वह नाम आखिर किसका है? उस ‘नामी’ का, जो इस शरीर के पार है। शरीर का नाम भले ही श्रीकृष्ण है, पर ‘नामी’ तो वही शाश्वत तत्त्व है। इसी तरह, विठ्ठल एक नाम है और विठ्ठल की मूर्ति ‘नामी’ का प्रतीक है। नाम और मूर्ति दोनों ही सीमित नहीं हैं—उनके आगे भी एक अनंत तत्त्व है। जब यह समझ में आता है कि नामस्मरण करने वाला ‘मैं’ और जिसका मैं नाम लेता हूँ, यानी ‘नामी’, इन दोनों के बीच संबंध क्या है—तभी नामस्मरण का असली अर्थ प्रकट होता है। नाम वही है, नाम लेने वाला भी वही, लेकिन जब यह समझ-बूझ से किया जाए, तो अनुभूति की ऊँचाई ही अलग होती है।
कई बार हमारी उपासना के केंद्र में श्रीरामजी की मूर्ति होती है। विचार करें—यह मूर्ति किसकी है? दशरथपुत्र श्रीराम की, या अवतारी श्रीराम की? अवतार, स्वयं ईश्वर का, और ईश्वर का मूल ब्रह्म है। जब हम रामजी की मूर्ति के सामने खड़े होते हैं, तो समझना चाहिए कि वह केवल पत्थर, लकड़ी, चाँदी या सोना नहीं है। हम गर्व से कहते हैं, ‘हमारे गाँव की मूर्ति को पाँच सौ साल हो गए!’ लेकिन श्रीराम का जो ब्रह्मरूप है, वह अनादि और अनंत है—पाँच सौ साल उनके आगे कुछ भी नहीं। मूर्ति की स्थापना भले ही पाँच सौ साल पहले हुई हो, मंदिर प्राचीन हो, लेकिन मूर्ति के पीछे का तत्त्व नित्य, सत्य, अनादि और अनंत है। जब उपासना इस तत्त्व से जुड़ जाती है, तब उसका अर्थ और उसकी गहराई दोनों बदल जाती हैं। यदेव विद्यया करोति—अगर भगवान के विषय मे पूर्व ज्ञान और सम्पूर्ण समझ हो, तो उपासना का अनुभव भी अत्यंत गहरा हो जाता है।
समजले आणि वर्तले l (दास. १४.६.२५) हमने आरंभ कहाँ से किया था? यह विचार किया था कि मैं जिसकी उपासना करता हूँ, जिसकी मूर्ति मेरे सामने है, वह केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि उसी परम ब्रह्मतत्व की अभिव्यक्ति है। यदि मैं उस तत्त्व के पूर्ण बोध के साथ उपासना करता हूँ, तो उपासना का स्तर ही बदल जाता है। ऐसी उपासना ही वास्तव में अपेक्षित है।
अब प्रश्न उठता है: मूर्ति का मूल क्या है? मूर्ति राम के सगुण अवतार से जुड़ी है, पर इसकी विविधता भी देखिए—कहीं तीन मुखों वाले दत्तात्रेय, कहीं एक मुखी, कहीं छह मुखी। यशवंतराव चव्हाण ने नेपाल में छह मुख वाले दत्तात्रेय के दर्शन किए थे। तो कौन-सी मूर्ति सत्य है? एक मुख, तीन मुख, या छह मुख वाली? इन भिन्नताओं पर हम नहीं अटकते—हम श्रद्धा से उपासना करते हैं। जिसे जैसे दर्शन हुआ, उसने उसी अनुभूति के अनुसार मूर्ति बनवाई। इसलिए कहा गया—‘जैसा भाव, वैसा देव।’ भाव ही देव है। भाव जितना गहरा, देवता का अनुभव उतना प्रखर। भाव के बिना कोई देव नहीं। इसका तात्पर्य यह है: मूर्ति अवतार की होती है, अवतार ईश्वर का, और ईश्वर के पीछे ब्रह्म तत्त्व है। संत तुकाराम महाराज ने इसी भाव को ‘ते हे परब्रह्म उभे विटेवरी’ में व्यक्त किया—विठ्ठल प्रत्यक्ष ज्ञानमूर्ति हैं, सद्रूप, चिद्रूप, आनंदरूप है। जब यह तत्त्वचिंतन साकार होता है, तो उपासना मात्र मूर्तिपूजा नहीं रहती, वह ब्रह्म की आराधना बन जाती है।
मूर्ति के पीछे तीन तत्त्व होते हैंं। एक हैंं सगुण अवतार, किसका सगुण अवतार? ईश्वर का। ईश्वर कहाँसे आया? ब्रह्म से। अर्थात जो मूर्ति मे स्थित हैं, वह केवल मूर्ति नही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैंं। जब यह भाव स्थिर हो जाता है कि समक्ष स्थित मूर्ति प्रत्यक्ष ब्रह्म है, तब उपासना करते हुए साधक स्वयं भी ब्रह्म से एकरूप हो जाता है। उस ज्ञान की स्थिरता से अनुभूति सहज हो जाती है—मूर्ति के दर्शन मात्र से वह बोध जाग उठता है। इसी स्वाभाविक भाव से की गई उपासना का परिणाम है: त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
नाम और नामी का ऐक्य
एक बार मैंने गणपति के एक लाख आवर्तन किए—‘त्वं देहत्रयातीतः, त्वं गुणत्रयातीतः, त्वम् अवस्थात्रयातीतः’। एक लाख बार गणपति को पुकारा। कल्पना कीजिए—गणपति प्रकट होकर कहते हैं, “मुझे बताने की आवश्यकता नहीं कि मैं कैसा हूँ! मैं भलीभाँति जानता हूँ कि मैं देहत्रयातीत हूँ। तुम्हें मुझे बताने की ज़रूरत नहीं—बल्कि तुम अपने आप को देखो कि तुम कौन हो।” यह संकेत है कि गणपति की उपासना करते-करते यदि साधक का चिंतन इस ओर दृढ़ हो जाए कि ‘मुझे भी देह, गुण, अवस्था, इन सबसे परे होना है’, तो वही उपासना सफल होती है। जब साधक अपने भीतर के ‘मैं’ का अनुभव करता है —जो देह, गुण, अवस्था, किसी भी भेद से परे है—तभी उपासना का वास्तविक फल मिलता है। अन्यथा उपासना केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित रह जाती है: खोआ, गुड़, चीनी से बने हुए या तले हुए—इक्कीस मोदक! यह सब ठीक है, भोग चढ़ाने की पद्धति है। भोग प्रेम से, खुशी से अर्पण करें; गणपतीजी ने यदि कुछ नही खाया तो स्वयं ग्रहण करे, पूरे २१ के २१! कोई आपत्ति नही। मूल बात यह है: अपने भीतर के गणपति तत्त्व का स्मरण कर, उपासना की जाए। जब साधक अपने भीतर भी ‘गुणत्रयातीत’ गणपति का अनुभव करने लगे, तभी उपासना का अर्थ पूर्ण होता है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा हैं,
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन॥ (गीता 2.45)
शास्त्रों और संतों की वाणी परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि समरस होती है। ज़रूरत है उस गूढ़ तत्त्व को समझने के विवेक की। हर नाम का एक ‘नामी’ होता है, और वह नामी ब्रह्मस्वरूप होता है। साधक नामस्मरण करते-करते, अंततः नाम के ‘नामी’ के साथ एकरूप होने के लिए ही साधना करता है। यही साधना का अंतिम ध्येय होना चाहिए: नाम और नामी का ऐक्य।
नाम लेने वाला ‘मैं’ कौन हूँ?—जीव। जिसका नाम मैं जपता हूँ, वह कौन है? लक्ष्यार्थ से ब्रह्मरूप। नामस्मरण करते-करते, जब ‘मैं’ नाम के नामी से एकरूप हो जाता हूँ, तब साधना की उच्चतम अवस्था प्राप्त होती है। उस स्थिति में, यदि माला हाथ से गिर जाती है तो वह एकरूपता की अनुभूति का परिणाम है, नींद या दिखावे का नहीं। केवल दूसरों को दिखाने के लिए माला गिराना या साधना का प्रदर्शन करना वास्तविक साधना नहीं है। नामस्मरण का सार यही है—साधक और साध्य का एकत्व।
मूल बात यही है—नाम है, इसलिए ‘मैं’ जीव हूँ। जब वही जीव नामसाधना करते-करते नामी से एकरूप हो जाता है, तब ‘जीव’ की सीमा मिट जाती है। अगर साधना के समय सारा ध्यान माला, जाप की पद्धति या गिनती पर है, तो एकरूपता संभव नहीं। ध्यान विठ्ठल पर होना चाहिए—माला या संख्या पर नहीं। यदि साधना में सच्चा तादात्म्य आ गया, तो ‘विठ्ठल, विठ्ठल’ जाप करने वाला ‘मैं’ शेष नही रहता और माला हाथ से छूट जाती हैंं। साधक और साध्य के बीच का भेद मिट जाता है—माला अपने आप छूट जाती है।
लेकिन अगर साधना केवल कागज पर नाम लिखने, लोगों को दिखाने, या उद्यापन करने तक सीमित रह जाए, तो वह केवल बाह्य कर्म रह जाता है। कई लोग लिखकर नामजाप करते है। मैंने notebooks के बड़े बड़े ढेर देखे है। ऐसे साधक हर परिचित व्यक्ती के सामने जाहिर करते है, “देखिये, मैंने कितना नामजाप किया।” नाममंत्र के लेखन से पन्ने भरते जाते हैंं, फिर उसका समापन या उद्यापन करते हैंं। मैंने नामजाप किया तो क्या अब समाज ने उसकी सराहना करनी होती हैंं? समस्या बडी जटिल हैंं। नामजाप दिखावे के लिए हैं या भगवान को पाने के लिए? इससे होता यह हैंं कि भगवान और साधक का संबंध बिगड़ जाता हैं। भगवान पूछते हैं, “जिसके लिए तुमने नामजाप किया वह तुम्हे प्राप्त हुआ कि नहीं? लोगोंने तुम्हें सराहा, बड़ा भक्त माना। लोगों को दिखाने के लिये तुमने नाम लिया और उसके बदले तुम्हे यह सब प्राप्त हुआ, अब तुम्हारा और मेरा कैसा संबंध? जिसके लिए नाम लिया वह तो तुम्हे प्राप्त हो गया, अब तुम्हे देने के लिए मेरे पास कुछ शेष नहीं।” यदि साधना का लक्ष्य भगवान को पाना है, तो दिखावे का कोई मूल्य नहीं।
ये विचार कठिन लग सकते हैं, लेकिन यही कठिनाई साधना की दिशा तय करती है। निष्कर्ष यही है: नामस्मरण का उद्देश्य है—‘मैं’ जीव, नाममंत्र का जाप करते हुए, नाममंत्र के माध्यम से, नामी (भगवान, आत्मा, ब्रह्म) से एकरूप हो जाऊँ। यदि एकरूपता न मिले, तो आगे विचार करना चाहिए—‘मेरा क्या बिगड़ जाएगा?’ इस विषय पर चर्चा अगले सत्र में करेंगे।
क्रमशः…
